तिरुपति मंदिर में आस्था के साथ फिर खिलवाड़
- महेन्द्र तिवारी
भारत में मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं नैतिक चेतना के भी प्रतीक होते हैं।
उनमें से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ऐसा संस्थान है, जिसकी प्रतिष्ठा न केवल दक्षिण भारत बल्कि
पूरे विश्व में फैली हुई है। करोड़ों भक्त यहाँ यह विश्वास लेकर आते हैं कि भगवान वेंकटेश्वर के चरणों में जो कुछ
मिलता है, वह पवित्र, निर्मल और निष्कलंक होता है। लेकिन पिछले वर्षों में जिस तरह सिल्क दुपट्टा घोटाला
और लड्डू प्रसाद घोटाला सामने आए हैं, वे इस विश्वास को गहरी चोट पहुँचाते हैं। इन घटनाओं ने मंदिर
प्रबंधन की कार्यप्रणाली ही नहीं, बल्कि उस व्यापक तंत्र की भी पोल खोली है जो धार्मिक संस्थानों में व्याप्त
भ्रष्टाचार को पनपने देता है।
सिल्क दुपट्टा घोटाला इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि पवित्रता के आवरण में किस तरह वर्षों तक
योजनाबद्ध धोखाधड़ी चल सकती है। लगभग एक दशक तक, 2015 से 2025 तक, टीटीडी ने जिन दुपट्टों को
शुद्ध मलबरी सिल्क बताकर दानदाताओं, विशिष्ट अतिथियों और वेद-आशीर्वादन में शामिल लोगों को प्रदान
किया, वे वास्तव में सस्ते पॉलिस्टर से बने थे। टेंडर यह कहकर निकाला गया था कि दुपट्टे शत प्रतिशत मलबरी
सिल्क से बने हों, पर आपूर्तिकर्ता ने इसमें खुलकर हेरफेर की। लगभग 100 से 350 रुपये की लागत वाले इन
पॉलिस्टर दुपट्टों को 1,300–1,400 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बिल किया गया, और टीटीडी को लगभग
54–55 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह नुकसान केवल आर्थिक नुकसान नहीं था; यह उस सम्मान की क्षति
थी जो भक्त इन दुपट्टों को दिव्यता का प्रतीक मानकर स्वीकार करते थे। एक ऐसा दुपट्टा जिसे घर में पूजाघर में
रखकर लोग श्रद्धा का चिह्न समझते थे, उसकी नींव ही धोखे पर आधारित निकली।
जब टीटीडी की सतर्कता शाखा ने संदेह होने पर नमूना लेकर प्रयोगशाला परीक्षण कराया, तो सच सामने
आया। सेंट्रल सिल्क बोर्ड सहित जिन प्रयोगशालाओं ने परीक्षण किया, उन्होंने स्पष्ट लिखा कि कपड़ा 100%
पॉलिस्टर है और उसमें रेशम का एक धागा तक नहीं है। यहाँ तक कि मूल सिल्क उत्पादों पर लगाया जाने वाला
अनिवार्य होलोग्राम भी इन दुपट्टों पर नहीं था। सवाल उठता है कि इतने वर्षों तक यह सब चलता कैसे रहा?
क्या टीटीडी के अफसर सालों तक आँखें मूँदकर बैठे थे, या निगरानी की प्रक्रिया ही इतनी कमज़ोर थी कि कोई
भी साधारण व्यापारी करोड़ों का खेल कर सकता था? आखिरकार टीटीडी बोर्ड को आपूर्तिकर्ता के सारे कॉन्ट्रैक्ट
रद्द करने पड़े और पूरा मामला आंध्र प्रदेश भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सौंपना पड़ा। अब जांच उसी दिशा में
बढ़ रही है कि क्या यह घोटाला अकेले आपूर्तिकर्ता के बूते पर हुआ, या भीतर के हाथ भी इससे सने हुए थे।
लेकिन इससे भी बड़ा और अधिक संवेदनशील घोटाला था लड्डू प्रसाद में मिलावट का मामला। तिरुपति का
लड्डू केवल एक प्रसाद नहीं, बल्कि भगवान वेंकटेश्वर का सीधा आशीर्वाद माना जाता है। कोई भी भक्त यह
सोच भी नहीं सकता कि प्रसाद के नाम पर धोखे का व्यापार चल रहा होगा। परन्तु केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की
विशेष जांच दल की जांच ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि भोले बाबा डेयरी नामक कंपनी ने 2019 से
2024 तक मंदिर को 68 लाख किलो मिलावटी घी सप्लाई किया, जिसकी कीमत लगभग 250 करोड़ रुपए
थी। इससे बने करोड़ों लड्डुओं में शुद्ध घी नहीं, बल्कि पाम ऑयल, पशु वसा, मोनोडाइग्लिसराइड्स और अन्य
रासायनिक पदार्थों की मिलावट पाई गई। कई बार तो रिजेक्टेड टैंकरों को साफ करके और लेबल बदलकर
दोबारा भेजा गया। दूध खरीद के फर्जी रिकॉर्ड बनाए गए और किसानों के बयान में साफ हुआ कि उनसे दूध
खरीदा ही नहीं गया था।
यह घोटाला सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं था; यह भक्तों की भावनाओं, उनके स्वास्थ्य और भगवान की पवित्र भेंट
के साथ सीधा खिलवाड़ था। विशेष जांच दल ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया और टेंडर हेराफेरी सहित
कई दस्तावेजी धांधलियों की पुष्टि की। परंतु असल सवाल वही है क्या ऐसे बड़े खेल बिना किसी अंदरूनी
संरक्षण के संभव हैं? क्या यह मात्र आपूर्तिकर्ता की चतुराई का मामला है या भ्रष्टाचार की जड़ें कहीं अधिक
गहरी हैं?
