पसीने से सींची धरती, फिर भी अधूरी जिंदगी
[नीतियों और हकीकत के बीच पिसते किसान]
[अन्नदाता की पीड़ा: आंकड़ों और हकीकत का सच]
धरती की गोद में पसीने की बूँदें जब अन्न की बाली बनकर लहलहाती हैं, तो सभ्यता की नींव को अटल बल मिलता है। ये मेहनतकश हाथ, जो सुबह की पहली किरण के साथ खेतों में उतरते हैं और रात की चाँदनी में उम्मीदों को सींचते हैं, राष्ट्र की भूख मिटाने वाले सच्चे सिपाही हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ये छोटे किसान, जिनके कंधों पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी है, अपनी ख्वाहिशों को अधूरा छोड़कर चुपके से दुनिया से विदा ले जाते हैं। एक पक्का मकान, बच्चों की अच्छी तालीम, बेटी की शादी, या बस सम्मान की एक नजर—ये साधारण सपने भारत के ग्रामीण हकीकत की सबसे मार्मिक कहानी बन गए हैं।
छोटे किसान, जिनके पास मुश्किल से एक-दो हेक्टेयर ज़मीन होती है, अपनी जिंदगी को खेतों की मेड़ों पर बुनते हैं। कृषि मंत्रालय के 2020-21 के आँकड़े बताते हैं कि भारत के 86% किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन है। इनका सपना बस इतना—मेहनत का फल परिवार की मुस्कान बने, बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर जिंदगी पाएँ, और घर में दो वक्त की रोटी की कमी न हो। मगर ये सपने मंडी की मार, दलालों की चाल, और सरकारी वादों की अंतहीन कतारों में उलझकर टूट जाते हैं। एनएसएसओ की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे किसानों की औसत मासिक आय मात्र 10,218 रुपये है, जिसमें से आधा से ज्यादा खेती की लागत और कर्ज़ की किश्तों में खप जाता है।
खेती की बढ़ती लागत ने छोटे किसानों की कमर तोड़ दी है। बीज, उर्वरक, और कीटनाशकों की कीमतें हर साल आसमान छूती हैं। आईसीएआर के मुताबिक, 2004 से 2020 के बीच उर्वरकों की लागत 300% तक बढ़ी, जबकि फसलों के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े। आधुनिक मशीनें छोटे किसानों के लिए दूर का सपना हैं। जहाँ बड़े किसान ट्रैक्टर और ड्रोन का इस्तेमाल करते हैं, वहीं छोटे किसान हल और बैल के सहारे खेत जोतते हैं। सिंचाई की समस्या अलग मुसीबत है। नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत का 52% कृषि क्षेत्र आज भी बारिश पर निर्भर है। जब बारिश बेवफाई करती है, तो खेत सूख जाते हैं, और उनके साथ किसान के सपने भी मुरझा जाते हैं।
कर्ज की जंजीरों में जकड़ा छोटा किसान, अपने सपनों और सम्मान की तलाश में भटक रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2021 के आँकड़े चीख-चीखकर बताते हैं कि हर साल 10,000 से अधिक किसान कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर लेते हैं। बैंक कर्ज की प्रक्रिया इतनी उलझी और धीमी है कि किसान स्थानीय साहूकारों के चंगुल में फँस जाता है, जहाँ 36% से 60% की ब्याज दरें उसे कर्ज के गहरे गड्ढे में धकेल देती हैं। पक्का मकान, बेटी की शादी, या बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना इस भूलभुलैया में दम तोड़ देता है।
किसान को समाज ‘अन्नदाता’ कहता है, मगर उसकी मेहनत को वह सम्मान नहीं मिलता, जिसका वह हकदार है। एनसीआरबी के आँकड़े और अखबारों की सुर्खियाँ किसानों की बदहाली की दास्तान बयाँ करती हैं, पर नीतिगत बदलाव की राह धुंधली रहती है। चुनावी वादों में किसान मुद्दे गूँजते हैं, मगर जमीनी हकीकत में ये वादे खोखले साबित होते हैं। 2022 में केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू करने का दावा किया, लेकिन भारतीय किसान यूनियन की रिपोर्ट बताती है कि 70% से ज्यादा छोटे किसानों को उनकी उपज का एमएसपी नहीं मिलता। मंडियों में दलालों और बिचौलियों का जाल आज भी अटूट है।
