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स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का

 

स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का

-महेन्द्र तिवारी 


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि, लेखक, अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे, वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।


इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी, उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।


देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।


क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।


कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।


ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।


राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ, उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा। 


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