व्यंग्य के शिखर पुरुष हरिशंकर परसाई
- महेन्द्र तिवारी
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को केवल हँसी और मनोरंजन की विधा मानने से इनकार किया। उन्होंने व्यंग्य को सामाजिक चेतना, मानवीय विवेक और व्यवस्था पर सवाल उठाने का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए पाठक कई बार मुस्कुराता है, लेकिन उसी मुस्कान के पीछे उसे समाज की ऐसी सच्चाई दिखाई देती है जो भीतर तक बेचैन करती है। परसाई का व्यंग्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसमें हास्य के साथ गंभीर चिंतन, करुणा के साथ आक्रोश और भाषा की सरलता के साथ विचारों की तीक्ष्णता दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके निधन के तीन दशक बाद भी उनका साहित्य अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।
हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के जमानी गांव में हुआ था। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए की शिक्षा प्राप्त की। कुछ समय अध्यापन करने के बाद उन्होंने स्वतंत्र लेखन को अपना जीवन बना लिया। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि स्वतंत्र लेखन में आर्थिक स्थिरता का अभाव था, लेकिन परसाई ने साहित्य को नौकरी या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन नहीं बनाया। उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और लेखकीय प्रतिबद्धता को सर्वोच्च महत्व दिया। जबलपुर से उन्होंने 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन और संपादन भी किया। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता को गंभीरता से आगे बढ़ाया।
परसाई के साहित्य को समझने के लिए उनके समय को समझना भी जरूरी है। भारत स्वतंत्र हो चुका था और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हो रही थी, लेकिन सामाजिक जीवन में अनेक पुरानी रूढ़ियां, आर्थिक विषमताएं, धार्मिक पाखंड, भ्रष्टाचार और सत्ता के प्रति अंधभक्ति मौजूद थी। स्वतंत्रता के बाद लोगों को जिस आदर्श समाज की उम्मीद थी, उसकी राह में अनेक विसंगतियां दिखाई देने लगी थीं। परसाई ने इन्हीं विसंगतियों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने बड़े सिद्धांतों की चर्चा करने के बजाय रोजमर्रा के जीवन में मौजूद छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से व्यवस्था की बड़ी सच्चाइयों को सामने रखा।
उनके व्यंग्य में आम आदमी लगातार उपस्थित रहता है। वह आदमी जो व्यवस्था की जटिलताओं में फंसा हुआ है, जो नेताओं के वादों को सुनता है, सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाता है, महंगाई से जूझता है, धार्मिक पाखंड को देखता है और फिर भी किसी न किसी उम्मीद के सहारे जीवन आगे बढ़ाता है। परसाई ने इस आम आदमी को केवल पीड़ित पात्र बनाकर प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसकी मानसिकता और सामाजिक परिस्थितियों को भी समझने का प्रयास किया। उनके व्यंग्य का निशाना केवल नेता या अधिकारी नहीं होते, बल्कि समाज के वे लोग भी होते हैं जो व्यवस्था की बुराइयों से परेशान होने के बावजूद किसी न किसी रूप में उनका समर्थन करते रहते हैं।
परसाई की भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक थी। उन्होंने साहित्यिक आडंबर से दूर रहते हुए बोलचाल की भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनकी भाषा सहज, जीवंत और संवादधर्मी है। ऐसा लगता है जैसे लेखक पाठक के सामने बैठकर उससे बातचीत कर रहा हो। यही सहजता उनके व्यंग्य को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाती है। कठिन सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को वे ऐसी भाषा में रखते हैं कि पाठक पहले हंसता है और फिर सोचने के लिए मजबूर हो जाता है।
उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'भोलाराम का जीव', 'प्रेमचंद के फटे जूते', 'सदाचार का ताबीज', 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र', 'वैष्णव की फिसलन', 'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'निठल्ले की डायरी', 'तिरछी रेखाएँ', 'रानी नागफनी की कहानी' और 'तट की खोज' जैसी रचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके साहित्य में कहानी, उपन्यास, निबंध और व्यंग्य जैसी विभिन्न विधाओं का प्रयोग मिलता है, लेकिन उनकी पहचान मुख्य रूप से एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में स्थापित हुई।
'भोलाराम का जीव' जैसी रचना में प्रशासनिक व्यवस्था की संवेदनहीनता पर व्यंग्य दिखाई देता है। एक साधारण आदमी की मृत्यु के बाद भी उसकी समस्याओं का समाधान नहीं होता। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक बन जाती है जिसमें कागज और नियम इंसान से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। परसाई की विशेषता यह है कि वे इस गंभीर विषय को उपदेशात्मक शैली में नहीं रखते। वे ऐसी परिस्थिति निर्मित करते हैं जिसमें हास्य पैदा होता है, लेकिन उस हास्य के भीतर व्यवस्था की क्रूरता साफ दिखाई देती है।
'प्रेमचंद के फटे जूते' में परसाई साहित्यकार और समाज के संबंधों पर विचार करते हैं। प्रेमचंद के फटे जूतों को वे केवल आर्थिक अभाव का प्रतीक नहीं बनाते, बल्कि लेखक की ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों के संदर्भ में देखते हैं। यहां व्यंग्य साहित्यिक दुनिया की उन प्रवृत्तियों पर भी चोट करता है जहां लेखक की वास्तविक प्रतिबद्धता से अधिक उसके बाहरी सम्मान और प्रतिष्ठा को महत्व मिलने लगता है। इस रचना की लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि परसाई साहित्य को समाज की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़कर देखने वाले लेखक थे।