सरकारी योजनाएँ—किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा योजना, या पीएम-किसान सम्मान निधि—कागजों पर चमकती हैं, लेकिन हकीकत में छोटे किसानों तक इनकी रोशनी नहीं पहुँचती। 2023 की कैग रिपोर्ट ने खुलासा किया कि पीएम-किसान योजना का लाभ 20% से ज्यादा पात्र किसानों तक नहीं पहुँचा, क्योंकि आधार कार्ड या बैंक खाते की जानकारी अपडेट नहीं थी। भ्रष्टाचार और जटिल कागजी प्रक्रियाएँ इन योजनाओं को छोटे किसानों के लिए मृगतृष्णा बना देती हैं। नतीजतन, बच्चों को बेहतर शिक्षा या खेतों में नई तकनीक लाने जैसे उनके सपने कागजों में ही सिमटकर रह जाते हैं।
सबसे मार्मिक है ग्रामीण युवाओं का खेती से पलायन। 2021 के एक सर्वे के मुताबिक, 40% से ज्यादा ग्रामीण युवा खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी या छोटे-मोटे कामों की ओर जा रहे हैं। छोटा किसान चाहता है कि उसका बेटा खेतों से जुड़े, उसकी जमीन पीढ़ियों तक हरी-भरी रहे। मगर आर्थिक तंगी और खेती में घाटे ने इस सपने को भी कुचल दिया है। गाँवों में खेत खाली हो रहे हैं, मेड़ें सूनी पड़ रही हैं। यह पलायन न केवल किसान के सपनों की हार है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर संकट है। छोटे किसानों की अधूरी ख्वाहिशें केवल उनकी निजी त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। किसान की समृद्धि के बिना देश की खाद्य सुरक्षा अधर में लटकी रहेगी। नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक भारत में खाद्य मांग 30% बढ़ सकती है। ऐसे में, छोटे किसानों को सशक्त करना केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अनिवार्यता है।
इन ख्वाहिशों को हकीकत में बदलने के लिए ठोस और त्वरित कदम जरूरी हैं। पहला, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देकर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना होगा। दूसरा, सस्ते कर्ज की व्यवस्था, जिसमें ब्याज दर 4% से अधिक न हो, और ऋण प्रक्रिया को सरल बनाना होगा। तीसरा, ड्रोन, स्मार्ट सिंचाई, और जैविक खेती जैसी आधुनिक तकनीकों की पहुंच बढ़ानी होगी, ताकि लागत कम हो और उत्पादन बढ़े। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएं, जो युवाओं को खेती को आधुनिक, सम्मानजनक और लाभकारी पेशे के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करें। इसके अलावा, समाज की मानसिकता में बदलाव लाना सबसे महत्वपूर्ण है। किसान को केवल गरीब या मजबूर का तमगा देने के बजाय उसे राष्ट्र का आधार और अन्नदाता मानकर सम्मान देना होगा। उनकी मेहनत और योगदान को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि नई पीढ़ी उनकी महत्ता को गहराई से समझे।
जब सरकार और समाज मिलकर छोटे किसानों के सपनों को पंख देंगे, तभी उनके खेतों में फसलें ही नहीं, बल्कि समृद्धि और उम्मीद की हरियाली भी लहलहाएगी। यह मेहनतकश अन्नदाता, जो अपने पसीने से धरती को सींचता है, तब तक अधूरा रहेगा, जब तक हम सब उसकी ख्वाहिशों को पूरा करने का संकल्प नहीं लेंगे। यह केवल किसान की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की कहानी है, जिसकी आत्मा गांवों में बसती है। छोटे किसानों के सपनों को साकार करके ही भारत सही मायनों में आत्मनिर्भर और समृद्ध बनेगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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