विश्व मलेरिया दिवस: एक रोग मुक्त भविष्य का संकल्प
- महेन्द्र तिवारी
प्रतिवर्ष 25 अप्रैल को संपूर्ण विश्व में मलेरिया दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस वैश्विक संकल्प को दोहराने का अवसर है जो मानवता को इस घातक बीमारी से मुक्त कराने के लिए लिया गया है। मलेरिया सदियों से मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि विश्व स्वास्थ्य सभा ने 2007 में अपने 60 वें सत्र के दौरान अफ्रीका मलेरिया दिवस को विश्व मलेरिया दिवस में बदलने का निर्णय लिया था। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के देशों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना और इसके रोकथाम के लिए संसाधन जुटाना था। मलेरिया एक ऐसी बीमारी है जो मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। यह मच्छर प्लाज्मोडियम नामक परजीवी को मनुष्य के रक्त में छोड़ देता है। यद्यपि यह बीमारी निवारणीय और उपचार योग्य है, फिर भी यह हर साल लाखों लोगों की जान ले लेती है। ताजा आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में विश्व स्तर पर मलेरिया के लगभग 249 मिलियन मामले सामने आए थे। यह संख्या चिंताजनक है क्योंकि यह 2021 की तुलना में लगभग 5 मिलियन अधिक थी। इन मामलों में होने वाली मौतों का आंकड़ा भी डरावना है, जहाँ 2022 में लगभग 608000 लोगों ने अपनी जान गँवाई।
मलेरिया का सबसे गहरा प्रभाव अफ्रीकी देशों में देखा जाता है। वैश्विक स्तर पर मलेरिया के कुल मामलों का लगभग 94 प्रतिशत और होने वाली मौतों का 95 प्रतिशत हिस्सा केवल अफ्रीका से आता है। इसमें भी विडंबना यह है कि मरने वालों में 80 प्रतिशत से अधिक संख्या 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की होती है। यह आंकड़ा हमें सोचने पर विवश करता है कि विज्ञान की इतनी प्रगति के बावजूद हम अपने भविष्य को इस छोटे से मच्छर से बचाने में पूरी तरह सफल क्यों नहीं हो पा रहे हैं। भारत के संदर्भ में यदि बात करें तो स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2015 से 2022 के बीच मलेरिया के मामलों में लगभग 85 प्रतिशत की गिरावट आई है। भारत का लक्ष्य है कि वह 2027 तक मलेरिया मुक्त हो जाए और 2030 तक इस बीमारी का पूरी तरह से उन्मूलन कर दे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन ढांचा 2016-2030 कार्यरत है। इसके तहत देश के विभिन्न राज्यों को उनकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है और सूक्ष्म स्तर पर योजनाएं बनाई जा रही हैं।
मलेरिया केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास में भी एक बड़ी बाधा है। यह बीमारी अक्सर उन क्षेत्रों में अधिक फैलती है जहाँ गरीबी, जलभराव और स्वच्छता का अभाव होता है। जब परिवार का कोई सदस्य बीमार होता है, तो न केवल उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है, बल्कि परिवार की संचित पूंजी भी इलाज में खर्च हो जाती है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह कृषि उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन भी मलेरिया के प्रसार में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। बढ़ते तापमान और अनिश्चित वर्षा के कारण मच्छरों को पनपने के लिए नए क्षेत्र मिल रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पहले मलेरिया नहीं था, अब वहाँ भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कीटनाशकों के प्रति मच्छरों की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता एक नई चुनौती बनकर उभरी है। कई क्षेत्रों में देखा गया है कि मच्छर उन रसायनों से नहीं मर रहे हैं जिनका उपयोग लंबे समय से किया जा रहा था। साथ ही, परजीवी ने भी दवाओं के प्रति अपनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है, जिससे उपचार की प्रक्रिया जटिल होती जा रही है।
