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सोनम वांगचुक और लद्दाख के स्वायत्तता का भविष्य

 

सोनम वांगचुक और लद्दाख के स्वायत्तता का भविष्य

महेन्द्र तिवारी  

केंद्र सरकार ने हाल ही में लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है। जोधपुर जेल में 170 दिनों की हिरासत के बाद उनकी रिहाई ने न केवल लद्दाख के आंदोलन को नई ऊर्जा दी हैबल्कि पूरे क्षेत्र के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर गहन बहस छेड़ दी है। यह घटना 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसक घटना से जुड़ी हैजहां राज्यhood की मांग को लेकर प्रदर्शन भड़क उठे थे और चार लोगों की मौत हो गई थी। वांगचुक की रिहाई केंद्र और स्थानीय आंदोलनकारियों के बीच संवाद की संभावना को मजबूत करती दिखती हैलेकिन लद्दाख की लंबे समय से चली आ रही मांगें पूर्ण राज्य का दर्जाछठी अनुसूची में शामिल होनाअलग लोक सेवा आयोग और संसदीय सीटें अभी भी अनसुलझी हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा। सोनम वांगचुक कोई पेशेवर राजनेता नहीं रहे हैंबल्कि उनकी पहचान एक ऐसे नवप्रवर्तक और शिक्षा सुधारक की रही है जिसने लद्दाख की बंजर भूमि पर 'आइस स्टूपाजैसे कृत्रिम हिमनद बनाकर दुनिया को जल संरक्षण का एक नया रास्ता दिखाया। 1966 में जन्मे इस इंजीनियर ने लद्दाख की कठिन भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच शिक्षा क्रांति ला दी। 1988 में उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना कीजो स्थानीय भाषा-संस्कृति पर आधारित शिक्षा प्रदान करता है। यह कैंपस पूरी तरह सौर ऊर्जा पर चलता है और जीवाश्म ईंधन से मुक्त हैजो वांगचुक की पर्यावरण संरक्षण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने आइस स्टूपा—कृत्रिम हिमनद—का आविष्कार कियाजो सूखाग्रस्त इलाकों में पानी संरक्षण का अनूठा तरीका है। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता वांगचुक को फिल्म '3 इडियट्सके फुंसुक वांगड़ू किरदार के लिए भी जाना जाता है। लेकिन 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनने पर उनकी भूमिका बदल गई। अनुच्छेद 370 और 35के खात्मे से स्थानीय लोग अपनी भूमिनौकरियों और सांस्कृतिक पहचान पर खतरे की घंटी बजा रहे थे। वांगचुक ने तब से शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया अनशनपदयात्रा और दिल्ली मार्च—जिसमें लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) उनके साथ थे।

सितंबर 2025 का वह दिन लद्दाख के आधुनिक इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाएगाजब लेह की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने अचानक हिंसक रूप ले लिया। राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर हजारों की भीड़ जब प्रशासन से टकराईतो हुई हिंसा में चार जानें चली गईं। यह वह बिंदु था जहाँ से सरकार ने अपनी रणनीति बदली और सोनम वांगचुक को इस अशांति का सूत्रधार मानते हुए उन पर एनएसए लगा दिया गया। किसी ऐसे व्यक्ति परजिसने जीवन भर अहिंसा और गांधीवादी मूल्यों का प्रचार किया होराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होने का आरोप लगाना पूरे देश में बहस का विषय बन गया। जोधपुर जेल की कालकोठरी में बिताए गए उनके 170 दिन लद्दाख के लोगों के लिए एक भावनात्मक घाव बन गएजिसने आंदोलन को और अधिक संगठित और धारदार बना दिया।

लद्दाख का मुद्दा केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं हैइसके पीछे छिपी है वह पर्यावरणीय चिंता जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के भविष्य को प्रभावित कर सकती है। हिमालय जिसे 'तीसरा ध्रुवकहा जाता हैआज जलवायु परिवर्तन की मार सबसे ज्यादा झेल रहा है। वांगचुक का तर्क हमेशा से यह रहा है कि यदि लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलीतो यहाँ होने वाला अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार और अंधाधुंध पर्यटन यहाँ के ग्लेशियरों को निगल जाएगा। यह एक विडंबना ही है कि जो व्यक्ति देश के जल स्रोतों को बचाने की गुहार लगा रहा थाउसे ही 'राष्ट्रीय सुरक्षाके लिए खतरा घोषित कर दिया गया। जबकि सच तो यह है कि हिमालय की सुरक्षा ही भारत की वास्तविक सुरक्षा है। यदि ये पहाड़ और उनकी नदियाँ सूख गईंतो मैदानों की खुशहाली स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।

