धरती नाम दिया हमने सीता को
पतिव्रता नाम दिया हमने द्रौपदी को
श्रेष्ठ माता नाम दिया हमने कुंति को
पर कौन सा नाम दिया हमने ऊर्मिला को?
विरह की ज्वालामुखि मन में रखकर
सोने के पिंजरे में बंद पक्षी बनकर
बिन आत्मा के शरीर में रहकर
करती रही अपनी आत्मा का इंतजार।
कैसे होंगे मेरे प्राण
क्या करते होंगे खान-पान
किस मृग ने किया होगा आक्रमण
प्रभु, रक्षा करना मेरे प्राण।
दूसरों के सुख को देखकर
बच्चों की कोमल वाणी सुनकर
आती हैं मन में आशाओं के बहार
बस करती रही स्वामी का इंतजार।
प्रो.संगमेश ब.नानन्नवर
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