भारतीय अस्मिता के प्रतीक: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
- महेन्द्र तिवारी
भारतीय इतिहास की गौरवशाली परंपरा में महाराणा प्रताप का नाम एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान है जिसकी आभा शताब्दियों के पश्चात भी तनिक भी फीकी नहीं पड़ी है। उनका व्यक्तित्व साहस, त्याग, अद्वितीय स्वाभिमान और अटूट राष्ट्रभक्ति का एक ऐसा संगम है जो विश्व इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर अनेक योद्धाओं ने जन्म लिया, किंतु महाराणा प्रताप की विशिष्टता इस बात में निहित है कि उन्होंने उस समय की सबसे बड़ी वैश्विक शक्ति कहे जाने वाले मुगल साम्राज्य के सम्मुख सिर झुकाने के स्थान पर संघर्ष और अभावों से भरे जीवन को प्राथमिकता दी। उनका संपूर्ण जीवन केवल युद्धों का संकलन मात्र नहीं है, अपितु यह मनुष्य की उस अदम्य इच्छाशक्ति का प्रमाण है जो किसी भी भौतिक प्रलोभन या भय के आगे पराजित नहीं होती। मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के इस तेजस्वी राजा ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता का मूल्य किसी भी सिंहासन या विलासिता से कहीं अधिक ऊंचा होता है।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के सुप्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे और उनकी माता रानी जयवंता बाई एक अत्यंत धार्मिक और स्वाभिमानी महिला थीं। प्रताप के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सर्वोपरि था जिन्होंने बचपन से ही उन्हें रामायण और महाभारत की वीर कथाएं सुनाकर धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रेरित किया। कुंभलगढ़ की पहाड़ियों में प्रताप का बचपन व्यतीत हुआ जहाँ उन्होंने स्थानीय भील जनजाति के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए। यही भील आगे चलकर उनकी सेना की रीढ़ बने और उन्हें प्यार से कीका कहकर पुकारते थे। बचपन से ही प्रताप अस्त्र शस्त्र के संचालन, घुड़सवारी और युद्ध कौशल में निपुण होने लगे थे। उनकी कद काठी अत्यंत प्रभावशाली थी और उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो उनके भावी नायक होने की पुष्टि करता था।
जब प्रताप युवावस्था में पहुँचे तब भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ बड़ी तेजी से बदल रही थीं। मुगल सम्राट अकबर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के माध्यम से पूरे भारत को एक ध्वज के नीचे लाने का प्रयास कर रहा था। राजस्थान के अधिकांश शक्तिशाली राजपूत राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी और उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए थे। किंतु मेवाड़ इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा था। चित्तौड़गढ़ पर 1568 में अकबर का भीषण आक्रमण हुआ जिसमें भारी रक्तपात हुआ और महाराणा उदयसिंह को सुरक्षित स्थानों की खोज में पहाड़ियों की ओर जाना पड़ा। इसी कठिन समय में 1572 में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद प्रताप का राज्याभिषेक हुआ। उस समय मेवाड़ के पास न तो पर्याप्त धन था, न विशाल सेना और न ही चित्तौड़गढ़ जैसा अभेद्य दुर्ग, क्योंकि वह मुगलों के अधिकार में था। इसके बावजूद प्रताप ने हार मानने के स्थान पर मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र कराने की प्रतिज्ञा ली।
