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सैन्य परंपराओं और पोशाक में ऐतिहासिक बदलाव

 

सैन्य परंपराओं और पोशाक में ऐतिहासिक बदलाव

-महेन्द्र तिवारी 


भारतीय सेना का इतिहास पराक्रम, शौर्य और अप्रतिम बलिदान की गाथाओं से समृद्ध है। स्वतंत्रता के बाद से ही हमारी सेना ने देश की सीमाओं की रक्षा करने और राष्ट्रीय संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है। हालांकि, स्वतंत्रता के कई दशकों बाद भी सेना की कुछ आंतरिक व्यवस्थाओं, नियमों, पोशाक और प्रतीकों में ब्रिटिश काल की स्पष्ट छाप दिखाई देती थी। वर्तमान समय में भारतीय सेना अपनी इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में एक युगांतरकारी और अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। सेना द्वारा अपनी वेशभूषा नीति, औपचारिक परंपराओं और सदियों पुराने रीति-रिवाजों में किए जा रहे बदलाव इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि अब देश अपनी औपनिवेशिक विरासत को पीछे छोड़ने के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार हो चुका है। इन महत्वपूर्ण और दूरगामी सुधारों का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना को विदेशी प्रभाव से मुक्त कराकर विशुद्ध रूप से भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अपनी ऐतिहासिक जड़ों से गहराई से जोड़ना है। यह संपूर्ण प्रक्रिया भारत सरकार के उन 5 महासंकल्पों का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिन्हें पंच प्रण के नाम से जाना जाता है। इन संकल्पों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रण गुलामी की हर सोच और उसके प्रत्येक प्रतीक से पूर्ण मुक्ति पाना है, जिसे भारतीय सेना अब धरातल पर पूरी निष्ठा के साथ उतार रही है।


सैनिक परंपराओं में सबसे पहला और प्रत्यक्ष बदलाव सैन्य कवायद और आधिकारिक समारोहों के दौरान देखा जा सकता है। ब्रिटिश शासनकाल से ही यह व्यवस्था निरंतर चली आ रही थी कि जब भी कोई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी किसी सैनिक कदमताल या विदाई समारोह की सलामी लेता था, तो वह समीक्षा अधिकारी के रूप में अपने साथ एक विशेष औपचारिक तलवार रखता था। यह तलवार ब्रिटिश काल में औपनिवेशिक शासकों द्वारा अपनी शक्ति, सर्वोच्च कमान और भारतीय सैनिकों पर अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन करने का एक मुख्य माध्यम मानी जाती थी। स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संप्रभु राष्ट्र में इस तरह के सामंती प्रतीकों की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी। इसी ऐतिहासिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए अब समीक्षा अधिकारी द्वारा सैन्य मार्च के दौरान या किसी भी अन्य औपचारिक निरीक्षण में तलवार रखने की इस पुरानी प्रथा को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों द्वारा अपनी कमान और नेतृत्व के प्रतीक के रूप में ले जाई जाने वाली विशेष छड़ी के उपयोग की भी गहन समीक्षा की गई है और इसके इस्तेमाल को अब बेहद सीमित कर दिया गया है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भारतीय सेना में नेतृत्व और सम्मान का आधार कोई बाहरी वस्तु या औपनिवेशिक दिखावा नहीं, बल्कि अधिकारी की अपनी योग्यता, कर्तव्यपरायणता और अपने देश के प्रति अटूट निष्ठा है।


इस वैचारिक परिवर्तन का सीधा और गहरा असर सैन्य अधिकारियों के पहनावे और पोशाक से जुड़े नियमों पर भी दिखाई दे रहा है। एक लंबे समय से यह देखा जा रहा था कि सैन्य अधिकारियों के भोजनालयों और अन्य महत्वपूर्ण औपचारिक आयोजनों में पश्चिमी देशों के कोट, औपचारिक वस्त्रों और गले के बंध का ही प्रचलन अनिवार्य बना हुआ था। भारतीय जलवायु और यहाँ की गौरवशाली संस्कृति के सर्वथा विपरीत इस तरह के विदेशी पहनावे को ढोना भी एक प्रकार की मानसिक परतंत्रता का ही हिस्सा माना जा सकता है। इस पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए अब अधिकारियों की औपचारिक पोशाक में पहली बार 'बंदी' नाम के पारंपरिक भारतीय परिधान को आधिकारिक तौर पर स्थान दिया गया है। यह बिना आस्तीन का एक विशेष वस्त्र है, जिसे आम बोलचाल में पारंपरिक कुर्ता या भारतीय नेहरू वेशभूषा के रूप में भी जाना जाता है। अब सैन्य अधिकारी इसे अपनी कमीज और पतलून के साथ अत्यंत गर्व से धारण कर सकते हैं। यह कदम न केवल भारतीय वस्त्र उद्योग और स्थानीय शिल्पकला को नया सम्मान देता है, बल्कि सैन्य जीवनशैली में एक विशिष्ट भारतीय पहचान का समावेश भी करता है। इसके माध्यम से यह दृढ़ संदेश दिया गया है कि हमारे अपने पारंपरिक परिधान भी दुनिया के किसी भी उच्च स्तरीय आधिकारिक आयोजन के लिए पूरी तरह से गरिमापूर्ण और सर्वश्रेष्ठ हैं।


