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मसालों की शुद्धता पर उठते सवाल

 

मसालों की शुद्धता पर उठते सवाल

-महेन्द्र तिवारी 


भारतीय संस्कृति और रसोई को मसालों के बिना बिल्कुल अधूरा माना जाता है। हमारे देश के मसालों की ख्याति केवल वर्तमान समय की बात नहीं है, बल्कि सदियों से पूरी दुनिया भारतीय मसालों की मनमोहक खुशबू और उनके दुर्लभ औषधीय गुणों की दीवानी रही है। हल्दी, धनिया, जीरा, लाल मिर्च और गरम मसाला जैसे तत्व हमारे दैनिक जीवन का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं कि हम इनके बिना किसी भी स्वादिष्ट भोजन की कल्पना तक नहीं कर सकते। लेकिन क्या हो जब इन्ही मसालों की महक में बीमारियों का जानलेवा जहर घुलने लगे। यह बेहद गंभीर सवाल आज हर उस आम नागरिक के मन में उठ रहा है जो बाजार से बंद पैकेट वाले मसालों पर आंख मूंदकर भरोसा करता है। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण ने जो आंकड़े देश के सामने रखे हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि हमारी मौजूदा खाद्य सुरक्षा प्रणाली पर कई गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। मई से जुलाई 2024 के बीच चलाए गए इस विस्तृत अभियान में मसालों के कुल चार हजार चौवन नमूने जांचे गए। इनमें से चार सौ चौहत्तर नमूने गुणवत्ता और सुरक्षा के कड़े मानकों पर पूरी तरह विफल साबित हुए। इसका सीधा अर्थ यह है कि बाजार में बिकने वाला लगभग हर आठवां मसाला हमारी सेहत के लिए पूरी तरह से असुरक्षित है। यह आंकड़ा कोई छोटी मोटी लापरवाही नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी व्यवस्थागत खामी की ओर स्पष्ट इशारा करता है।


खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने अपनी इस महत्वपूर्ण जांच में कई सख्त मापदंडों को शामिल किया था। इसमें मसालों में नमी की मात्रा, कीटों के बचे हुए अवशेष, एफ्लाटॉक्सिन, कीटनाशकों के अंश, खतरनाक रसायनिक दूषित पदार्थों की मौजूदगी और माइक्रोबियल या जीवाणु संबंधी संदूषण जैसे गंभीर पैमानों पर मसालों को गहराई से परखा गया। जब प्रयोगशालाओं से परिणाम सामने आए तो पता चला कि इन मसालों में रसायनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। विशेष रूप से कार्बेंडाजिम नामक फफूंदी नाशक और प्रोपरगाइट जैसे खतरनाक कीटनाशकों के अवशेष कई नमूनों में भारी मात्रा में पाए गए। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यदि इन विषैले रसायनों का लंबे समय तक नियमित रूप से सेवन किया जाए, तो यह इंसान के गुर्दे, लीवर और यहां तक कि उसकी प्रजनन क्षमता पर भी बेहद घातक असर डाल सकते हैं। इसके अलावा कई मसालों के नमूनों में जानलेवा बैक्टीरिया भी मिले हैं। इस तरह के माइक्रोबियल संदूषण से पेट की गंभीर बीमारियां उत्पन्न होती हैं और दीर्घकालिक रूप से इसके प्रभाव को कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों के खतरे से भी जोड़ा गया है। बात सिर्फ अदृश्य रसायनों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि मसालों के कई पैकेटों में कीड़े और कीटों के भौतिक अवशेष भी मौजूद पाए गए। यह भयावह स्थिति सीधे तौर पर प्रसंस्करण और पैकेजिंग के दौरान बरती जा रही घोर लापरवाही और साफ सफाई के पूर्ण अभाव को दर्शाती है।


यह विकट समस्या किसी एक राज्य या किसी एक छोटे इलाके तक बिल्कुल सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के कानपुर, लखनऊ, आगरा से लेकर छत्तीसगढ़ और देश के अन्य कई हिस्सों में राज्य स्तरीय खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभागों ने भी अपने स्तर पर सघन जांच अभियान चलाए। इन क्षेत्रीय छापों और अभियानों के नतीजे भी राष्ट्रीय रिपोर्ट जितने ही निराशाजनक रहे। सबसे हैरानी की बात तो यह रही कि जिन बड़े और प्रतिष्ठित ब्रांड्स पर देश का उपभोक्ता सबसे ज्यादा भरोसा करता है, उनके महंगे उत्पादों में भी फंगीसाइड, हानिकारक बैक्टीरिया और अन्य जहरीले तत्व मौजूद मिले। इस खुलासे ने समाज में फैले उस बड़े भ्रम को तोड़ दिया है कि आकर्षक पैकेजिंग और ऊंचे दामों में बिकने वाला हर उत्पाद शत प्रतिशत शुद्ध ही होगा। मसालों की गुणवत्ता और शुद्धता का यह मुद्दा अब केवल भारत की सीमाओं के भीतर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरी चिंता का विषय बना हुआ है। हांगकांग और सिंगापुर जैसे देशों ने कुछ समय पहले भारत के सबसे बड़े मसाला ब्रांड्स में से कुछ के उत्पादों पर सख्त रोक लगा दी थी। वहां के नियामक अधिकारियों का दावा था कि इन भारतीय मसालों में एथिलीन ऑक्साइड नामक रसायन की मात्रा अधिक पाई गई है। एथिलीन ऑक्साइड का इस्तेमाल मुख्य रूप से मसालों को कीटाणु मुक्त करने के लिए किया जाता है, लेकिन इसके अधिक सेवन से मानव शरीर में कैंसर होने का भारी जोखिम रहता है। हालांकि विदेशी कार्रवाई के बाद जब भारतीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने अपने स्तर पर अट्ठाईस सैंपलों की विशेष जांच की, तो उन्हें एथिलीन ऑक्साइड नहीं मिला और प्राधिकरण ने भारतीय बाजार के मसालों को सुरक्षित घोषित कर दिया, लेकिन वैश्विक स्तर पर उठी इस बहस ने भारतीय उपभोक्ताओं के मन में एक बहुत गहरा संदेह जरूर पैदा कर दिया है।


