गीत गा रहा हूँ सुनने आओ तुम,
साँझ होने को है चली आओ तुम।
अब ये उदासी जहर लगने लगी है,
पीयूष का पता आकर बताओ तुम।।
देखो अम्बर भी धरा से जा मिला है।
मैं तेरा ही हूँ मुझसे क्या गिला है?
तोड़ का सारी हदों को आ रही हो?
या अब उन्ही में सिमटती जा रही हो?
देख कर सन्देश पुराने जी रहे हैं।
मिलन आश में साँसों को गिन रहे हैं।
वो बहुत वादों का सिलसिला रहा था
तेरी झूठी बातों में मैं फँसा था।
अब ये मेरा भ्रम आकर तोड़ दो तुम
खुशी से जी रही हो बस यह कहो तुम।
प्रणव मिश्र'तेजस'
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