परंपराओं के इस शुद्धिकरण के अंतर्गत केवल पहनावा ही नहीं बदला गया है, बल्कि अधिकारियों की विदाई के तौर-तरीकों में भी बड़े सुधार किए गए हैं। पूर्ववर्ती नियमों के अनुसार, जब भी सेना के शीर्ष पदों पर आसीन अधिकारी, जैसे थल सेनाध्यक्ष या सैन्य कमान प्रमुख अपनी लंबी सेवा के बाद सेवानिवृत्त होते थे, तो उन्हें विदाई देने के लिए घोड़ों से खिंचने वाली एक पुरानी पारंपरिक बग्घी का उपयोग किया जाता था। यह घोड़ों वाली बग्घी प्रथा पूरी तरह से ब्रिटिश राजसी ठाट-बाठ और आम जनता तथा साधारण सैनिकों से दूरी बनाए रखने की औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित थी, जो एक लोकतान्त्रिक देश की सेना में उचित नहीं जान पड़ती थी। अब सेना ने इस सामंती विदाई प्रथा को भी हमेशा के लिए बंद करने का ऐतिहासिक फैसला किया है। अब अधिकारियों की विदाई बेहद सादगीपूर्ण, अनुशासित और भारतीय मूल्यों के अनुरूप की जाती है। यह बदलाव सैन्य अधिकारियों और उनके अधीन काम करने वाले जवानों के बीच की दूरी को कम करने तथा सेना के भीतर एक समतावादी और आत्मीय वातावरण स्थापित करने में बहुत सहायक सिद्ध हो रहा है।


सैन्य संस्कृति का एक और बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा उसका संगीत होता है, जो सैनिकों के भीतर अदम्य साहस का संचार करता है। युद्ध के मैदान से लेकर शांति काल के समारोहों तक, सैन्य संगीत दल हमेशा से जवानों में जोश और देशप्रेम की भावना भरते रहे हैं। लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हमारे विभिन्न सैन्य संगीत दल पुरानी अंग्रेजी और स्कॉटिश धुनों को बजाने के लिए विवश थे। गणतंत्र दिवस उत्सव के समापन समारोह के अवसर पर आयोजित होने वाले भव्य कार्यक्रम में वर्षों तक एक विदेशी प्रार्थना धुन बजाई जाती थी, जिसका भारतीय जनमानस से कोई भी भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। अब इस व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए उस पुरानी विदेशी धुन के स्थान पर 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जैसी अमर, लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भारतीय देशभक्ति धुन को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, सेना के सभी संगीत दल अब विदेशी धुनों की बजाय भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और देश की माटी से जुड़ी देशभक्ति की धुनों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। जब सैन्य वाद्यों से भारतीय राग और लोक धुनें निकलती हैं, तो वे न केवल सैनिकों का मनोबल बढ़ाती हैं बल्कि पूरे देश को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने का काम करती हैं।


इस प्रकार, सैन्य व्यवस्था और उसकी जीवनशैली में किए गए ये सभी बदलाव केवल ऊपरी या सतही परिवर्तन नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज और राष्ट्र की सोच में आ रहे एक व्यापक गुणात्मक सुधार को रेखांकित करते हैं। वर्ष 1947 में भले ही हमें राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई थी, लेकिन प्रशासनिक और सैन्य स्तर पर अपनी जड़ों को पहचानकर पूर्ण मानसिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की दिशा में यह एक अत्यंत ठोस कदम है। भारतीय सेना द्वारा उठाए गए ये कदम 21वीं सदी के आत्मनिर्भर, सशक्त और स्वाभिमानी भारत की नई तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली, अनुशासित और आधुनिक सेनाओं में शुमार हमारी सेना अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपराओं और जड़ों की ओर लौटती है, तो इससे देश के प्रत्येक नागरिक में एक नया आत्मविश्वास और अपनी साझी विरासत के प्रति गहरा आदर भाव जागृत होता है। इन सुधारों के माध्यम से सेना ने यह साबित कर दिया है कि वह आधुनिकतम तकनीकों और घातक हथियारों से लैस होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से पूरी तरह भारतीय मूल्यों, सिद्धांतों और राष्ट्रभक्ति के प्रति समर्पित है। यह युगांतरकारी बदलाव भविष्य की पीढ़ियों को भी अपनी अनूठी संस्कृति पर गर्व करने की निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।

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