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आर्कटिक अलार्म: बढ़ती गर्मी, पिघलता भविष्य

 

आर्कटिक अलार्म: बढ़ती गर्मीपिघलता भविष्य

[डूबते गांव, पिघलती जमीन और खामोश होती संस्कृतियां]
 [बर्फ से बाढ़ तक: आर्कटिक में बदलता प्रकृति का गणित]


·प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


आर्कटिक क्षेत्र, जिसे कभी पृथ्वी का प्राकृतिक रेफ्रिजरेटर कहा जाता था, आज जलवायु परिवर्तन की सबसे तीव्र और स्पष्ट चेतावनी बनकर उभर रहा है। अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) की आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड 2025 के अनुसार, अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 तक का जल वर्ष 1900 के बाद सबसे अधिक गर्म दर्ज किया गया। इस अवधि में सतही वायु तापमान 1991–2020 के औसत से 1.6 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। शरद ऋतु 2024 अब तक की सबसे गर्म रही, जबकि सर्दी 2025 दूसरी सबसे गर्म। यह स्थिति “आर्कटिक एम्प्लीफिकेशन” की पुष्टि करती है, जिसमें यह क्षेत्र 2006 से वैश्विक औसत से दो गुना से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। यह केवल तापमान वृद्धि नहीं, बल्कि पूरे आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र के गहरे और स्थायी बदलाव का संकेत है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर पड़ रहा है।

इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव आर्कटिक की समुद्री बर्फ पर दिखाई दे रहा है। मार्च 2025 ने समुद्री बर्फ के अधिकतम विस्तार का ऐतिहासिक निचला रिकॉर्ड बनाया, और सितंबर का न्यूनतम स्तर भी अब तक के दस सबसे कम स्तरों में शामिल रहा। 1980 के दशक की तुलना में पुरानी और मोटी बहुवर्षीय बर्फ लगभग 95 प्रतिशत तक घट चुकी है। बर्फ के पिघलने से “अल्बेडो प्रभाव” कमजोर हो रहा है, क्योंकि सफेद सतह की जगह गहरा समुद्र सूर्य की अधिक ऊष्मा सोख लेता है। इसके कारण समुद्री सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है, विशेषकर उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में। ग्रीनलैंड आइस शीट ने अकेले 2025 में लगभग 129 अरब टन बर्फ खोई, जो समुद्र स्तर वृद्धि को तेज कर रही है और आर्कटिक को कम-बर्फ वाले नए युग की ओर धकेल रही है।

परमाफ्रॉस्ट का पिघलना इस गर्मी का सबसे खतरनाक और दीर्घकालिक परिणाम बनता जा रहा है। 2024 में उत्तरी अमेरिका और स्वालबार्ड जैसे क्षेत्रों में परमाफ्रॉस्ट का तापमान अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसके पिघलने से जमीन में दबे खनिज और धातुएं नदियों में घुलने लगी हैं, जिसके कारण अलास्का की 200 से अधिक नदियां नारंगी रंग की दिखाई देने लगी हैं। इन्हें “रस्टिंग रिवर्स” कहा जा रहा है। ये नदियां अधिक अम्लीय और विषैली होती जा रही हैं, जिससे पेयजल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और मछलियों का जीवन संकट में है। यह परिवर्तन जल गुणवत्ता और पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, जो वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय है।

आर्कटिक की टुंड्रा का हरा होना पहली नजर में सकारात्मक लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह एक गहरे संकट का संकेत है। वर्ष 2025 में टुंड्रा की हरियाली 26 वर्षों के सैटेलाइट रिकॉर्ड में तीसरे सबसे ऊंचे स्तर पर रही और पिछले छह वर्षों से लगातार रिकॉर्ड या उसके करीब बनी हुई है। लंबे और गर्म बढ़ते मौसम के कारण झाड़ियां और छोटे पेड़ तेजी से फैल रहे हैं, जिसे “बोरियलाइजेशन” कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप पारंपरिक आर्कटिक वनस्पतियां और जीव पीछे हट रहे हैं। ध्रुवीय भालू, सील और अन्य बर्फ-निर्भर प्रजातियों का आवास लगातार सिकुड़ रहा है। यह परिवर्तन पारिस्थितिक संतुलन को तोड़ रहा है और स्वदेशी समुदायों की जीवनशैली को गहरे संकट में डाल रहा है।

