रासबिहारी बोस: भारतीय क्रांति के गुमनाम महानायक
- महेन्द्र तिवारी
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रायः दो धाराओं में बाँटकर देखा जाता है—एक अहिंसक, सत्याग्रह और जनआंदोलन की धारा, और दूसरी सशस्त्र क्रांति की वह धारा, जिसने गुप्त संगठनों, षड्यंत्रों और प्रत्यक्ष हिंसक प्रतिरोध के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी। दुर्भाग्य से इतिहास लेखन में दूसरी धारा के कई नायकों को या तो सीमित स्थान मिला या वे पूरी तरह हाशिये पर चले गए। रासबिहारी बोस ऐसे ही एक गुमनाम किंतु असाधारण क्रांतिकारी थे, जिनका योगदान न केवल भारत में बल्कि भारत से बाहर, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ।
25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदहा गाँव में जन्मे रासबिहारी बोस एक शिक्षित, बौद्धिक और अनुशासित परिवार से आए थे। उनके पिता विनोद बिहारी बोस सरकारी सेवा में थे, जिससे रासबिहारी को प्रारंभ से ही औपनिवेशिक शासन की कार्यप्रणाली को नज़दीक से देखने का अवसर मिला। चंदननगर और कोलकाता में हुई उनकी शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को विशेष रूप से आकार दिया। चंदननगर उस समय फ्रांसीसी शासन के अधीन था और फ्रांसीसी क्रांति के विचार—स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व—उनके मन में गहराई तक उतर गए। यह कोई संयोग नहीं था कि आगे चलकर वे केवल भारत की स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि एशिया के उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों के भी एक महत्वपूर्ण सेतु बने।
देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में हेड क्लर्क के रूप में उनकी नियुक्ति एक सामान्य सरकारी नौकरी प्रतीत होती है, लेकिन इसी आवरण के पीछे एक अत्यंत सक्रिय क्रांतिकारी मस्तिष्क काम कर रहा था। रासबिहारी बोस उन विरले क्रांतिकारियों में थे जो संगठन, रणनीति और गोपनीयता—तीनों में दक्ष थे। बाघा जतिन जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में रहकर उन्होंने सशस्त्र विद्रोह को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के रूप में विकसित किया।
23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर किया गया बम हमला भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की सबसे साहसिक घटनाओं में गिना जाता है। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की अजेयता के मिथक को तोड़ने का प्रयास था। हार्डिंग के बच जाने के बावजूद इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को गहरी बेचैनी में डाल दिया। इसके बाद रासबिहारी बोस का पुलिस को चकमा देकर बच निकलना और सामान्य रूप से अपनी नौकरी पर लौट आना, उनकी असाधारण संगठन क्षमता और धैर्य का प्रमाण है।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रासबिहारी बोस ने गदर पार्टी के साथ मिलकर जो योजना बनाई, वह यदि सफल हो जाती तो भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास संभवतः बिल्कुल अलग होता। ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर एक साथ विद्रोह की योजना, 21 फरवरी 1915 की तय तारीख और व्यापक तैयारी—ये सभी दर्शाते हैं कि यह कोई आवेगपूर्ण प्रयास नहीं था। दुर्भाग्य से एक मुखबिर की गद्दारी ने इस योजना को विफल कर दिया और इसके बाद जो दमन चक्र चला, उसने क्रांतिकारी आंदोलन को गहरी चोट पहुँचाई।
जब भारत में रहना उनके लिए असंभव हो गया, तब रासबिहारी बोस का जापान जाना किसी पलायन की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष के विस्तार की शुरुआत थी। रवींद्रनाथ टैगोर के एक रिश्तेदार के नाम से जापान पहुँचना, ब्रिटिश दबावों के बावजूद वहाँ शरण मिलना और फिर जापानी समाज में स्वयं को स्थापित करना—यह सब उनकी दूरदृष्टि और अंतरराष्ट्रीय समझ का परिचायक है। तोशिको सोमा से विवाह और जापानी नागरिकता ग्रहण करना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की कानूनी पकड़ से बाहर निकलने की एक राजनीतिक रणनीति भी थी।
जापान में रहते हुए रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता को एशियाई स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक संदर्भ में रखा। उन्होंने जापानी जनता और नेतृत्व को यह समझाने का प्रयास किया कि भारत की गुलामी केवल भारत की समस्या नहीं, बल्कि एशिया की सामूहिक पराजय का प्रतीक है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापान के हाथों ब्रिटिश पराजित हुए और हजारों भारतीय सैनिक युद्धबंदी बने, तब रासबिहारी बोस ने इस ऐतिहासिक अवसर को पहचान लिया।
इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना और आजाद हिंद फौज के गठन का विचार उन्हीं के मस्तिष्क की उपज था। लेकिन उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वे सत्ता या नेतृत्व से चिपके रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। जब उन्हें लगा कि इस आंदोलन को एक युवा, ऊर्जावान और करिश्माई नेतृत्व की आवश्यकता है, तो उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को आमंत्रित किया और बिना किसी संकोच के संपूर्ण नेतृत्व उन्हें सौंप दिया। यह घटना भारतीय राजनीतिक संस्कृति में दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बजाय उद्देश्य को प्राथमिकता दी गई।
रासबिहारी बोस का योगदान केवल संगठनात्मक या सैन्य नहीं था। वे लेखक, विचारक और सांस्कृतिक दूत भी थे। जापानी भाषा सीखकर उन्होंने पुस्तकों और पत्रिकाओं के माध्यम से भारत की स्थिति को जापानी समाज के सामने रखा। ‘न्यू एशिया’ पत्रिका का संपादन इस बात का प्रमाण है कि वे विचारों की लड़ाई को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे जितना हथियारों की।
21 जनवरी 1945 को टोक्यो में उनका निधन हुआ। यह विडंबना ही है कि जिनके प्रयासों से आजाद हिंद फौज का सपना साकार हुआ, वे स्वतंत्र भारत को अपनी आँखों से नहीं देख सके। जापान के सम्राट द्वारा दिया गया ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ सम्मान उनके अंतरराष्ट्रीय योगदान की स्वीकृति था, लेकिन भारत में उन्हें वह स्थान अब भी पूरी तरह नहीं मिला है जिसके वे अधिकारी थे।
आज, जब हम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को नए सिरे से देखने की बात करते हैं, रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों को स्मरण करना केवल अतीत का सम्मान नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए भी एक सबक है। उन्होंने दिखाया कि राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं होता, कि मातृभूमि के लिए संघर्ष सीमाओं में बँधा नहीं होता, और कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समय आने पर स्वयं पीछे हटना जानता है। रासबिहारी बोस वास्तव में भारतीय क्रांति के गुमनाम महानायक हैं—ऐसे महानायक, जिनकी गूंज आज भी इतिहास के शोर में सुनाई देने की प्रतीक्षा कर रही है।
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