मानसून का बदलता मिजाज
-महेन्द्र तिवारी
भारत में मानसून केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा, अर्थव्यवस्था और कृषि का मुख्य आधार है। वर्ष 2026 में भी करोड़ों देशवासी इस जीवनदायिनी वर्षा की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इस वर्ष मानसून ने अपने निर्धारित समय पर दस्तक दी थी, जिससे आरंभ में कृषकों और नीति निर्माताओं में भारी उत्साह देखा गया था। मई के अंतिम सप्ताह में केरल के तट पर वर्षा की पहली बूंदों के साथ इस यात्रा का आरंभ हुआ था, लेकिन जून के मध्य में आकर इसकी गति अप्रत्याशित रूप से मन्द हो गई। इस मन्दता ने देश के कई हिस्सों में जल संकट और भीषण ग्रीष्म लहर जैसी स्थितियों को जन्म दिया, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। हालांकि, प्रकृति का यह चक्र सदैव परिवर्तनशील रहता है और जून के उत्तरार्ध में इसमें एक बार फिर व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने नई आशाएं जगा दी हैं।
जून महीने के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि इस वर्ष जून का महीना सामान्य की तुलना में काफी सूखा रहा है। 15 जून से 23 जून के बीच मानसून की प्रगति लगभग थम सी गई थी, जिसके कारण संपूर्ण देश में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। यह कमी विशेष रूप से मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में अधिक महसूस की गई, जहां तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था। इस अवधि में जलाशयों के जल स्तर में तेजी से गिरावट आई और धान की नर्सरी तैयार करने वाले किसानों की चिंताएं बढ़ गईं। कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना था कि यदि मानसून की यह सुस्ती जुलाई के प्रथम सप्ताह तक खिंच जाती, तो इससे खरीफ की फसलों के उत्पादन पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था, लेकिन समय रहते मौसम के मिजाज में सुधार हो गया।
मौसम वैज्ञानिकों ने जून के महीने में आई इस सुस्ती के पीछे कई जटिल वैश्विक और स्थानीय वायुमंडलीय कारकों को उत्तरदायी माना है। सबसे प्रमुख कारण हिंद महासागर के ऊपर मैडेन जूलियन ऑसिलेशन का कमजोर होना था, जो बादलों और चक्रवातों के निर्माण की एक वैश्विक प्रणाली है। इसके अतिरिक्त, अफ्रीका के पूर्वी तट से भारत की ओर नमी से भरी हवाएं लाने वाली सोमाली जेट स्ट्रीम की गति भी इस बार काफी धीमी पाई गई। एक अन्य महत्वपूर्ण भौगोलिक कारक पश्चिम एशिया से आने वाली गर्म और शुष्क हवाएं थीं, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के मध्य भाग पर एक उच्च दबाव का क्षेत्र निर्मित कर दिया था। इस उच्च दबाव के कारण समुद्र से आने वाली नम हवाएं बादलों का रूप नहीं ले पा रही थीं और जो बादल बन भी रहे थे, वे वाष्पीकृत होकर बिखर जा रहे थे।
इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच, 23 जून 2026 के बाद वायुमंडलीय दशाओं में एक तीव्र और सकारात्मक परिवर्तन देखा गया। हिंद महासागर में हवाओं के दबाव में कमी आई और सोमाली जेट ने पुनः अपनी स्वाभाविक गति प्राप्त कर ली। इसके परिणामस्वरूप, दक्षिण-पश्चिम मानसून ने एक बार फिर से अत्यंत तीव्र रफ्तार पकड़ ली है और यह देश के उन हिस्सों की ओर तेजी से बढ़ रहा है जो अब तक सूखे की मार झेल रहे थे। वर्तमान में मानसून की उत्तरी सीमा गुजरात के सूरत, मध्य प्रदेश के इंदौर और मंडला, झारखंड के डाल्टनगंज और बिहार के मोतिहारी शहर से होकर गुजर रही है। मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि अगले 2 से 3 दिनों के भीतर परिस्थितियां पूरी तरह से अनुकूल हो जाएंगी, जिससे मानसून गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के शेष बचे हुए भू-भागों को पूरी तरह से आच्छादित कर लेगा।
देश की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, हरियाणा, पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाले नागरिकों के लिए मौसम विभाग ने राहत भरा पूर्वानुमान जारी किया है। 29 जून 2026 से लेकर 2 जुलाई 2026 के बीच इन क्षेत्रों में मानसून के आगमन की पूरी संभावना बन चुकी है। मौसम कार्यालय ने इन क्षेत्रों के लिए विशेष सतर्कता संदेश जारी किया है, जिसके अनुसार इन दिनों में 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से तेज हवाएं चलने और मध्यम से भारी वर्षा होने की प्रबल आशंका है। इस संभावित वर्षा से पिछले कई हफ्तों से जारी असहनीय उमस और अत्यधिक तापमान से स्थानीय निवासियों को बड़ी राहत मिलेगी। राजधानी और उसके समीपवर्ती नगरों में स्थानीय प्रशासन ने भारी वर्षा की स्थिति में जलभराव से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है।
