पाँओं में नाकामियों के छाले है,
जाने कैसे ख़ुदको हम सम्हाले है।
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अभी जो हमदर्दी जता के लौटा है,
हर नुक्कड़ पे पगड़ी वही उछाले है।
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शायद वो ऐ वै ही मुस्कुराया था,
हमने भी क्या कुछ माने निकाले है।
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क़िस्मत के खेल में मिरा नाम ही नहीं,
ख़ुदाया फिर क्यूँ वो पर्ची उछाले है।
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ये घर मुझ को अपना घर नहीं लगता,
दीवार पे बस जाले ही जाले है।
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इसी उम्मीद पे चला चलता हूँ 'नूर',
इक मोड़ मुड के ज़ीस्त में उजाले है।
निलेश शेवगांवकर "नूर"
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