by Nilesh Shevgaonkar
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झूठी थी उम्मीद सो टूटी रह गयी,
हांड़ी कुम्हार की बस फूटी रह गई।
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आसाँ ना थी डगर राहे_इश्क की,
लंबे सफ़र में उम्र छोटी रह गयी।
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रिश्तें किये कतआ दोनों ने मगर,
कैसे फिर इक डोर बिन काटी रह गई?
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चौदस का चाँद था महबूब के लिए,
भूखी निगाह में बस रोटी रह गयी।
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कब्र में घुटा था इक पल को दम मेरा,
माटी के मकां में फिर माटी रह गयी।
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सिकोडता हूँ खुदको हर मुमकिन तरह,
चादर हरेक नाप से छोटी रह गयी।
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