Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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और रिश्ते छूटते चले गए

 

ताले लगे दरवाज़ों परऔर रिश्ते छूटते चले गए

 [जब ताले चाभी से नहीं अपनत्व से खुलते थे]



दरवाज़े तब नहीं खुलते थे जब चाभी घूमती थी, वे तब खुलते थे जब कोई पुकारता था — मैं हूँ…। वो वक़्त था जब ताले धातु से नहीं, भरोसे से बने होते थे। वो दिन, जब किसी के आने पर कुंडी खोलनी नहीं पड़ती थी, बस मन खोलना होता था। “आ जाइए” एक औपचारिक आमंत्रण नहीं, दिल से निकला अपनापन था। कोई पीछे से चुपचाप आ जाए, तो डर की बजाय चेहरे पर मुस्कान खिलती थी। और आज? घंटी बजती है, दरवाज़ा खुलता है, पर दिल बंद ही रहता है। हमारा समाज, जो कभी विश्वास की नींव पर टिका था, अब सिक्योरिटी सिस्टम और शक की परतों में उलझ गया है। क्या हमने सचमुच प्रगति की है, या सिर्फ़ भरोसे को ताले में बंद कर दिया है?

वो दौर कुछ और था। गाँवों की गलियों में, जहाँ हर घर एक-दूसरे का विस्तार था, ताले सिर्फ़ रात की नींद की रखवाली करते थे। लोग अपने पड़ोसियों को नाम से जानते थे, उनकी कहानियाँ जानते थे। भारतीय संस्कृति में, जहाँ अतिथि देवो भव: का मंत्र गूंजता था, मेहमान को भगवान का दर्जा दिया जाता था। कोई अनजाना व्यक्ति घर आ जाए, तो उसे पानी और प्रसाद मिलता था, न कि संदेह भरी नज़रें। आँकड़ों की बात करें तो, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2010 के आँकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में चोरी और सेंधमारी के मामले शहरी क्षेत्रों की तुलना में 40% कम थे। इसका कारण सिर्फ़ पुलिस की मौजूदगी नहीं, बल्कि सामुदायिक विश्वास था, जो अपराध को रोकने का सबसे बड़ा हथियार था।

पर आज का सच कुछ और है। शहरीकरण ने हमें ऊँची-ऊँची दीवारें दीं, पर रिश्तों की गर्मी छीन ली। आज के घरों में ताले ही नहीं, सीसीटीवी कैमरे, मोशन सेंसर, और बायोमेट्रिक लॉक तक हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 2023 तक सिक्योरिटी सिस्टम का बाज़ार 2.5 बिलियन डॉलर का हो चुका था, और हर साल इसमें 12% की वृद्धि हो रही है। ये आँकड़े बताते हैं कि हम सुरक्षा पर कितना निवेश कर रहे हैं, पर क्या ये यह भी नहीं दिखाते कि हमारा भरोसा कितना कम हो गया है? आज हम पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते, लेकिन उसके घर में लगे कैमरे की रेंज ज़रूर जानते हैं।

क्या वजह है इस बदलाव की? क्या हम सचमुच इतने असुरक्षित हो गए हैं, या हमने अपने मन में डर का ताला लगा लिया है? मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, शहरी जीवनशैली में बढ़ता तनाव और अलगाव लोगों में विश्वास की कमी का बड़ा कारण है। जब हम हर अनजान चेहरे को शक की नज़र से देखते हैं, तो हम न सिर्फ़ रिश्तों को खोते हैं, बल्कि अपनी मानसिक शांति भी गँवा देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में 20% लोग किसी न किसी रूप में चिंता से ग्रस्त हैं, और इसका एक बड़ा कारण सामाजिक अलगाव है।

