शहनाई के जादूगर: उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का सांस्कृतिक अवदान
- महेन्द्र तिवारी
भारत के सांस्कृतिक आकाश में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी शहनाई की गूंज ने न केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं, बल्कि विश्व पटल पर भारत की साझी संस्कृति और 'गंगा-जमुनी तहजीब' को जीवंत कर दिया। 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव की एक पारंपरिक संगीतकार परिवार की कोख से जन्मे इस बालक का नाम उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए 'बिस्मिल्लाह' रखा था, जिसका अर्थ है 'ईश्वर के नाम से'। बचपन में उन्हें 'कमरुद्दीन' भी कहा जाता था, लेकिन नियति ने उनके लिए वह नाम चुन रखा था जो आगे चलकर संगीत का पर्याय बनने वाला था। बिस्मिल्लाह ख़ाँ का परिवार पीढ़ियों से बिहार की रियासतों में दरबारी संगीतकार रहा था, लेकिन शहनाई को विवाहों और मंदिरों की ड्योढ़ी से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों के गौरवमयी सिंहासन पर बिठाने का श्रेय केवल और केवल बिस्मिल्लाह ख़ाँ को ही जाता है। उनकी जीवन यात्रा केवल सुरों की साधना नहीं थी, बल्कि वह एक अटूट साधना, सादगी और आध्यात्मिक गहराई का अनूठा संगम थी, जिसने उन्हें 'भारत रत्न' जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान तक पहुँचाया।
छह वर्ष की अल्पायु में ही बिस्मिल्लाह अपने ननिहाल वाराणसी आ गए, जहाँ उनके मामा अली बख्श 'विलायती' काशी विश्वनाथ मंदिर में आधिकारिक शहनाई वादक थे। वाराणसी की गलियों, गंगा के तटों और मंदिरों के परिवेश ने उनके भीतर संगीत के प्रति एक अनूठी दृष्टि विकसित की। उन्होंने अपने मामा से संगीत की बारीकियां सीखीं, लेकिन उनके सबसे बड़े शिक्षक तो स्वयं बाबा विश्वनाथ और गंगा की लहरें थीं। बिस्मिल्लाह ख़ाँ अक्सर याद करते थे कि कैसे वे घंटों तक बालाजी मंदिर के शांत एकांत में बैठकर रियाज किया करते थे, जहाँ सुरों की गूंज और मंदिर की घंटियों के बीच उन्हें एक दिव्य शांति का अनुभव होता था। उनके लिए संगीत और इबादत में कोई भेद नहीं था। एक कट्टर मुसलमान होने के बावजूद, सरस्वती और शिव के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा इस बात का प्रमाण थी कि कला धर्म की सीमाओं को लांघकर मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर खिलती है। उन्होंने शहनाई को एक 'लोक वाद्य' से 'शास्त्रीय वाद्य' में परिवर्तित करने के लिए दशकों तक कठिन परिश्रम किया, जिसमें उन्होंने रागों की जटिलताओं को इस प्रकार पिरोया कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।
शहनाई वादन में उनकी महारत का पहला बड़ा प्रदर्शन 1937 में कलकत्ता के 'ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस' में हुआ, जहाँ उन्होंने श्रोताओं को आश्चर्यचकित कर दिया। इसके बाद उनकी ख्याति देश के कोने-कोने में फैल गई। भारत के इतिहास में उनका स्थान उस समय स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया, जब 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता की पहली सुबह पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने अपनी शहनाई की तान छेड़ी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विशेष रूप से उन्हें आमंत्रित किया था ताकि भारत की नई सुबह का स्वागत राग 'काफी' के पवित्र सुरों से हो सके। उसके बाद से यह एक परंपरा बन गई कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के समारोहों की शुरुआत उनकी शहनाई की मधुर मंगलध्वनि से होती थी। बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए शहनाई केवल एक वाद्य यंत्र नहीं थी, बल्कि वह उनकी आत्मा का विस्तार थी। उनकी उंगलियां जब शहनाई के छिद्रों पर थिरकती थीं, तो ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं गा रही हो।