यदि हम पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की स्थिति पर दृष्टि डालें, तो वहां की परिस्थितियां देश के अन्य भागों से सर्वथा भिन्न और गंभीर हैं। असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम जैसे राज्यों में मानसून की सक्रियता अत्यंत तीव्र बनी हुई है। मौसम विज्ञान विभाग ने इन पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के लिए अत्यधिक भारी वर्षा की चेतावनी जारी की है। आंकड़ों के अनुसार, अगले 3 से 4 दिनों में इन राज्यों के कुछ स्थानों पर 7 से 20 सेंटीमीटर तक अत्यंत भारी वर्षा होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। इतनी अधिक मात्रा में होने वाली वर्षा के कारण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के जल स्तर में तीव्र वृद्धि होने की आशंका है, जिससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। स्थानीय आपदा प्रबंधन बलों को पूरी तरह से मुस्तैद रहने का निर्देश दिया गया है।
भारत के पश्चिमी तट और मध्यवर्ती राज्यों में भी मानसून की सक्रियता में उल्लेखनीय सुधार देखा जा रहा है। महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों, विशेषकर कोंकण और गोवा, तथा कर्नाटक के तटीय जिलों में पिछले 48 घंटों से निरंतर वर्षा हो रही है। मध्य भारत के छत्तीसगढ़ और विदर्भ क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से झमाझम वर्षा का दौर आरंभ हो चुका है, जिसने वहां की तप्त धरती को शीतलता प्रदान की है। बिहार और झारखंड में भी मेघगर्जन और बिजली चमकने के साथ तेज वर्षा की गतिविधियां दर्ज की जा रही हैं, जहां हवा की गति 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है। यह वर्षा न केवल कृषि कार्यों के लिए संजीवनी का काम कर रही है, बल्कि इससे शहरी क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति में भी सुधार होने की पूरी उम्मीद है।
कृषि प्रधान भारत के लिए मानसून का यह पुनरुद्धार किसी वरदान से कम नहीं है। जून की कमी को देखते हुए, जुलाई के महीने में होने वाली वर्षा पर संपूर्ण देश की नजरें टिकी हुई हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जुलाई के प्रथम सप्ताह में होने वाली यह व्यापक वर्षा देश में खरीफ फसलों, मुख्य रूप से धान, मक्का, बाजरा, दलहन और तिलहन की बुआई के लिए अत्यंत उपयुक्त समय पर आ रही है। यदि जुलाई के पूरे महीने में वर्षा का वितरण समान और संतुलित रहता है, तो जून में हुई 40 प्रतिशत की कमी का कृषि उत्पादन पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। देश के प्रमुख जलाशयों में पानी की आवक बढ़ने से आगामी महीनों में पनबिजली उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था भी सुचारू रूप से संचालित हो सकेगी, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करेगी।
निष्कर्षतः, वर्ष 2026 का मानसून भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी अनिश्चित प्रकृति का एक और उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। शुरुआती दौर की सुस्ती और उसके बाद आई इस तीव्र तेजी ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक विज्ञान और उन्नत पूर्वानुमान प्रणालियों के बावजूद प्रकृति के इस विशाल चक्र को पूरी तरह समझना आज भी एक बड़ी चुनौती है। फिर भी, वर्तमान वायुमंडलीय संकेत अत्यंत उत्साहजनक हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि आने वाले दिन पूरे देश के लिए समृद्धि और खुशहाली लेकर आएंगे। देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोग, चाहे वे खेतों में काम करने वाले किसान हों या महानगरों में रहने वाले कामकाजी नागरिक, सभी इस समय बादलों की गड़गड़ाहट और वर्षा की फुहारों का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY