आधी आबादी की ऊर्जा, जो पूरे भविष्य को दिशा देती है
[नारी को अवसर, समाज को विकास: देना है तो पाना है]
[जन्म देने वाली को जन्म दो अवसरों का, जग जन्म लेगा नया]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
कभी-कभी इतिहास के सबसे गहरे प्रश्न एक साधारण-से वाक्य में सिमट जाते हैं। “देना है, तो पाना है” ऐसा ही वाक्य है—सुनने में सरल, पर समाज के भविष्य की गहन सच्चाई को उजागर करने वाला। हम प्रायः भूल जाते हैं कि सभ्यता केवल इमारतों, मशीनों और नीतियों से नहीं बनती, बल्कि उन हाथों से आकार लेती है जो जीवन को जन्म देते हैं, उसे सँभालते हैं और उसे दिशा देते हैं। ये हाथ नारी के हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जिसने मानवता को जन्म दिया, उसे ही समानता पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 2026 की थीम “देना है, तो पाना है” इसी विडंबना को चुनौती देती है और स्पष्ट करती है कि यदि समाज सच में प्रगति चाहता है, तो उसे नारी को अवसर देना ही होगा, क्योंकि यही वह बीज है जिससे विकास का वृक्ष फलता-फूलता है।
इतिहास की परतें खोलें तो एक अत्यंत रोचक सत्य उजागर होता है। मानव सभ्यता की पहली शिक्षक, पहली चिकित्सक और पहली प्रबंधक कोई और नहीं, बल्कि महिला ही थी। प्राचीन समाजों में बच्चों को जीवन के मूल संस्कार माँ से मिलते थे, औषधियों का ज्ञान भी प्रायः महिलाओं के पास होता था, और घर-परिवार के संसाधनों का प्रबंधन भी वही करती थीं। यानी सभ्यता की बुनियादी व्यवस्थाएँ उसी के हाथों में थीं। लेकिन समय के साथ सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण की होड़ बढ़ी और महिलाओं को धीरे-धीरे निर्णयों से दूर कर दिया गया। यह केवल सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि मानव विकास की बड़ी चूक भी थी। क्योंकि जब आधी आबादी की प्रतिभा सीमित कर दी जाती है, तो समाज की रचनात्मक ऊर्जा भी आधी रह जाती है। इसलिए आज महिला सशक्तिकरण केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि सभ्यता की पूरी क्षमता को विकसित करने का प्रश्न है।
“देना है, तो पाना है” का अर्थ केवल इतना नहीं कि महिलाओं को अवसर दें और बदले में विकास पाएँ। इसका एक और गहरा पहलू है, जो अक्सर चर्चा में नहीं आता। जब किसी समाज में महिलाओं को सम्मान मिलता है, तो वहाँ संवेदनशीलता और संतुलन भी बढ़ता है। शोध बताते हैं कि जहाँ महिलाओं की भागीदारी निर्णयों में अधिक होती है, वहाँ नीतियाँ अधिक मानवीय और दीर्घकालिक होती हैं। उदाहरण के लिए, जब किसी गाँव की पंचायत में महिलाएँ सक्रिय होती हैं, तो वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यानी नारी केवल अपने लिए नहीं सोचती, वह समाज की व्यापक भलाई के बारे में भी सोचती है। इसलिए नारी को अवसर देना केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि सामूहिक समृद्धि की दिशा में उठाया गया कदम है।
जब समाज अपनी संभावनाओं को पहचानता है, तब नारी की शक्ति स्पष्ट रूप में सामने आती है। आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, और उनकी उपलब्धियों के पीछे केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग भी होता है। जब कोई लड़की वैज्ञानिक बनती है, तो उसके पीछे परिवार का विश्वास होता है। जब कोई महिला उद्यमी बनती है, तो उसके पीछे समाज का समर्थन होता है। यही “देना है, तो पाना है” का अर्थ है। समाज जब महिलाओं को शिक्षा, संसाधन और स्वतंत्रता देता है, तो वे उसे कई गुना लौटाती हैं। एक शिक्षित महिला केवल अपना जीवन नहीं बदलती, बल्कि पूरे परिवार के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाती है। इसलिए कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि किसी भी देश के विकास के लिए महिलाओं की शिक्षा में निवेश सबसे प्रभावी होता है।
फिर भी यह सच है कि दुनिया अभी पूरी तरह समानता तक नहीं पहुँची है। आज भी अनेक महिलाएँ ऐसी परिस्थितियों में जी रही हैं जहाँ उनके सपनों को सीमित कर दिया जाता है। कई जगहों पर लड़कियों की पढ़ाई जल्दी छूट जाती है, कई कार्यस्थलों पर उन्हें बराबरी का वेतन नहीं मिलता और कई समाजों में उनके निर्णयों को महत्व नहीं दिया जाता। लेकिन आज का दौर एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत भी दे रहा है। महिलाएँ अब अपनी पहचान को लेकर अधिक सजग हैं और वे अपने अधिकारों के लिए खुलकर आवाज उठा रही हैं। डिजिटल तकनीक और शिक्षा ने उन्हें एक ऐसा मंच दिया है जहाँ उनकी बात दुनिया तक पहुँच सकती है। यह बदलाव धीरे-धीरे एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दे रहा है, जिसमें समानता केवल आदर्श नहीं, बल्कि आवश्यकता बनती जा रही है।
वास्तविक परिवर्तन तभी जन्म लेता है, जब विचार जीवन के व्यवहार में उतरता है। सबसे पहली शुरुआत परिवार से हो सकती है। जब घर में बेटियों और बेटों को समान अवसर मिलते हैं, तभी समाज में समानता की नींव मजबूत होती है। शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में संवेदनशील बनाना होगा, ताकि लड़कियाँ केवल पढ़ाई ही न करें, बल्कि नेतृत्व और नवाचार के लिए भी प्रेरित हों। कार्यस्थलों को ऐसा वातावरण देना होगा जहाँ महिलाएँ सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। राजनीति और प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ाना भी आवश्यक है, क्योंकि निर्णय लेने वाली मेज पर उनकी उपस्थिति समाज के दृष्टिकोण को संतुलित बनाती है।
समय हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन केवल शब्दों से नहीं, जिम्मेदारियों से जन्म लेता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि एक जिम्मेदारी भी सौंपता है। यह जिम्मेदारी है एक ऐसे समाज के निर्माण की, जहाँ नारी को अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़े। “देना है, तो पाना है” का संदेश हमें याद दिलाता है कि जब हम महिलाओं को अवसर, सम्मान और विश्वास देते हैं, तो हम वास्तव में अपने ही भविष्य को मजबूत बना रहे होते हैं। क्योंकि नारी केवल जीवन की जननी नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक भी है। जब वह आगे बढ़ती है, तो समाज की दिशा बदल जाती है। इसलिए आज का संकल्प यही होना चाहिए कि महिला सशक्तिकरण को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे जीवन की स्थायी संस्कृति बनाया जाए। तभी यह सिद्धांत सच होगा कि देना ही सबसे बड़ा पाना है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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