वर्षा पैटर्न में आए बदलाव भी उतने ही चिंताजनक हैं। अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच आर्कटिक में वर्षा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जबकि वसंत ऋतु अब तक की सबसे अधिक वर्षा वाली रही और अन्य मौसम भी शीर्ष पांच में शामिल रहे। गर्म वातावरण अधिक नमी धारण करता है, जिससे भारी बारिश और अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे हाइड्रोलॉजिकल चक्र तेज हो गया है, नदियों के बहाव का स्वरूप बदल रहा है और तटीय कटाव में तेजी आ रही है। कई स्वदेशी गांव डूबने या स्थानांतरण के खतरे का सामना कर रहे हैं, जबकि सड़कें, घर और बुनियादी ढांचा अस्थिर हो रहे हैं। यह बढ़ती नमी और अनिश्चितता आर्कटिक को पहले से कहीं अधिक अस्थिर और अप्रत्याशित क्षेत्र बना रही है, जिसका प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणालियों पर भी पड़ता है।

आर्कटिक महासागर में 'एटलांटिफिकेशन' की प्रक्रिया तेज हो रही है, जहां अटलांटिक से गर्म और नमकीन पानी उत्तर की ओर बढ़ रहा है, जो समुद्री बर्फ को पिघला रहा है और महासागरीय परतों को कमजोर कर रहा है। इससे समुद्री सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, विशेषकर अगस्त 2025 में बर्फ-मुक्त क्षेत्रों में। यह परिवर्तन बोरियल प्रजातियों को उत्तर की ओर धकेल रहा है, जबकि आर्कटिक मछलियों और जीवों के आवास बदल रहे हैं। चुकची और उत्तरी बेरिंग सागर में क्लोरोफिल वृद्धि से मत्स्य पालन प्रभावित हो रहा है, जो स्वदेशी समुदायों की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। जून में बर्फ कवर आधा रह गया है, जो अल्बेडो को और कम कर रहा है। ये जुड़े बदलाव आर्कटिक को एक नए, अस्थिर पारिस्थितिकी तंत्र में बदल रहे हैं, जिसका वैश्विक कार्बन चक्र और मौसम पर गहरा असर पड़ रहा है। 

इन सभी परिवर्तनों का असर केवल आर्कटिक तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया तक फैल रहा है। आर्कटिक एम्प्लीफिकेशन जेट स्ट्रीम को कमजोर और लहरदार बना रहा है, जिससे उत्तरी गोलार्ध में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। कहीं भीषण गर्मी पड़ रही है तो कहीं असामान्य ठंड और लंबे समय तक टिकने वाली मौसमी गड़बड़ियां देखने को मिल रही हैं। समुद्र स्तर में वृद्धि तटीय शहरों और द्वीपीय देशों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। एनओएए की रिपोर्ट में शामिल 112 वैज्ञानिकों ने चेताया है कि आर्कटिक अब तेजी से एक गर्म, अधिक गीले और अप्रत्याशित क्षेत्र में बदल रहा है। यह बदलाव न केवल स्थानीय संस्कृतियों और जैव विविधता के लिए, बल्कि पूरे ग्रह की स्थिरता के लिए खतरा है।

आर्कटिक में दर्ज यह रिकॉर्ड गर्मी सीधे तौर पर मानव गतिविधियों, विशेषकर जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, का परिणाम है। फिर भी यह संकट केवल चेतावनी नहीं, बल्कि कार्रवाई का अवसर भी देता है। यदि समय रहते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती की जाए, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए और संरक्षण नीतियों को मजबूती मिले, तो सबसे विनाशकारी परिणामों को टाला जा सकता है। स्वदेशी समुदायों की भागीदारी और उनका पारंपरिक ज्ञान, जैसे सेंट पॉल आइलैंड की निगरानी प्रणालियां, वैज्ञानिक प्रयासों को अधिक प्रभावी बना सकती हैं। आर्कटिक की बदलती स्थिति हमें याद दिलाती है कि पृथ्वी एक साझा प्रणाली है। इसकी पुकार को अनसुना करना भविष्य से मुंह मोड़ने जैसा होगा; इसे सुनना और उस पर कार्य करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)



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