दोनों घोटालों को एक साथ देखें तो पता चलता है कि आस्था का यह विशाल मंदिर बाजार के लालच के आगे
कितना असुरक्षित है। तिरुपति मंदिर दुनिया के सबसे समृद्ध धार्मिक संस्थानों में है। जब इतना धन, इतने बड़े
अनुबंध और इतनी विशाल खरीद प्रक्रियाएँ अस्तित्व में हों, तब भ्रष्ट तत्वों का आकर्षित होना स्वाभाविक है।
लेकिन या तो निगरानी बेहद कमजोर है, या फिर व्यवस्था के भीतर ही ऐसा तंत्र विकसित हो चुका है जो
भ्रष्टाचार को न केवल संभव बनाता है, बल्कि उसे सुरक्षित भी रखता है।
यह भी एक सच्चाई है कि धार्मिक संस्थानों पर सवाल उठाना सामान्यतः लोगों को असहज करता है। भक्ति और
आस्था की आड़ में अक्सर यह मान लिया जाता है कि मंदिर प्रबंधन “अपने आप” ईमानदार होगा। यही मौन
और यही प्रतिरोध हीनता ऐसे भ्रष्टाचार को वर्षों तक फलने-फूलने देती है। आम भक्त कभी नहीं पूछता कि दुपट्टे
की शुद्धता का प्रमाण क्या है, या घी कहाँ से आता है। वह मंदिर की पवित्रता पर स्वभावतः भरोसा करता है।
इसी भरोसे को व्यापार में बदल देना ही इन घोटालों का सबसे भयावह पक्ष है।
इस व्यापक संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि तिरुपति जैसे संस्थान में जब भ्रष्टाचार पकड़ा जाता है,
तो उसका प्रभाव केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे समाज में यह संदेश भेजता है कि यदि धर्मस्थल
भी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं, तो समाज में नैतिकता कहाँ खोजी जाए? यह आस्था की उन धारणाओं को हिला देता
है, जिन पर भारतीय समाज चलने का दावा करता है।
आवश्यक है कि ऐसे मामलों पर केवल जांच और सजा ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधार भी हों। खरीद
प्रक्रिया का डिजिटलीकरण, प्रमाणित तृतीय-पक्ष अंकेक्षण वस्तुओं की सार्वजनिक गुणवत्ता रिपोर्ट, और पारदर्शी
शिकायत प्रणाली—ये केवल “सुझाव” नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा के लिए अनिवार्य कदम हैं। मंदिरों के
प्रशासनिक ढांचे को यह समझना होगा कि आस्था की सुरक्षा केवल भगवान की मर्जी पर नहीं, बल्कि मनुष्यों के
नैतिक आचरण पर भी निर्भर है।
तिरुपति के इन दोनों घोटालों ने हमें यह सिखाया है कि धार्मिक संस्थान भी उतने ही ईमानदार हैं जितने उनके
प्रबंधक। और जब प्रबंधन अपनी जवाबदेही छोड़ देता है, तो दुपट्टे पॉलिस्टर के हो जाते हैं और प्रसाद मिलावटी
हो जाता है। सवाल यह नहीं कि ये घोटाले कैसे हुए; सवाल यह है कि क्या हम अब भी चुप रहकर इस आस्था
के क्षरण को बढ़ने देंगे, या ऐसे सुधार लागू होंगे जिससे तिरुपति जैसे पवित्र स्थलों का सम्मान फिर से अशुद्धि के
साए से मुक्त हो सके।
मोबाइल: 9989703240,
ईमेल: mahendratone@gmail.com
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