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ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं

 

ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं

- महेन्द्र तिवारी

यह एक विडंबना ही है कि जब 31 दिसंबर की आधी रात को पूरी दुनिया घड़ी की सुइयों के एक साथ बारह पर आने का इंतजार कर रही होती है, तब हम केवल एक तारीख नहीं बदल रहे होते, बल्कि अनजाने में एक ऐसी जीवन पद्धति को स्वीकार कर रहे होते हैं जिसका हमारी प्रकृति, भूगोल और संस्कृति से कोई गहरा नाता नहीं है। प्रश्न सरल है—क्या वास्तव में वह 'नया' साल होता है? समय की निरंतरता में एक अंक का बदल जाना प्रशासनिक सुविधा तो हो सकता है, लेकिन क्या वह उस नवीनता का प्रतीक है जिसे हम 'नववर्ष' कहते हैं? भारत जैसे प्राचीन और ज्ञान-समृद्ध देश में, जहाँ काल की गणना केवल अंकों का खेल नहीं बल्कि खगोल विज्ञान और प्रकृति के अंतर्संबंधों का महाकाव्य है, यह विमर्श अत्यंत आवश्यक हो जाता है। हमें यह समझना होगा कि पाश्चात्य कैलेंडर और भारतीय पंचांग के बीच का अंतर केवल तिथियों का नहीं, बल्कि दृष्टि और दर्शन का है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे आज वैश्विक स्तर पर प्रशासनिक कार्यों के लिए अपनाया गया है, मूलतः सौर चक्र पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था है जिसे तत्कालीन रोमन साम्राज्य और बाद में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने अपनी सुविधा के अनुसार ढाला। इसके उलट, भारतीय कालगणना सौर और चंद्र दोनों गतियों का एक अद्भुत समन्वय है, जो ब्रह्मांडीय संतुलन को दर्शाता है। 1 जनवरी को जब हम नववर्ष मनाते हैं, तब चारों ओर कड़कड़ाती ठंड होती है, पेड़ों से पत्ते झड़ चुके होते हैं और प्रकृति एक तरह की सुषुप्त अवस्था में होती है। वातावरण में कोई जैविक परिवर्तन नहीं होता, न ही हवाओं में वह ताजगी होती है जो किसी नए आरंभ की सूचना दे। यह केवल कैलेंडर के पन्नों का पलटना है, जिसमें न कोई भावनात्मक जुड़ाव है और न ही कोई सांस्कृतिक गहराई। इसके विपरीत, जब हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि पूरी सृष्टि स्वयं को नए रूप में सजा रही होती है। वह कालखंड केवल एक तिथि का आगमन नहीं, बल्कि प्रकृति का पुनर्जन्म है।

चैत्र मास में धरती के सौंदर्य का वर्णन शब्दों से परे है। पतझड़ की विदाई के बाद पेड़ों पर नई कोपलें फूटती हैं, आम के बगीचे बौरों की खुशबू से महकने लगते हैं और खेतों में रबी की फसलें अपनी सुनहरी बालियों के साथ किसान के परिश्रम की सफलता का गान करती हैं। यही तो वास्तविक 'नववर्ष' है—जहाँ जीवन का संचार हो, जहाँ हर जीव-जंतु और वनस्पति में नई चेतना जागृत हो। भारतीय संस्कृति में नववर्ष का अर्थ 'नया जीवन' और 'नई आशा' है, जो प्रत्यक्ष रूप से हमारे परिवेश में दिखाई देता है। जब खेतों में अन्न आता है, तो वह केवल किसान की समृद्धि नहीं बल्कि राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा और उल्लास का प्रतीक बनता है। इसीलिए, भारतीय नववर्ष का सबसे गहरा संबंध उस मिट्टी से है जो हमें जीवन देती है। 31 दिसंबर की रात को होने वाला शोर-शराबा उस शांतिपूर्ण और जीवंत बदलाव का मुकाबला नहीं कर सकता जो चैत्र की पहली किरण के साथ ब्रह्मांड में घटित होता है।

सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टि से भी देखें तो भारत का वास्तविक जीवन चक्र मार्च-अप्रैल के इर्द-गिर्द ही घूमता है। हमारे विद्यालयों का नया शैक्षणिक सत्र इसी समय शुरू होता है। छोटे बच्चों के लिए नई किताबें, नई कक्षाएं और नई उम्मीदें इसी वसंत ऋतु के साथ आती हैं। देश का वित्तीय वर्ष भी इसी समय समाप्त होकर नया रूप लेता है। बैंकों से लेकर सरकारी कार्यालयों तक, आर्थिक और योजनागत स्तर पर हम मार्च-अप्रैल को ही नए आरंभ का बिंदु मानते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भले ही हम बाहरी तौर पर 1 जनवरी को स्वीकार कर चुके हों, लेकिन हमारी सामाजिक और आर्थिक धड़कनें आज भी उसी प्राचीन कालचक्र के साथ धड़कती हैं। इस कालखंड में जो नवीनता महसूस होती है, वह केवल कागजों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति के दैनिक जीवन और भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित करती है।

