नरेन्द्र सहरावत
बेरुखी से ,तो कभी ,दिल के लगाने से मिले।।
ज़ख्म, कैसे कैसे ,मुझको इस जमाने से मिले।।
हादसा, ये कब ,कहां गुजरा ,पता अब है चला।।
जब शीशे ,कुछ दिल के ,तेरे मैयखाने से मिले।।
जानता हूँ ,कशमकश हैं ,उस नज़र में अब तलक।।
के अगर, मुझसे मिले ,तो किस बहाने से मिले।।
मेरे हिस्से ,चन्द जुगनूं ,गम नहीं इस बात का ।।
रंज ये है ,के जो मिले , वो घर जलाने से मिले ।।
दोस्त ,तो दुश्मन ,नहीं बनता ए! जानेमन कभी ।।
ये अदू ,दोस्ती अदावत के ,हो जाने से मिले ।।
अदू- दुश्मन अदावत- दुश्मनी
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