वैश्विक शक्ति का विकेंद्रीकरण और उभरते नए आयाम
- महेन्द्र तिवारी
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे परिवर्तनकारी मोड़ पर खड़ा है जहाँ पुरानी व्यवस्थाओं की दीवारें ढह रही हैं और नई शक्तियों का उदय हो रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया मुख्य रूप से दो ध्रुवों में विभाजित थी जिसमें एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरी ओर सोवियत संघ का नेतृत्व था। वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही एकध्रुवीय विश्व का युग आरंभ हुआ जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा। लेकिन वर्तमान समय में हम देख रहे हैं कि यह स्थिति तेजी से बदल रही है। अब दुनिया किसी एक शक्ति के इशारे पर नहीं चलती बल्कि शक्ति का केंद्र अब बिखर गया है और कई देशों के बीच विभाजित हो गया है। इस बदलाव को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्वान बहुध्रुवीय विश्व की संज्ञा देते हैं जहाँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में अब वाशिंगटन के साथ-साथ नई दिल्ली, बीजिंग, मॉस्को और ब्रासीलिया जैसे शहरों की गूँज भी सुनाई देती है।
शक्ति के इस स्थानांतरण का सबसे प्रमुख कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं का अभूतपूर्व उदय है। पिछले दो दशकों में वैश्विक आर्थिक मानचित्र पूरी तरह से बदल गया है। चीन की अर्थव्यवस्था वर्ष 1980 के दशक में वैश्विक उत्पादन में मात्र 2 प्रतिशत का योगदान देती थी जो आज बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इसी प्रकार भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह उस क्रय शक्ति और उत्पादन क्षमता का परिचायक है जिसने विकासशील देशों को वैश्विक बाजार के केंद्र में ला खड़ा किया है। अब ये देश केवल विकसित देशों के उत्पादों के उपभोक्ता नहीं हैं बल्कि वे स्वयं नवाचार, विनिर्माण और तकनीक के वैश्विक खिलाड़ी बन चुके हैं।
इस बदलते संतुलन में नए वैश्विक समूहों और संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। जी7 जैसे पुराने समूह जो कभी दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते थे अब अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत ब्रिक्स जैसे संगठन जिनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं अब वैश्विक विमर्श को नई दिशा दे रहे हैं। वर्ष 2024 में ब्रिक्स के विस्तार के बाद अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी शामिल हो गए हैं। यह विस्तारित समूह अब दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत जनसंख्या और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 28 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। जी20 जैसे मंच अब अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण में अधिक समावेशी हो गए हैं जहाँ अफ्रीकी संघ को स्थाई सदस्यता मिलना इस बात का प्रमाण है कि अब दुनिया के फैसले केवल कुछ पश्चिमी देशों के कमरों में बंद होकर नहीं लिए जा सकते।
तकनीक और डिजिटल शक्ति ने भी वैश्विक शक्ति के मानकों को पूरी तरह से बदल दिया है। किसी समय में शक्ति का पैमाना केवल परमाणु हथियारों की संख्या या विशाल सेना हुआ करती थी परंतु आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और डेटा भंडार नई सैन्य और राजनीतिक ताकतें बन चुके हैं। जो देश इन तकनीकों में अग्रणी हैं वे ही भविष्य की राजनीति का निर्धारण करेंगे। वर्तमान में वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कुछ गिने-चुने देशों के नियंत्रण में है जिससे पूरी दुनिया की डिजिटल सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। डेटा को अब नया तेल कहा जा रहा है और जिस देश के पास अपने नागरिकों के डेटा पर संप्रभुता है वह वैश्विक मंच पर अधिक मोलभाव करने की स्थिति में है। अंतरिक्ष अन्वेषण में भी अब निजी कंपनियों और नए देशों के प्रवेश ने महाशक्तियों के पुराने एकाधिकार को चुनौती दी है।
वैश्विक संघर्ष और अस्थिरता ने भी शक्ति संतुलन को बदलने में उत्प्रेरक का कार्य किया है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने न केवल यूरोप की सुरक्षा संरचना को हिला दिया है बल्कि इसने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के नए संकट पैदा कर दिए हैं। इस संघर्ष ने दुनिया को यह अहसास कराया है कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कितनी घातक हो सकती है। इसी प्रकार पश्चिम एशिया की अस्थिरता और व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते खतरों ने देशों को मजबूर किया है कि वे अपने रणनीतिक विकल्पों का विस्तार करें। इन परिस्थितियों में छोटे और मध्यम आकार के देशों की अहमियत भी बढ़ गई है क्योंकि उनकी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधन उन्हें बड़े देशों की प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण मोहरा बना देते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव कम होता दिख रहा है यद्यपि वह अभी भी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। अमेरिकी डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता अब धीरे-धीरे कम हो रही है क्योंकि कई देश अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इसे डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया कहा जा रहा है। दुनिया अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुकी है जहाँ कोई भी एक देश वैश्विक नियमों को अकेले थोप नहीं सकता। पश्चिमी देशों के मानवीय मूल्यों और मानवाधिकारों के दोहरे मानकों पर भी अब वैश्विक दक्षिण के देशों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। यह एक सांस्कृतिक और वैचारिक स्वतंत्रता का दौर भी है जहाँ देश अपनी सभ्यतागत पहचान को वैश्विक मंच पर गौरव के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
भारत की भूमिका इस बदलते परिवेश में सबसे विशिष्ट और संतुलनकारी है। भारत ने किसी भी एक गुट में शामिल होने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी है। भारत की विदेश नीति अब केवल आदर्शवाद पर नहीं बल्कि यथार्थवाद और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। भारत जहाँ एक ओर क्वॉड जैसे समूहों के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में सहयोग कर रहा है वहीं दूसरी ओर शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स के माध्यम से गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ बना रहा है। वैश्विक दक्षिण की आवाज बनकर भारत ने जलवायु परिवर्तन, डिजिटल बुनियादी ढांचे और विकासशील देशों के ऋण संकट जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। भारत का मिशन अब केवल वैश्विक व्यवस्था का पालन करना नहीं बल्कि उसका निर्माण करना है।
अंततः यह स्पष्ट है कि हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ शक्ति का कोई एक केंद्र नहीं होगा। यह बहुध्रुवीय विश्व अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी होगा लेकिन साथ ही इसमें अधिक देशों की भागीदारी की संभावना भी होगी। आने वाले समय में शांति और समृद्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि ये विभिन्न ध्रुव आपस में कितना सहयोग करते हैं और मतभेदों को सुलझाने के लिए किन अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हैं। शक्ति का यह नया संतुलन केवल सरकारों के बीच का बदलाव नहीं है बल्कि यह मानवता के साझा भविष्य को अधिक न्यायसंगत और संतुलित बनाने का एक अवसर भी है। विश्व अब एक विशाल परिवार की तरह है जहाँ प्रत्येक सदस्य की आवाज का महत्व है और जहाँ भविष्य का निर्माण प्रतिस्पर्धा के बजाय सामूहिक सहयोग के आधार पर किया जाना चाहिए। शक्ति का विकेंद्रीकरण अपरिहार्य है और इसके साथ तालमेल बिठाना ही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी।
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