उस्ताद की सादगी विश्वविख्यात थी। अपार प्रसिद्धि और धन-दौलत मिलने के बावजूद वे आजीवन वाराणसी की तंग गलियों के एक साधारण से मकान में रहे। उन्हें अपनी 'साइकिल रिक्शा' की सवारी और स्थानीय भोजन से अगाध प्रेम था। वे अक्सर कहते थे कि उन्हें दुनिया के किसी भी कोने में ले जाओ, लेकिन उन्हें मल्लहिया टोला की याद और गंगा का किनारा हमेशा बेचैन कर देता है। एक बार उनके एक धनी शिष्य ने उन्हें अमेरिका में बसने का प्रस्ताव दिया और वादा किया कि वह वहां बिल्कुल वाराणसी जैसा माहौल बना देगा, मंदिर बनवा देगा और गंगा जैसा परिवेश तैयार कर देगा। उस्ताद ने बड़ी मासूमियत और हाजिरजवाबी से पूछा, "क्या तुम वहां गंगा मैया को भी ले आओगे?" यह उनका अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम ही था जिसने उन्हें कभी भारत से बाहर बसने नहीं दिया, हालांकि उन्होंने विश्व के लगभग हर बड़े देश में अपने फन का प्रदर्शन किया और एडिनबर्ग संगीत उत्सव से लेकर कान फिल्म महोत्सव तक हर जगह वाहवाही लूटी।
सिनेमा जगत में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी, हालांकि वे वहां की चकाचौंध से हमेशा दूर रहे। फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' में उनका संगीत आज भी कालजयी माना जाता है। उन्होंने कन्नड़ फिल्म 'सनादी अपन्ना' के लिए भी शहनाई बजाई, लेकिन फिल्मी दुनिया की कृत्रिमता उन्हें कभी रास नहीं आई। वे हमेशा शुद्धतावादी रहे और संगीत की पवित्रता से कभी समझौता नहीं किया। उनका मानना था कि संगीत खुदा तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता है। उनके वादन में 'ठुमरी', 'दादरा' और 'चैती' का जो मिठास भरा अंदाज था, वह सीधे दिल में उतर जाता था। वे रागों के राजा थे, लेकिन उनके स्वभाव में रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। वे स्वयं को हमेशा संगीत का एक अदना सा छात्र मानते रहे। अपनी अंतिम सांस तक वे ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहे कि "ऐ मालिक, मुझे एक सच्चा सुर दे दे।" यह उनकी महानता ही थी कि अस्सी वर्ष की साधना के बाद भी वे अपने सुरों में और अधिक शुद्धता की तलाश करते रहे।
बिस्मिल्लाह ख़ाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक युग थे। उन्होंने शहनाई को वह सम्मान दिलाया जिसकी वह हकदार थी। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और अंततः 2001 में 'भारत रत्न' से अलंकृत किया गया। जब उन्हें भारत रत्न मिला, तो उन्होंने अत्यंत भावुक होकर कहा था कि "सभी देशवासियों से मेरी यही गुजारिश है कि अपने बच्चों को संगीत सिखाएं, यह इस देश की सबसे समृद्ध परंपरा है; पश्चिम के लोग भी इसे सीखने यहाँ आते हैं।" उनके लिए संगीत हिंदू और मुसलमान के बीच का सेतु था। वे मुहर्रम के जुलूस में नंगे पैर शहनाई बजाते हुए चलते थे और वही श्रद्धा उनके मन में बाबा विश्वनाथ के लिए भी थी। उनकी कला ने सिखाया कि कट्टरता और संकीर्णता कला के सबसे बड़े शत्रु हैं।
21 अगस्त 2006 को जब यह सुर-साधक शांत हुआ, तो देश ने न केवल अपना एक रत्न खोया, बल्कि संगीत की वह मंगलध्वनि भी मौन हो गई जो दशकों से हमें शांति और भाईचारे का संदेश दे रही थी। उनकी शहनाई को उनकी कब्र के साथ ही दफनाया गया, जो उनके और उनके वाद्य के बीच के उस अटूट संबंध का प्रतीक था जो मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं हुआ। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि लक्ष्य के प्रति समर्पण हो और हृदय में विनम्रता हो, तो एक साधारण परिवार में जन्मा व्यक्ति भी असाधारण ऊंचाइयों को छू सकता है। उनका व्यक्तित्व और उनका संगीत आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मशाल का काम करेगा, जो यह याद दिलाता रहेगा कि सुरों की दुनिया में कोई पराया नहीं होता और संगीत ही वह वैश्विक भाषा है जो पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरो सकती है। आज भी जब हम शहनाई की तान सुनते हैं, तो बरबस ही वह हंसमुख चेहरा और आँखों में चमक लिए उस्ताद की छवि उभर आती है, जो मानो कह रहे हों कि संगीत साधना है, व्यापार नहीं। उनका अभाव हमेशा खलेगा, लेकिन उनकी रिकॉर्डिंग और उनके द्वारा स्थापित आदर्शों के माध्यम से वे हमेशा हमारे बीच जीवंत रहेंगे। भारत के सांस्कृतिक गौरव का जब-जब जिक्र होगा, उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ सबसे पहले लिया जाएगा।
ईमेल: mahendratone@gmail.com
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