छट गये है दुखों के बादल संन्यासी
अरे शशांक का दामन छोड़ चलो।
ओस की कुछ बूँदे गिरी है पुष्पों पर
उसे होंठ लगाकर,बंधन तोड़ चलो
उस इक स्पर्श से तेरे भौरें मन को
एक सदी का अद्भुत ठहराव मिला
लय कर लो उसी में खुद को पगले
तुमको देखो सुनहरा प्रस्ताव मिला
सूर्य नही ,दिवाकर नही उनसे परे
आकाश मध्य की प्रदीप्त ज्योति है
कुण्डलिनी जागरण में साधो'शांति'
यही उस योग की अनुभवी उक्ति है
©प्रणव मिश्र'तेजस'
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