रणनीतिक दृष्टि से भी लद्दाख का महत्व सर्वोपरि है। चीन और पाकिस्तान के साथ सटी सीमाओं के कारण यह क्षेत्र हमेशा से सैन्य गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ भारतीय सेना की विशाल उपस्थिति है और बुनियादी ढांचे का विकास राष्ट्रहित में आवश्यक है। लेकिन क्या यह विकास स्थानीय लोगों की सहमति और उनकी संस्कृति की कीमत पर होना चाहिएवांगचुक और उनके समर्थक इसी संतुलन की मांग कर रहे हैं। वे सेना के खिलाफ नहीं हैंबल्कि वे चाहते हैं कि लद्दाख का विकास 'दिल्ली मॉडलपर नहीं बल्कि 'लद्दाख मॉडलपर होजहाँ भूमि और संसाधनों पर पहला हक वहां के मूल निवासियों का हो। पूर्व सैनिकों और स्थानीय युवाओं का इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह दर्शाता है कि यहाँ देशभक्ति और क्षेत्रीय पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं।

मार्च 2026 में उनकी रिहाई के पीछे कई कारण हो सकते हैं। शायद सरकार ने यह महसूस किया कि लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जनता का असंतोष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान पहुँचा सकता हैया फिर यह आने वाले समय में होने वाली किसी बड़ी वार्ता की पूर्वपीठिका है। जो भी होइस रिहाई ने लद्दाख के जनमानस में एक नई ऊर्जा भर दी है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार केवल रिहाई तक सीमित रहेगी या वह उन मूल मांगों पर भी विचार करेगी जिनके लिए यह सारा संघर्ष शुरू हुआ थाछठी अनुसूची में शामिल होने का मतलब केवल आरक्षण नहीं हैबल्कि यह उस गौरव और स्वाभिमान की सुरक्षा है जो लद्दाख के लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है।

सोनम वांगचुक की जेल यात्रा ने उन्हें एक क्षेत्रीय नेता से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय प्रतीक बना दिया है। आज देश का युवा वर्ग उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में देख रहा है जो सत्ता के सामने सच बोलने का साहस रखता है। उनकी रिहाई के बाद लेह और कारगिल की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि वे अब केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार बन चुके हैं। यह विचार है पर्यावरण आधारित विकास और लोकतांत्रिक स्वायत्तता का। सरकार के लिए भी यह एक अवसर है कि वह लद्दाख के साथ अपने संबंधों को पुनः परिभाषित करे। दमन के बजाय विश्वास बहाली के उपाय ही इस सीमावर्ती क्षेत्र में स्थायी शांति सुनिश्चित कर सकते हैं।

अंततःयह घटनाक्रम हमें लोकतंत्र की उस बुनियादी ताकत की याद दिलाता है जहाँ असहमति की आवाज़ को दबाने के हर प्रयास के बाद वह और अधिक मजबूती से उभरती है। लद्दाख की बर्फीली हवाओं में अब जो गर्माहट महसूस की जा रही हैवह किसी बदले की नहीं बल्कि अपने हक़ की है। सोनम वांगचुक का बाहर आना संवाद के बंद पड़े दरवाजों को फिर से खोलने की एक कोशिश है। यदि अब भी सही दिशा में कदम नहीं उठाए गएतो आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लद्दाख के इस संघर्ष ने पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम विकास की दौड़ में अपनी पहचान और प्रकृति को पीछे छोड़ने के लिए तैयार हैंवांगचुक की रिहाई इस लंबे संघर्ष का अंत नहींबल्कि उस नए अध्याय की प्रस्तावना है जिसमें हिमालय की सुरक्षा और लद्दाख के अधिकारों की इबारत लिखी जानी अभी बाकी है।

 

ईमेलmahendratone@gmail.com




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