शिक्षा का बाजारीकरण और छात्रों का भविष्य
-महेन्द्र तिवारी
भारत में शिक्षा अब केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं रह गई है। यह धीरे धीरे एक विशाल व्यापार में बदल चुकी है। इस व्यापार का सबसे चमकदार और सबसे खतरनाक चेहरा निजी प्रतियोगी शिक्षण उद्योग है। शहरों की दीवारों से लेकर चलभाष पटल तक हर जगह सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले छात्रों की मुस्कान, चयनित विद्यार्थियों की तस्वीरें और सफलता के बड़े बड़े दावे दिखाई देते हैं। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि बिना इन संस्थानों के सफलता असंभव लगने लगती है। लाखों परिवार अपनी आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर बच्चों को इन केंद्रों में भेज रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यही उनके भविष्य का एकमात्र रास्ता है।
सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार आज भारत में लगभग 27 से 33 प्रतिशत छात्र किसी न किसी प्रकार की निजी शिक्षा ले रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में यह संख्या और अधिक है। दिल्ली जैसे शहरों में लगभग 39 प्रतिशत छात्र इन संस्थानों से जुड़े हुए पाए गए हैं। यह आंकड़ा केवल शिक्षा की स्थिति नहीं बताता बल्कि उस मानसिक दबाव को भी दिखाता है जिसमें समाज जी रहा है। विद्यालयों और महाविद्यालयों पर भरोसा कम हुआ है और इन व्यापारिक केंद्रों को सफलता का संक्षिप्त मार्ग मान लिया गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस उद्योग का बड़ा हिस्सा शिक्षा से ज्यादा विपणन पर टिका हुआ है। आज आभासी माध्यमों से छात्रों को जोड़ने का काम बड़े स्तर पर किया जा रहा है। एक प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 62 प्रतिशत प्रवेश अब अंतर्जाल आधारित प्रचार के माध्यम से हो रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा अब विज्ञापन और पहचान निर्माण के उसी प्रतिरूप पर चल रही है जिस पर कोई बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलता है। फर्क केवल इतना है कि यहां उत्पाद कोई वस्तु नहीं बल्कि छात्रों का भविष्य है।
इन संस्थानों की सबसे बड़ी चाल उनका चयन प्रदर्शन होता है। हजारों और लाखों छात्रों की भीड़ में यदि 5 या 10 छात्रों का चयन हो जाए तो वही चेहरे हर विज्ञापन पट्ट पर दिखाई देने लगते हैं। ऐसा माहौल तैयार किया जाता है कि हर छात्र को लगे कि अगला चेहरा उसी का होगा। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि बाकी हजारों छात्रों का क्या हुआ। वे छात्र जो वर्षों तक शुल्क भरते रहे, जो किराये के कमरों में रहकर तैयारी करते रहे, जिनके परिवार कर्ज में डूब गए, उनका संघर्ष किसी विज्ञापन में जगह नहीं पाता।
यहां सबसे बड़ा खेल संख्या का है। कुछ संस्थान कम शुल्क रखकर गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों की भारी भीड़ जुटाते हैं। 1000 या 2000 रुपये का शुल्क सुनकर छात्रों को लगता है कि उन्हें बहुत बड़ा अवसर मिल रहा है। लेकिन जब ऐसे लाखों छात्र जुड़ते हैं तो वही छोटी रकम करोड़ों का कारोबार बना देती है। कम शुल्क का मतलब सेवा भावना नहीं होता। कई बार यह भीड़ इकट्ठा करने की रणनीति होती है। जितनी बड़ी भीड़, उतना बड़ा मुनाफा और उतनी ही बड़ी सफलता की कहानी।
विडंबना यह है कि छात्र मेहनत अपनी करते हैं लेकिन श्रेय पूरा संस्थान ले जाता है। यदि कोई छात्र सफल हो जाए तो संस्था कहती है कि यह उसकी शिक्षा का परिणाम है। लेकिन यदि लाखों छात्र असफल हो जाएं तो उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। असफल छात्र को कहा जाता है कि उसने पर्याप्त मेहनत नहीं की। इस तरह सफलता संस्थान की और असफलता छात्र की बना दी जाती है।
आज इस उद्योग ने छात्रों की मानसिकता भी बदल दी है। पहले शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करना होता था। अब शिक्षा केवल परीक्षा पास करने तक सीमित हो गई है। बच्चे विषय को गहराई से समझने के बजाय केवल प्रश्न हल करने की तकनीक सीख रहे हैं। उन्हें ज्ञान नहीं बल्कि अंक चाहिए। यही कारण है कि लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते रहते हैं लेकिन जीवन के व्यावहारिक कौशलों में बहुत पीछे रह जाते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या ने इस उद्योग को और मजबूत कर दिया है। केवल एक परीक्षा के लिए लाखों आवेदन आते हैं। उदाहरण के लिए 2026 की एक बड़ी प्रवेश परीक्षा में लगभग 15.68 लाख छात्रों ने आवेदन किया। इतनी बड़ी प्रतिस्पर्धा में स्वाभाविक रूप से अधिकांश छात्र असफल होंगे। लेकिन यह उद्योग इसी भय और असुरक्षा को अपने व्यापार का आधार बना लेता है। छात्र को यह महसूस कराया जाता है कि यदि उसने यह अतिरिक्त शिक्षा नहीं ली तो वह इस निर्मम प्रतियोगिता में बहुत पीछे रह जाएगा।
कोटा, दिल्ली, प्रयागराज, पटना और हैदराबाद जैसे शहर आज ऐसे विशाल केंद्रों में बदल चुके हैं। वहां हजारों छात्र छोटे छोटे कमरों में रहकर दिन रात तैयारी करते हैं। माता पिता अपनी जीवन भर की जमा पूंजी खर्च कर देते हैं। कई परिवार खेती बेच देते हैं, गहने गिरवी रख देते हैं और अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं। लेकिन सफलता की संभावना हमेशा बहुत कम रहती है। इसके बावजूद यह उद्योग लगातार बढ़ रहा है क्योंकि यह निरंतर एक झूठी उम्मीद बेचता है।