'सदाचार का ताबीज' में नैतिकता और सामाजिक व्यवहार के बीच मौजूद विरोधाभास सामने आता है। परसाई यह सवाल उठाते हैं कि क्या केवल नैतिकता की बातें करने से समाज नैतिक बन जाता है। उनका व्यंग्य उन लोगों पर है जो सार्वजनिक जीवन में आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन निजी जीवन में उन्हीं आदर्शों का पालन नहीं करते। उनके यहां नैतिकता कोई भाषण का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार की कसौटी है।
'विकलांग श्रद्धा का दौर' उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल है। इसी व्यंग्य कृति के लिए उन्हें 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। साहित्य अकादमी की आधिकारिक पुरस्कार सूची में 1982 के पुरस्कार के अंतर्गत 'विकलांग श्रद्धा का दौर' और हरिशंकर परसाई का नाम दर्ज है। यह सम्मान हिंदी व्यंग्य को साहित्य की गंभीर विधा के रूप में स्वीकार किए जाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण घटना माना जा सकता है। परसाई ने श्रद्धा का विरोध नहीं किया, बल्कि अंधश्रद्धा और विवेकहीन आस्था पर प्रश्न उठाया। उनका उद्देश्य मनुष्य को किसी विश्वास से वंचित करना नहीं था, बल्कि उसे विवेक के साथ विश्वास करने की प्रेरणा देना था।
परसाई की रचनाओं में राजनीति भी लगातार उपस्थित रहती है। वे सत्ता में बैठे लोगों के साथ साथ उन नागरिकों को भी कठघरे में खड़ा करते हैं जो सत्ता की गलतियों को देखकर भी चुप रहते हैं। उनके लिए लोकतंत्र केवल चुनाव और सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं था। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ नागरिक की जागरूकता, सवाल पूछने की क्षमता और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखने की इच्छा से था। यही कारण है कि 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' जैसी रचना आज भी पाठकों को अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में सोचने को प्रेरित करती है।
उनका व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना तक सीमित नहीं रहता। वे प्रवृत्तियों पर प्रहार करते हैं। भ्रष्टाचार, अवसरवाद, धार्मिक पाखंड, राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक असमानता और दिखावटी नैतिकता जैसी प्रवृत्तियां उनके साहित्य में बार-बार सामने आती हैं। वे व्यक्ति को व्यवस्था से अलग करके नहीं देखते। उन्हें पता था कि खराब व्यवस्था केवल नेताओं या अधिकारियों से नहीं बनती, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता भी उसे मजबूत करती है।
परसाई की एक और विशेषता उनकी मानवीय दृष्टि है। उनके व्यंग्य में कठोरता जरूर है, लेकिन मनुष्य के प्रति घृणा नहीं है। वे कमजोर व्यक्ति की मजबूरी को समझते हैं और उसकी पीड़ा के साथ खड़े दिखाई देते हैं। उनका आक्रोश शोषण और पाखंड के विरुद्ध है। इसलिए उनके व्यंग्य में करुणा की एक अंतर्धारा दिखाई देती है। यही करुणा उन्हें केवल हास्य लेखक बनने से बचाती है।
आज का समय तकनीकी रूप से परसाई के समय से बहुत अलग है। संचार के साधन बदल गए हैं, राजनीति की भाषा बदल गई है और समाज के सामने नई चुनौतियां आ गई हैं। इसके बावजूद परसाई की रचनाएं पढ़ते हुए लगता है कि उन्होंने हमारे वर्तमान की अनेक स्थितियों को पहले ही पहचान लिया था। अंधविश्वास का विस्तार, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का संकट, राजनीतिक अवसरवाद, भ्रष्टाचार, दिखावटी राष्ट्रवाद, सामाजिक असमानता और संस्थागत संवेदनहीनता जैसी समस्याएं आज भी हमारे सामने हैं। इसलिए परसाई को केवल अतीत का व्यंग्यकार मानना उनके साहित्य के साथ न्याय नहीं होगा।
हरिशंकर परसाई का निधन 10 अगस्त 1995 को हुआ। वे अपने पीछे ऐसी साहित्यिक विरासत छोड़ गए जिसमें हंसी के साथ विचार, व्यंग्य के साथ संवेदना और आलोचना के साथ सामाजिक जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। उन्होंने हिंदी व्यंग्य को एक ऐसी गंभीर अभिव्यक्ति दी जिसमें समाज का आत्म निरीक्षण संभव हुआ। उन्होंने पाठक को केवल हंसाया नहीं, बल्कि उसे अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने की दृष्टि भी दी।
परसाई की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि वे पाठक को असहज प्रश्नों से बचने नहीं देते। वे बताते हैं कि जिस समाज में हम रहते हैं, उसकी कमियों के लिए केवल दूसरे जिम्मेदार नहीं हैं। हमें अपने भीतर भी झांकना होगा। उनकी रचनाओं का व्यंग्य दरअसल एक जागरूक नागरिक की आवाज है। वह आवाज जो सत्ता से सवाल करती है, समाज के पाखंड को पहचानती है और मनुष्य को विवेक के साथ जीने की प्रेरणा देती है।
आज जब सूचना की अधिकता के बावजूद विचारों की गंभीरता कई बार कम होती दिखाई देती है, तब परसाई को पढ़ना और भी जरूरी हो जाता है। उनकी भाषा हमें सरलता का महत्व समझाती है, उनकी दृष्टि हमें प्रश्न पूछना सिखाती है और उनका व्यंग्य हमें यह एहसास कराता है कि हंसी भी सामाजिक परिवर्तन की एक गंभीर शक्ति हो सकती है। हरिशंकर परसाई इसलिए केवल हिंदी के महान व्यंग्यकार नहीं हैं, बल्कि वे उस साहित्यिक परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो समाज को आईना दिखाने का साहस रखती है। उनका साहित्य हमें हंसाते हुए चेताता है, चुभते हुए जगाता है और अंततः बेहतर समाज की आवश्यकता का बोध कराता है।

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