अकबर जानता था कि यदि मेवाड़ उसकी अधीनता स्वीकार कर लेता है तो पूरे भारत पर उसका निर्बाध शासन होगा। इसलिए उसने प्रताप को समझाने के लिए चार बार दूत भेजे। सबसे पहले जलाल खान को भेजा गया, उसके बाद आमेर के राजा मानसिंह, फिर राजा भगवंत दास और अंत में टोडरमल को भेजा गया। इन दूतों ने प्रताप को बड़े बड़े प्रलोभन दिए और युद्ध की विभीषिका से डराया, लेकिन प्रताप का उत्तर स्पष्ट था कि वे किसी भी स्थिति में मुगलों के दास बनकर जीवित रहने के स्थान पर स्वतंत्र रहकर मृत्यु को गले लगाना श्रेष्ठ समझते हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मेवाड़ की स्वतंत्रता का कोई सौदा नहीं हो सकता। यह निर्णय एक अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध सीधा संघर्ष मोल लेने जैसा था, जो किसी आत्मघाती कदम से कम नहीं जान पड़ता था, लेकिन प्रताप के लिए उनका आत्मसम्मान सर्वोपरि था।
परिणामस्वरूप 18 जून 1576 को वह ऐतिहासिक युद्ध हुआ जिसे हम हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जानते हैं। अरावली की संकरी पहाड़ियों में स्थित इस स्थान की मिट्टी हल्दी जैसी पीली होने के कारण इसे हल्दीघाटी कहा जाता है। एक ओर मुगल सेना थी जिसका नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे और उनके पास आधुनिक अस्त्र शस्त्र, हाथियों का विशाल दल और हजारों प्रशिक्षित सैनिक थे। दूसरी ओर महाराणा प्रताप की सेना थी जिसमें लगभग 20000 सैनिक थे जिनमें राजपूतों के साथ साथ हकीम खान सूरी के नेतृत्व में अफगान सैनिक और राणा पुंजा के नेतृत्व में भील धनुर्धारी सम्मिलित थे। युद्ध इतना भीषण था कि बनास नदी का जल सैनिकों के रक्त से लाल हो गया था। महाराणा प्रताप ने अपनी वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया कि मुगल सेना के पैर उखड़ गए। उन्होंने अपने भाले के एक ही प्रहार से बहलोल खान को उसके घोड़े समेत दो टुकड़ों में चीर दिया था।
हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक भी अमर हो गया। चेतक की स्वामीभक्ति का उदाहरण आज भी जन जन की जुबान पर है। युद्ध के दौरान जब महाराणा प्रताप संकट में थे, तब गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद चेतक उन्हें रणक्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाल ले गया। उसने अपने घायल पैरों के साथ एक चौड़े नाले को एक ही छलांग में पार कर लिया, जिसे मुगल सैनिक पार नहीं कर सके। अपने स्वामी की रक्षा करने के पश्चात चेतक ने प्राण त्याग दिए। चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप की आंखों में आंसू आ गए थे। इस युद्ध के बाद मुगलों को लगा था कि प्रताप की शक्ति समाप्त हो गई है, लेकिन यह तो उनके संघर्ष का केवल एक नया अध्याय था। हल्दीघाटी का युद्ध निर्णायक नहीं रहा क्योंकि अकबर न तो प्रताप को बंदी बना सका और न ही मेवाड़ को पूरी तरह जीत सका।
युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने अपने परिवार के साथ जंगलों और पहाड़ों में निवास किया। उस समय की कथाएं बताती हैं कि कई बार उनके बच्चों को घास की रोटियां खाकर दिन बिताने पड़े। एक बार जब एक जंगली बिल्ली ने उनके बच्चे के हाथ से घास की रोटी छीन ली और बच्चा रोने लगा, तो प्रताप का हृदय विचलित हुआ, लेकिन उन्होंने तुरंत स्वयं को संभाला और स्वतंत्रता के मार्ग से पीछे नहीं हटे। उन्होंने प्रण लिया था कि जब तक वे चित्तौड़ को मुक्त नहीं करा लेंगे, वे सोने चांदी के बर्तनों में भोजन नहीं करेंगे और कोमल शय्या पर नहीं सोएंगे। उन्होंने अपने महलों का त्याग कर दिया और घास के बिछौनों पर सोने लगे। उनके इस धैर्य और संकल्प ने संपूर्ण मेवाड़ की जनता में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर दिया था।