भारतीय नववर्ष केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और साधना का पर्व भी है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ ही चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ होता है। यह वह समय है जब हम बाहरी उत्सव के बजाय आंतरिक शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उपवास, संयम और शक्ति की उपासना के माध्यम से हम स्वयं को आने वाले वर्ष की चुनौतियों के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करते हैं। पुराणों के अनुसार, इसी पवित्र दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी और इसी दिन से महाराज विक्रमादित्य ने 'विक्रम संवत' का प्रवर्तन कर भारत को एक नई ऐतिहासिक पहचान दी थी। यह संवत हमारी विजय, हमारे स्वाभिमान और हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का प्रतीक है। इसके विपरीत, 31 दिसंबर की रातों का जो दृश्य आज हमारे सामने आता है, वह चिंताजनक है। आधुनिकता के नाम पर शराबखोरी, अनियंत्रित शोर और फूहड़ता ने उत्सव के अर्थ को ही विकृत कर दिया है। त्योहार वह होता है जो आत्मा को परिष्कृत करे, जो समाज में सौहार्द और मर्यादा की स्थापना करे। पश्चिमी अंधानुकरण ने हमें उत्सव के नाम पर केवल इंद्रियों की क्षणिक तृप्ति तक सीमित कर दिया है।

ऐतिहासिक और वैज्ञानिक धरातल पर भारतीय पंचांग की श्रेष्ठता निर्विवाद है। जहाँ पश्चिमी कैलेंडर में समय-समय पर संशोधनों की आवश्यकता पड़ी, वहीं हजारों वर्षों से भारतीय गणना में सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की स्थिति इतनी सटीक रही है कि ग्रहण से लेकर ग्रहों के गोचर तक की जानकारी पल-भर में दी जा सकती है। इसी काल में सूर्य उत्तरायण की अपनी यात्रा में ऊर्जा के उच्चतम स्तर की ओर बढ़ रहा होता है, जो मानवीय स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए शुभ माना जाता है। विज्ञान सम्मत होने का अर्थ है कि वह प्रकृति के नियमों के अनुकूल हो। जब हम चैत्र प्रतिपदा को नववर्ष मानते हैं, तो हम वास्तव में सौर मंडल की उस ऊर्जा के साथ खुद को जोड़ते हैं जो उस समय अपने चर्मोत्कर्ष पर होती है। यह किसी पंथ या संप्रदाय का विषय नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक खगोलीय सत्य है जिसे हमारे ऋषियों ने गणितीय सूत्रों में पिरोया था।

आज सबसे बड़ी चुनौती हमारी मानसिकता की है। स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम अपनी परंपराओं को पिछड़ी हुई और पश्चिमी रीति-रिवाजों को प्रगतिशील मानने की भूल कर रहे हैं। 1 जनवरी को जोर-शोर से मनाना और अपनी चैत्र प्रतिपदा को भूल जाना एक प्रकार की सांस्कृतिक दासता का ही रूप है। आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं के वैज्ञानिक और तार्किक आधार को समझकर उन्हें गर्व के साथ जीना है। हम प्रशासनिक कार्यों के लिए वैश्विक मानकों का पालन करें, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को विस्मृत न होने दें। हमें यह समझना होगा कि कैलेंडर केवल तारीखें नहीं बदलता, वह हमारी सोच और व्यवहार को भी दिशा देता है। जब हम अपनी संस्कृति के अनुरूप नववर्ष मनाते हैं, तो हम अपनी मिट्टी, अपने पूर्वजों और अपनी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

निष्कर्ष यही है कि समय की धारा में वही राष्ट्र जीवित और सशक्त रहते हैं जो अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। भारतीय नववर्ष 'नव' होने के साथ-साथ 'पुनर्नव' होने का संदेश देता है—अर्थात प्रत्येक वर्ष स्वयं को फिर से नया करना, अपने विचारों को शुद्ध करना और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलना। यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक संकल्प है। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि असली नया साल वह है जब तितलियाँ फूलों पर मंडराती हैं, जब कोयल गाती है और जब धरती अपना श्रृंगार करती है। आइए, इस वर्ष केवल कैलेंडर न बदलें, बल्कि अपनी दृष्टि बदलें। हम उस नववर्ष का स्वागत करें जो हमें संस्कार देता है, जो हमें विज्ञान से जोड़ता है और जो हमें हमारी महान भारतीय विरासत का गौरव अनुभव कराता है। अपनी संस्कृति के प्रति यह स्वाभिमान ही हमारे राष्ट्र के भविष्य को उज्ज्वल और यशस्वी बनाएगा।

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