अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस: संसदों के अंतर्मंथन का क्षण
[लोकतंत्र का संस्कारगृह – संसद और सतत समावेश]
जब हम किसी राष्ट्र की आत्मा को समझने की कोशिश करते हैं, तो सबसे पहले हमारे सामने उसकी संसद की छवि उभरती है—वह पवित्र मंच, जहाँ जनता की आकांक्षाएँ, चिंताएँ और अधिकार एक स्वर में गूंजते हैं। संसद केवल कानूनों का कारखाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का वह जीवंत हृदय है, जो हर नागरिक की धड़कनों को प्रतिबिंबित करता है। इस जीवंतता को वैश्विक स्तर पर और सशक्त करने के लिए हर साल 30 जून को अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल संसदों की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि उनके दायित्वों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा में गहन चिंतन का अवसर है। यह एक ऐसा आह्वान है, जो संसदों को याद दिलाता है कि वे केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता की आवाज़, विश्वास और उम्मीदों का प्रतीक हैं।
इस महत्वपूर्ण दिवस की शुरुआत 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के माध्यम से हुई, जब 30 जून को अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस के रूप में मान्यता दी गई। यह तारीख संयोगवश 1889 में स्थापित इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन (आईपीयू) की स्थापना की वर्षगांठ से भी जुड़ी है। आईपीयू वह वैश्विक संगठन है, जिसने 136 साल पहले संसदों को एक मंच पर लाकर वैश्विक संवाद, शांति और लोकतंत्र को बढ़ावा देने की नींव रखी। इसका नारा—“लोकतंत्र के लिए, सभी के लिए” और उद्देश्य “संसदों के माध्यम से विश्व शांति और विकास के लिए हर आवाज़ को सुनना” आज भी उतना ही प्रासंगिक है। 2025 में इस दिवस की थीम “संसद और सतत विकास लक्ष्य: लैंगिक समानता और समावेशिता” न केवल समय की मांग है, बल्कि लोकतंत्र की सच्ची आत्मा को उजागर करती है। यह थीम हमें याद दिलाती है कि कोई भी लोकतंत्र तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसमें हर वर्ग—महिलाएँ, युवा, हाशिए पर पड़े समुदाय, और सामाजिक रूप से उपेक्षित लोग—की समान भागीदारी सुनिश्चित न हो।
आज विश्व संयुक्त राष्ट्र के 2030 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। इन 17 लक्ष्यों में लैंगिक समानता (एसडीजी-5) और मज़बूत, समावेशी संस्थानों का निर्माण (एसडीजी-16) संसदों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर संसदों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी केवल 26% है (आईपीयू, 2023), जबकि भारत में यह आंकड़ा और भी कम, लगभग 14.4% (लोकसभा, 2024) है। यह असंतुलन न केवल लैंगिक समानता के लिए चुनौती है, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है। संसदें नीतियां बनाती हैं, संसाधनों का आवंटन करती हैं और सरकार को जवाबदेह बनाती हैं। लेकिन अगर इन नीतियों में आधी आबादी की आवाज़ शामिल नहीं है, तो क्या यह लोकतंत्र वास्तव में “सभी के लिए” है?
भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इस संदर्भ में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारतीय संसद, लोकसभा और राज्यसभा, करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं का केंद्र है। यह वह मंच है, जहाँ 1.4 अरब लोगों की विविधता को एक स्वर में ढाला जाता है। लेकिन इस विविधता को प्रतिबिंबित करने के लिए संसद को और अधिक समावेशी होना होगा। उदाहरण के लिए, नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान एक ऐतिहासिक कदम है, लेकिन इसका पूर्ण कार्यान्वयन अभी बाकी है। इसी तरह, युवाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों जैसे आदिवासियों, दलितों, और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को संसद में अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, लेकिन संसद में युवा सांसदों की संख्या केवल 12% के आसपास है। यह असंतुलन न केवल नीतियों को प्रभावित करता है, बल्कि युवाओं के बीच राजनीतिक संस्थानों के प्रति विश्वास को भी कम करता है।
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस हमें उन मूलभूत सवालों से रूबरू कराता है, जो अक्सर संसदीय बहसों के शोर में दब जाते हैं। क्या संसदें जनता के सबसे ज़रूरी मुद्दों को प्राथमिकता दे रही हैं? क्या वे लैंगिक भेदभाव, सामाजिक असमानता और पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठा रही हैं? आईपीयू की 2022 की वैश्विक संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, केवल 40% संसदों ने ही सतत विकास लक्ष्यों को अपनी नीतियों में स्पष्ट रूप से शामिल किया है। यह आंकड़ा चेतावनी देता है कि संसदों को अपनी भूमिका को और अधिक सक्रिय और प्रभावी बनाना होगा। भारत में, उदाहरण के लिए, संसद ने जलवायु परिवर्तन (एसडीजी-13) और शिक्षा (एसडीजी-4) जैसे क्षेत्रों में कई नीतियां बनाई हैं, लेकिन उनकी निगरानी और कार्यान्वयन में कमी दिखती है।
संसदों की जवाबदेही और पारदर्शिता लोकतंत्र की नींव है। आईपीयू के अनुसार, विश्व की 80% संसदें अब डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर रही हैं, जैसे कि ऑनलाइन सत्र, ई-वोटिंग, और नागरिक संवाद मंच। भारत में भी डिजिटल संसद पहल के तहत संसद के सत्रों को डिजिटल रूप से प्रसारित किया जा रहा है, लेकिन नागरिकों की सीधी भागीदारी अभी भी सीमित है। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि संसदें न केवल नीतियां बनाएं, बल्कि नागरिकों के साथ सीधा संवाद स्थापित करें। उदाहरण के लिए, न्यूज़ीलैंड और कनाडा जैसे देशों में “संसदीय ओपन डे” जैसे आयोजन होते हैं, जहाँ आम लोग संसद में जाकर अपने सांसदों से मिल सकते हैं। भारत में भी इस तरह की पहल लोकतंत्र को और जीवंत बना सकती हैं।
इस दिवस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह संसदों को आत्म-मूल्यांकन का अवसर देता है। क्या संसदें वास्तव में समावेशी हैं? क्या वे बदलते समय के साथ तालमेल बिठा रही हैं? आईपीयू की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की केवल 20% संसदों में ही लैंगिक समानता और समावेशिता के लिए विशेष समितियाँ हैं। भारत में, हालाँकि संसद में महिला सशक्तीकरण समिति जैसी संरचनाएँ हैं, लेकिन इनका प्रभाव अभी व्यापक नहीं हुआ है। यह समय है कि संसदें न केवल कानून बनाएं, बल्कि स्वयं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और जवाबदेह बनाने के लिए नवाचार करें।
नागरिकों की भूमिका भी इस दिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र केवल संसद तक सीमित नहीं है; यह जनता की जागरूकता और भागीदारी से जीवित रहता है। हम कितनी बार अपने सांसदों से सवाल पूछते हैं? कितनी बार संसद के सत्रों पर ध्यान देते हैं? भारत में, आरटीआई (सूचना का अधिकार) जैसे उपकरणों ने नागरिकों को सशक्त किया है, लेकिन संसदीय कार्यवाहियों में उनकी भागीदारी अभी भी न्यूनतम है। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र एक दोतरफा प्रक्रिया है, संसद को जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा, और जनता को संसद के प्रति जागरूक।
30 जून केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है—एक संकल्प कि संसदें केवल सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली आवाज़ें न बनें, बल्कि समाज के हर कोने तक समानता, न्याय और विकास की गूंज पहुँचाएँ। जब संसदें हर नागरिक की आवाज़ को सुनेंगी—चाहे वह एक महिला हो, एक युवा हो, या समाज के हाशिए पर खड़ा व्यक्ति—तब ही लोकतंत्र एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवनशैली बनेगा। यह दिवस हमें यह विश्वास दिलाता है कि संसदें केवल कानून बनाने वाली इमारतें नहीं, बल्कि वे मंदिर हैं, जहाँ मानवता की आकांक्षाएँ आकार लेती हैं। इस 30 जून को हम संकल्प लें कि हमारी संसदें न केवल सशक्त होंगी, बल्कि संवेदनशील, समावेशी और सतत विकास की दिशा में मार्गदर्शक भी बनेंगी। यही लोकतंत्र की सच्ची जीत होगी।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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