कठिन समय में महाराणा प्रताप को उनके विश्वसनीय मंत्री और मित्र भामाशाह का सहयोग मिला। जब प्रताप के पास सेना को संगठित करने के लिए धन का अभाव था, तब भामाशाह ने अपनी जीवन भर की संपूर्ण संपत्ति महाराणा के चरणों में अर्पित कर दी। यह धनराशि इतनी अधिक थी कि इससे 25000 सैनिकों का खर्च 12 वर्षों तक उठाया जा सकता था। इस सहायता ने प्रताप के संघर्ष में नई जान फूंक दी। उन्होंने पुनः एक शक्तिशाली सेना का गठन किया और मुगलों के किलों पर आक्रमण करना प्रारंभ किया। प्रताप ने परंपरागत युद्ध पद्धति के स्थान पर छापामार युद्ध नीति अपनाई जिसे गुरिल्ला युद्ध कहा जाता है। पहाड़ियों के भूगोल से परिचित होने के कारण उनकी सेना अचानक मुगलों पर हमला करती और देखते ही देखते पहाड़ियों में ओझल हो जाती। मुगलों की विशाल सेना इस युद्ध पद्धति के आगे असहाय सिद्ध होने लगी।
1582 में दिवेर का युद्ध हुआ जो महाराणा प्रताप की एक बड़ी सामरिक विजय थी। इस युद्ध में प्रताप ने मुगल चौकियों को ध्वस्त कर दिया और मुगलों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने धीरे धीरे मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों को मुक्त करा लिया। उदयपुर, कुंभलगढ़ और गोगुंदा जैसे महत्वपूर्ण स्थान पुनः प्रताप के अधिकार में आ गए। मुगल सम्राट अकबर अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद प्रताप को झुका नहीं सका। अंततः अकबर ने भी मेवाड़ की ओर अभियान भेजना बंद कर दिया। महाराणा प्रताप ने अपनी नई राजधानी चावंड में स्थापित की जहाँ उन्होंने कला, साहित्य और कृषि को बढ़ावा दिया। उनके शासनकाल में प्रजा अत्यंत सुखी थी और लोग उन्हें अपना रक्षक मानते थे।
महाराणा प्रताप का अंत समय निकट आया जब 19 जनवरी 1597 को एक शिकार के दौरान उन्हें गहरी चोट लगी। 57 वर्ष की आयु में इस महान योद्धा ने अपनी अंतिम सांस ली। मृत्यु शय्या पर भी उन्हें केवल इस बात की चिंता थी कि कहीं उनके उत्तराधिकारी मुगलों के सामने झुक न जाएं। उनके पुत्र अमर सिंह और सामंतों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वे मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, तभी प्रताप की आत्मा को शांति मिली। कहा जाता है कि जब प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर को मिला, तो उसकी आंखों में भी आंसू आ गए थे। अकबर ने स्वयं स्वीकार किया था कि प्रताप जैसा महान और अडिग शत्रु मिलना असंभव है। यह एक विजेता की ओर से अपने प्रतिद्वंद्वी को दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी।
आज भी महाराणा प्रताप का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे केवल एक क्षेत्रीय राजा नहीं थे, बल्कि भारतीय अस्मिता और अखंडता के प्रतीक थे। उन्होंने यह संदेश दिया कि यदि आपके पास दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस है, तो संसाधनों का अभाव आपकी सफलता में बाधक नहीं बन सकता। उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर आज भी राजस्थान की गलियों में वीरता के गीत गूँजते हैं। साहित्यकारों ने उनकी वीरता पर अनेक काव्य रचे हैं जो आज भी युवाओं के भीतर जोश भर देते हैं। महाराणा प्रताप का नाम लेते ही एक ऐसे वीर का चित्र सामने आता है जो अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहता है। उनका त्याग, संघर्ष और अटूट निष्ठा आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह सिखाती रहेगी कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता और इतिहास केवल उन्हीं को स्थान देता है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं।
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