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में मलेरिया की वैक्सीन का आगमन एक क्रांतिकारी कदम है। 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आरटीएस,एस नामक पहली वैक्सीन को मंजूरी दी थी और उसके बाद आर21 नामक दूसरी वैक्सीन ने भी आशा की नई किरण जगाई है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि ये वैक्सीन बच्चों में गंभीर मलेरिया के मामलों को कम करने में अत्यधिक प्रभावी हैं। भारत में भी इन टीकों के वितरण और उपयोग को लेकर व्यापक योजनाएं बनाई जा रही हैं। हालांकि, केवल टीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। मलेरिया से बचाव के पारंपरिक तरीके जैसे कि कीटनाशक उपचारित मच्छरदानियों का उपयोग, घरों के भीतर कीटनाशक छिड़काव और व्यक्तिगत सुरक्षा उपाय आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना और जमीनी स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से निगरानी बढ़ाना इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं।
मलेरिया के इतिहास को देखें तो 20 अगस्त 1897 का दिन बहुत महत्वपूर्ण था, जब सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद, भारत में अपनी खोज के माध्यम से यह सिद्ध किया था कि मलेरिया मच्छरों द्वारा फैलता है। उनकी इस महान खोज के लिए उन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तब से लेकर आज तक हमने लंबी दूरी तय की है, लेकिन अंतिम विजय अभी बाकी है। विश्व मलेरिया दिवस पर हमें उन स्वास्थ्य कर्मियों को भी याद करना चाहिए जो दुर्गम क्षेत्रों में जाकर लोगों की जांच करते हैं और उन्हें दवाएं उपलब्ध कराते हैं। मलेरिया का निदान अब बहुत सरल हो गया है। रैपिड डायग्नोस्टिक किट के माध्यम से मात्र 15 मिनट में यह पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति मलेरिया से पीड़ित है या नहीं। प्रारंभिक अवस्था में पहचान होने पर इसका उपचार पूरी तरह संभव है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब लोग लक्षणों को नजरअंदाज करते हैं या झोलाछाप डॉक्टरों के चक्कर में पड़ जाते हैं। तेज बुखार, कंपकंपी, सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षणों को गंभीरता से लेना अनिवार्य है।
मलेरिया उन्मूलन के लिए वैश्विक सहयोग की भी अत्यंत आवश्यकता है। विकसित देशों को चाहिए कि वे शोध और विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करें ताकि नई दवाओं और टीकों का निर्माण हो सके। वहीं विकासशील देशों को अपनी स्वास्थ्य नीतियों में पारदर्शिता और तत्परता लानी होगी। 2024 और उसके बाद के वर्षों के लिए वैश्विक समुदाय का ध्यान निवेश, नवाचार और कार्यान्वयन पर केंद्रित है। इसका अर्थ है कि उपलब्ध संसाधनों का सही तरीके से उपयोग हो, नई तकनीकों को अपनाया जाए और नीतियों को प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारा जाए। डिजिटल तकनीक का उपयोग भी इस क्षेत्र में बढ़ रहा है। अब मोबाइल एप्स के माध्यम से मच्छरों के प्रजनन स्थलों की मैपिंग की जा रही है और रियल टाइम डाटा के आधार पर प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित कार्रवाई की जा रही है।
अंततः, मलेरिया मुक्त विश्व का सपना तभी साकार होगा जब समाज का प्रत्येक नागरिक जागरूक होगा। हमें यह समझना होगा कि मच्छरों को पनपने देना केवल हमारी लापरवाही नहीं, बल्कि सामूहिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है। अपने आसपास पानी जमा न होने देना, स्वच्छता बनाए रखना और मच्छरदानी का नियमित उपयोग करना छोटे कदम लग सकते हैं, लेकिन इनका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। विश्व मलेरिया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भले ही चुनौती बड़ी हो, लेकिन मानवीय इच्छाशक्ति और विज्ञान के तालमेल से हम इस बीमारी को इतिहास का हिस्सा बना सकते हैं। यदि हम 2030 तक शून्य मलेरिया के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें आज से ही अपनी प्रतिबद्धता को दोगुना करना होगा। यह केवल सरकार का काम नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की कल्पना करता है। मलेरिया के विरुद्ध इस युद्ध में विज्ञान, समर्पण और जनभागीदारी ही हमारी जीत के आधार स्तंभ बनेंगे। आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा संसार देना जहाँ मलेरिया का कोई डर न हो, यही इस दिवस की सच्ची सार्थकता होगी। 1.3 अरब से अधिक जनसंख्या वाले देश भारत के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी सफलता वैश्विक आंकड़ों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। पिछले दशक की प्रगति यह दर्शाती है कि हम सही दिशा में हैं, बस अब अंतिम प्रहार की आवश्यकता है।
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