यह भी सच है कि हर संस्थान खराब नहीं होता। कुछ शिक्षक वास्तव में कड़ी मेहनत करते हैं और छात्रों की सहायता भी करते हैं। कई छात्रों को सही दिशा और मार्गदर्शन मिलता है। लेकिन वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब शिक्षा सेवा न रहकर पूरी तरह से एक क्रूर व्यापार बन जाती है। जब छात्रों को इंसान नहीं बल्कि केवल एक संख्या माना जाने लगता है। जब बड़े बड़े सभागारों में हजारों छात्रों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जाता है और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुनने के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
हमारे समाज की मानसिकता भी इस विकट स्थिति के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है। हमने सफलता को केवल सरकारी नौकरी, चिकित्सा और अभियांत्रिकी की उच्च परीक्षाओं से जोड़ दिया है। यदि कोई छात्र चिकित्सक, अभियंता या प्रशासनिक अधिकारी नहीं बनता तो उसे असफल माना जाने लगता है। इसी भारी सामाजिक दबाव ने इस उद्योग को असीमित शक्ति दी है। माता पिता भी लगातार डर और एक दूसरे से तुलना में जी रहे हैं। उन्हें लगता है कि यदि उनका बच्चा यह अंधी दौड़ नहीं दौड़ेगा तो वह जीवन में पीछे रह जाएगा।
आज स्थिति यह है कि कई छात्र अपनी मूल रुचि और क्षमता को समझे बिना ही इस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। किसी का सपना प्रशासनिक सेवा में जाना नहीं होता लेकिन परिवार और समाज के दबाव में वह वर्षों तक उसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। किसी को विज्ञान में बिल्कुल रुचि नहीं होती फिर भी उसे अभियांत्रिकी की तैयारी में जबरन भेज दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लाखों ऊर्जावान युवाओं की स्वाभाविक मौलिकता पूरी तरह से दब जाती है।
सामाजिक संपर्क मंचों ने इस पूरी समस्या को और भी अधिक विकराल बना दिया है। हर दिन सफल छात्रों के चलचित्र, उनके प्रेरक भाषण और चयन की काल्पनिक कहानियां दिखाई जाती हैं। लेकिन असफल छात्रों के टूटे सपनों पर कोई बात नहीं करता। मानसिक तनाव, गंभीर अवसाद और आत्महत्या जैसी अत्यंत दुखद घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं लेकिन इस उद्योग का प्रचार तंत्र इतना मजबूत है कि इन सभी गंभीर सवालों को बहुत जल्दी दबा दिया जाता है।
असल सवाल यह नहीं है कि ये संस्थान होने चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या शिक्षा को पूरी तरह से निष्ठुर बाजार के हवाले कर देना सही है। क्या एक ऐसा समाज वास्तव में स्वस्थ कहा जा सकता है जहां विद्यालयों और महाविद्यालयों से ज्यादा भरोसा निजी व्यापारिक केंद्रों पर किया जाने लगे। क्या हमारी यह व्यवस्था छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने वाला एक जिम्मेदार नागरिक बना रही है या उन्हें केवल एक परीक्षा देने वाला यंत्र बना रही है।
हमें यह गहराई से समझना होगा कि कोई भी व्यावसायिक संस्था ईश्वर नहीं होती। उसका प्राथमिक उद्देश्य हमेशा आर्थिक लाभ कमाना ही होता है। इसलिए छात्रों और अभिभावकों को इन चमकदार विज्ञापनों से बाहर निकलकर कठोर वास्तविकता को देखना होगा। यह परखना होगा कि संस्था में पढ़ाई का वास्तविक स्तर क्या है, छात्रों की कुल संख्या कितनी है, औसत छात्रों का परिणाम कैसा रहता है और वहां विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य का कितना ध्यान रखा जाता है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका प्राप्त करना या किसी बड़ी संस्था में स्थान पाना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का मूल उद्देश्य सोचने समझने की क्षमता विकसित करना, समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना और व्यक्ति को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाना भी है। यदि शिक्षा केवल चयन प्रतिशत और बड़े वेतनमान तक सीमित होकर रह जाए तो समाज धीरे धीरे पूरी तरह से संवेदनहीन हो जाता है।
आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि छात्र स्वयं को इस अंधी भीड़ का हिस्सा बनने से बचाएं। उन्हें यह समझना ही होगा कि सफलता केवल किसी बाहरी संस्था के चमत्कार के भरोसे नहीं मिलती। स्वयं की मेहनत, कठोर अनुशासन, सही दिशा और मानसिक संतुलन सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं। ये केंद्र केवल एक साधारण साधन हो सकते हैं, अंतिम मंजिल कभी नहीं। जब तक समाज विपणन को ही मेहनत और व्यापारियों को अपना मसीहा समझता रहेगा तब तक यह उद्योग और अधिक मजबूत होता जाएगा। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि छात्र आंख बंद करके किसी विज्ञापन पर विश्वास करने के बजाय तर्क करना और सही सवाल पूछना सीखें। क्योंकि शिक्षा का पहला और अंतिम उद्देश्य यही होना चाहिए कि इंसान स्वतंत्र रूप से सोच सके, जीवन को समझ सके और भ्रम तथा सत्य के बीच स्पष्ट रूप से फर्क कर सके।
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