शून्य उत्सर्जन की दिशा में भारतीय रेलवे का सफर
-महेन्द्र तिवारी
भारतीय रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े और व्यस्ततम रेल नेटवर्कों में से एक है। अपनी स्थापना के समय से लेकर आज तक भारतीय रेलवे ने समय के साथ अपनी तकनीक और कार्यप्रणाली में कई बड़े और परिवर्तनकारी बदलाव किए हैं। कोयले से चलने वाले भाप इंजनों से लेकर डीजल और फिर व्यापक विद्युतीकरण तक का सफर रेलवे की निरंतर तकनीकी प्रगति को दर्शाता है। इसी विकास यात्रा में अब एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। भारत ने अपनी पहली हाइड्रोजन ईंधन सेल आधारित ट्रेन का सफलतापूर्वक संचालन शुरू कर दिया है। नमो ग्रीन रेल के नाम से जानी जाने वाली यह अत्याधुनिक ट्रेन हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच पटरियों पर उतरी है। यह केवल एक नई ट्रेन का उद्घाटन मात्र नहीं है बल्कि यह ऊर्जा के स्वच्छ विकल्पों की ओर भारत के एक बड़े और निर्णायक कदम का प्रतीक है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह से स्वदेशी होना है। इस ट्रेन का निर्माण भारतीय रेलवे की चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में किया गया है जो भारत की आत्मनिर्भरता और इंजीनियरिंग क्षमता का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। इस ट्रेन के स्वरूप और क्षमता की बात करें तो इसमें दो विशेष रूप से डिजाइन की गई हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार और आठ वातानुकूलित यात्री कोच शामिल किए गए हैं। अपनी पूरी क्षमता के साथ यह ट्रेन एक बार में लगभग छब्बीस सौ यात्रियों को उनके गंतव्य तक सुरक्षित और सुगमता से पहुंचाने में सक्षम है। गति के मोर्चे पर भी यह ट्रेन काफी उन्नत है। हालांकि इसकी अधिकतम डिजाइन गति एक सौ दस किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है लेकिन वर्तमान प्रायोगिक चरण में इसे पचहत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की सुरक्षित रफ्तार से संचालित किया जा रहा है।
इस ट्रेन के काम करने का तरीका पारंपरिक रेलगाड़ियों से बिल्कुल अलग और विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार है। डीजल इंजनों में जहां जीवाश्म ईंधन जलाया जाता है और इलेक्ट्रिक ट्रेनों में ऊपर लगे तारों से बिजली ली जाती है वहीं यह हाइड्रोजन ट्रेन अपनी बिजली खुद बनाती है। ट्रेन की छतों या विशेष डिब्बों में उच्च दबाव वाले मजबूत टैंक लगे होते हैं जिनमें हाइड्रोजन गैस सुरक्षित रूप से भरी होती है। यह गैस ट्रेन में लगे अत्याधुनिक फ्यूल सेल के भीतर जाती है। वहां यह गैस वायुमंडल से खींची गई ऑक्सीजन के साथ एक इलेक्ट्रो रासायनिक प्रतिक्रिया करती है। इस पूरी रासायनिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारी मात्रा में बिजली पैदा होती है और यही वह बिजली है जो ट्रेन की भारी भरकम मोटरों को चलाकर उसे पटरियों पर आगे बढ़ाती है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे खूबसूरत और पर्यावरण के अनुकूल पहलू यह है कि इसमें कोई हानिकारक धुआं या कार्बन गैस वातावरण में नहीं घुलती है। बिजली बनने की इस प्रक्रिया के अंत में केवल शुद्ध जलवाष्प और थोड़ी सी ऊष्मा ही बाहर आती है जिसे पूरी तरह से शून्य उत्सर्जन वाली हरित तकनीक कहा जाता है। ऊर्जा को और अधिक कुशल बनाने के लिए इस ट्रेन में हाइब्रिड ऊर्जा प्रणाली का भी बेहतरीन उपयोग किया गया है। फ्यूल सेल के अलावा इस ट्रेन में उच्च क्षमता वाली लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियां भी लगाई गई हैं। जब ट्रेन एक समान गति से चल रही होती है तो अतिरिक्त बिजली इन बैटरियों में जमा हो जाती है। इसके अलावा जब चालक ब्रेक लगाता है तो उस घर्षण से पैदा होने वाली ऊर्जा भी बेकार नहीं जाती बल्कि वह सीधे इन बैटरियों को चार्ज कर देती है। जब ट्रेन को अचानक तेजी से आगे बढ़ना
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