पहले के ज़माने में विश्वास एक सामाजिक पूँजी थी। गाँवों में आज भी कुछ जगहों पर यह देखने को मिलता है। वहाँ बच्चा किसी के भी घर चला जाए, उसे रोटी मिल जाती है। वहाँ ताले नहीं, रिश्ते पहरा देते हैं। एक छोटा-सा उदाहरण लें — उत्तराखंड के कुछ गाँवों में आज भी लोग अपने घरों को बिना ताला लगाए छोड़ जाते हैं, क्योंकि उन्हें यकीन है कि पड़ोसी उनकी गैरहाज़िरी में घर की देखभाल कर लेगा। ये विश्वास सिर्फ़ परंपरा नहीं, एक जीवनशैली है, जो हमें याद दिलाती है कि इंसानियत अभी बाकी है।

लेकिन शहरों में कहानी अलग है। यहाँ हर दरवाज़े पर ताला है, और हर ताले के पीछे एक डर। हमने तकनीक को इतना गले लगाया कि सहजता को भूल गए। आज हम अपने घर को स्मार्ट लॉक से सुरक्षित करते हैं, लेकिन पड़ोसी के साथ एक कप चाय की गर्माहट को भूल जाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत के शहरी क्षेत्रों में 60% लोग अपने पड़ोसियों के साथ कोई सामाजिक संबंध नहीं रखते। यह आँकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं, बल्कि हमारे बदलते सामाजिक ढाँचे की तस्वीर है।

वो ज़माना कुछ और ही था, जब घरों की दीवारें भले ही मिट्टी की होती थीं, पर दिलों में भरोसे की ईंटें जड़ी होती थीं। एक गाँव में एक बुजुर्ग दंपति रहते थे, जिनका दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता था।  एक बार किसी ने उनसे पूछा, आपको डर नहीं लगता कि कोई चोरी कर लेगा? उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया — जो ले जाएगा, उसे शायद हमसे ज़्यादा ज़रूरत होगी। यह जवाब सिर्फ़ शब्द नहीं, एक दर्शन था — विश्वास का दर्शन। उस दौर में लोग लोग तिजोरियाँ नहीं, रिश्ते बचाते थे; डर से नहीं, भरोसे से जीते थे।

आज हमें यह तय करना है कि हम कैसा समाज चाहते हैं। क्या हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे एक ऐसी दुनिया में बड़े हों, जहाँ हर दरवाज़े पर कैमरा हो और हर रिश्ते पर सवाल? या हम चाहते हैं कि वे उस विश्वास की गर्माहट को जानें, जो कभी हमारे समाज की रीढ़ थी? तकनीक को रोकना मुमकिन नहीं, लेकिन विश्वास को फिर से जगाना हमारे हाथ में है। शुरुआत छोटी-छोटी चीज़ों से हो सकती है — किसी अनजान बच्चे को मुस्कुराकर देखना, किसी पड़ोसी की मदद बिना शर्त करना, या किसी मेहमान को बिना सवाल किए घर में जगह देना।

विश्वास कोई जटिल विज्ञान नहीं है; यह एक साधारण मानवीय भावना है। जब हम किसी पर भरोसा करते हैं, तो हम न सिर्फ़ उनके लिए, बल्कि अपने लिए भी एक बेहतर दुनिया बनाते हैं। क्योंकि जो रिश्ते भरोसे से बनते हैं, उन्हें चाभियों की ज़रूरत नहीं पड़ती। जो दरवाज़े अपनत्व से खुलते हैं, वे कभी बंद नहीं होते। आज जब हम अपने घरों को तालों से लैस कर रहे हैं, तो एक बार ठहरकर सोचें — क्या हम सिर्फ़ अपने घरों को सुरक्षित कर रहे हैं, या अपने दिलों को भी बंद कर रहे हैं? ताले अब भी खुल सकते हैं। बस उस पुरानी चाभी को ढूँढना होगा, जो धूल में छुपी है। उसे साफ़ कीजिए, और देखिए — न सिर्फ़ दरवाज़ा, बल्कि पूरी दुनिया खुलने लगेगी।



प्रो. आरके जैन अरिजीत, बड़वानी (मप्र)

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