रात भर जगाती हो तुम बातों की पनाह में
रात भर जगाती हो तुम बातों की पनाह में
फिर सपने दे जाती हो रतजगी निगाह में।
तुम जो चाहे करो और मैं कुछ भी ना कहूं
मगर तुम्हें एतराज है मेरी हर एक आह में।
तुम्हारे होने से ही उजालों से मोहब्बत हुई
वरना जिंदगी डूबी हुई थी किसी स्याह में ।
तुम पर भरोसा है तुम्हीं कोई फैसला दे दो
कौन उलझे कोर्ट, कचहरी और गवाह में ।
हां बोलो तुम तो हम भी सर पर सेहरा बांधे
आखिर कब तक नाचेंगे बेगानों के ब्याह में।
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