जब इन तमाम कूटनीतिक और घरेलू जांचों के बाद मसालों की असलियत पूरी तरह से सामने आई, तो नियामक संस्थाओं को मजबूरन अपनी नींद से जागकर सख्त कदम उठाने पड़े। खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने कड़ी कार्रवाई करते हुए देश भर में एक सौ ग्यारह मसाला कंपनियों के लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिए हैं। इन लापरवाह कंपनियों के उत्पादन और बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। राज्य स्तर पर भी विभागों ने कड़ा रुख अपनाया है। कई कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सीधे कानूनी मुकदमे दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। वर्तमान कानून में इस तरह की मिलावट और लापरवाही के लिए छह महीने तक की जेल और भारी जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है। दूसरी ओर जब यह पूरा विवाद मीडिया में चरम पर पहुंचा, तो मसाला बनाने वाली बड़ी कंपनियों ने अपने बचाव में स्पष्टीकरण जारी करने शुरू कर दिए। बड़े ब्रांड्स लगातार बड़े विज्ञापनों और बयानों के माध्यम से उपभोक्ताओं को यह आश्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके उत्पाद पूरी तरह से सुरक्षित हैं। लेकिन आम उपभोक्ता अब केवल मीठे बयानों पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। एक तरफ सरकारी प्रयोगशालाओं की प्रामाणिक रिपोर्ट है जो जहर की पुष्टि कर रही है और दूसरी तरफ मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के खोखले दावे हैं। इस विरोधाभास ने आम नागरिक को भारी असमंजस में डाल दिया है कि वह अपने परिवार को क्या खिलाए।


इस पूरे परिदृश्य का गहराई से विश्लेषण करने पर यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि यह समस्या केवल कुछ चुनिंदा ब्रांड्स की नहीं है, बल्कि मसालों की पूरी आपूर्ति श्रृंखला ही भीतर तक दूषित हो चुकी है। खेतों में फसल उगाने से लेकर कारखाने में उसे पीसने और फिर चमचमाते पैकेट में बंद करके दुकान तक पहुंचाने की लंबी प्रक्रिया में कई स्तरों पर गुणवत्ता नियंत्रण की घोर अनदेखी हो रही है। किसान अपनी पैदावार बढ़ाने और फसल को खराब होने से बचाने के लालच में अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। भंडारण की उचित और वैज्ञानिक व्यवस्था न होने के कारण गोदामों में रखे मसालों में नमी के कारण फफूंद लग जाती है और खतरनाक कीड़े पनपने लगते हैं। इसके बाद जब ये ही सड़े गले मसाले कारखानों में पहुंचते हैं, तो वहां पिसाई और प्रसंस्करण के दौरान साफ सफाई का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की अंधी होड़ में अक्सर घटिया दर्जे का कच्चा माल ही इस्तेमाल किया जाता है। यह सब एक दिन में नहीं हुआ है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक ढिलाई और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का नतीजा है। यह स्थिति न केवल आम जनता के स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की साख को भी भारी नुकसान पहुंचा रही है।


ऐसी अत्यंत गंभीर और चिंताजनक परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि एक आम उपभोक्ता आखिर क्या करे। आज का आधुनिक बाजार पूरी तरह से पिसे हुए और बंद पैकेट वाले मसालों पर निर्भर हो चुका है। ऐसे में हम सभी उपभोक्ताओं को अपने स्तर पर अत्यधिक सतर्कता और जागरूकता बरतने की तत्काल आवश्यकता है। मसालों की खरीदारी करते समय केवल ब्रांड का बड़ा नाम और विज्ञापन देखकर मुग्ध होने के बजाय, पैकेट के पीछे दी गई जरूरी जानकारियों को ध्यान से पढ़ना हमारी आदत होनी चाहिए। निर्माण की तारीख, बैच नंबर और सबसे महत्वपूर्ण FSSAI का प्रामाणिक लाइसेंस नंबर जरूर जाँचना चाहिए। इसके अलावा, उपभोक्ताओं को खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर अखबारों में जारी की जाने वाली रिपोर्ट्स और चेतावनियों पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यदि संभव हो सके, तो पिसे हुए मसालों की जगह सीधे बाजार से खड़े मसालों को खरीदने की पुरानी भारतीय परंपरा की ओर लौटना एक बहुत ही बेहतर और सुरक्षित विकल्प हो सकता है। खड़े मसालों में मिलावट की पहचान करना आंखों से देखकर भी आसान होता है और उन्हें घर पर खुद पीसने से शुद्धता की सौ प्रतिशत गारंटी मिलती है। अंततः सरकार और सभी नियामक संस्थाओं को अपनी निगरानी प्रणाली को कागजों से निकालकर जमीनी स्तर पर और अधिक पारदर्शी बनाना होगा। केवल कुछ कंपनियों के लाइसेंस रद्द कर देना ही इस बीमारी का पूर्ण इलाज नहीं है, बल्कि इस पूरे उद्योग में काम करने के तौर तरीकों में एक व्यापक ढांचागत बदलाव लाने की सख्त जरूरत है। हमारा भोजन हमारे स्वस्थ जीवन का मूल आधार है और इसके साथ किया गया कोई भी समझौता सीधे तौर पर हमारे अस्तित्व पर हमला है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

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