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क्यों पहाड़ों पर ही रह जाते हैं पर्वतारोहियों के शव?

 

क्यों पहाड़ों पर ही रह जाते हैं पर्वतारोहियों के शव?

-महेन्द्र तिवारी 


माउंट एवरेस्ट, जो कि संसार की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है, सदियों से इंसानी साहस और महत्वाकांक्षा का प्रतीक रही है। समुद्र तल से 8848 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस बर्फीले शिखर को छूने का सपना दुनिया भर के अनगिनत साहसी पर्वतारोही देखते हैं। लेकिन इस खूबसूरत चोटी के पीछे एक अत्यंत डरावना और कड़वा सच भी छिपा हुआ है। इस पर्वत पर विजय पाने की कोशिश में अब तक सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, और उनमें से 200 से अधिक पर्वतारोहियों के मृत शरीर आज भी उसी बर्फीली ऊंचाई पर पड़े हुए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आधुनिक विज्ञान और उन्नत तकनीक के इस युग में भी उन शवों को नीचे लाकर उनके परिवारों को सौंपना संभव नहीं हो पाया है। इसके पीछे प्रकृति की अत्यंत क्रूर परिस्थितियां, इंसानी शरीर की जैविक सीमाएं और विज्ञान के कुछ अकाट्य नियम काम कर रहे हैं जो इंसानी ताकत को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं।


एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान सबसे भयानक चुनौती उस समय शुरू होती है जब कोई पर्वतारोही 8000 मीटर की ऊंचाई की अदृश्य सीमा को पार करता है। पर्वतारोहण की दुनिया में इस ऊंचाई से ऊपर के पूरे क्षेत्र को मृत्यु क्षेत्र के नाम से जाना जाता है क्योंकि यहाँ की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल नहीं हैं। इस ऊंचे क्षेत्र में वायुमंडलीय दबाव इतना कम हो जाता है कि हवा में जीवनदायिनी ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल के मुकाबले केवल 33 प्रतिशत रह जाती है। इतनी कम ऑक्सीजन में मानव शरीर की कोशिकाएं धीरे-धीरे मरने लगती हैं और मस्तिष्क तथा फेफड़ों में पानी भरने का जानलेवा खतरा बढ़ जाता है। इस स्थान पर खड़े रहकर सांस लेना भी अपने आप में एक महायुद्ध लड़ने जैसा होता है और कृत्रिम ऑक्सीजन के बिना यहाँ कुछ घंटे भी जीवित रहना असंभव है। ऐसी स्थिति में पर्वतारोहियों का पूरा ध्यान और ऊर्जा केवल अपने आप को जीवित रखने पर केंद्रित होती है। जब इस ऊंचाई पर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसके साथी या मार्गदर्शक चाहकर भी उसके शरीर को हिलाने या साथ ले जाने की स्थिति में नहीं होते हैं, क्योंकि वहाँ दूसरों की मदद करने का प्रयास करना सीधे तौर पर अपनी मौत को आमंत्रण देने जैसा होता है।


इस बर्फीले साम्राज्य में मौत के बाद मानव शरीर की जो भौतिक स्थिति बनती है, वह शवों को नीचे न ला पाने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। एवरेस्ट के ऊपरी हिस्सों में तापमान अक्सर शून्य से 30 डिग्री से लेकर शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे तक चला जाता है। इस अत्यधिक ठंड के कारण मृत्यु के तुरंत बाद मानव शरीर के भीतर का सारा तरल पदार्थ जम जाता है और शरीर पूरी तरह से पत्थर की तरह सख्त हो जाता है। इसके अलावा पर्वतारोहियों के विशेष भारी कपड़े, जूते और अन्य उपकरण भी आसपास की बर्फ और नमी को सोखकर शरीर के साथ ही पूरी तरह से जम जाते हैं। इस प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया के कारण एक सामान्य मानव शरीर का वजन जीवित अवस्था के मुकाबले बढ़कर 100 किलोग्राम से लेकर 150 किलोग्राम तक हो जाता है। इतनी तीव्र ढलान वाली, फिसलन भरी और खतरनाक बर्फीली चट्टानों पर 150 किलोग्राम के एक भारी पत्थर जैसे सख्त शव को खींचना या उठाना पूरी तरह से नामुमकिन कार्य बन जाता है। बर्फ के साथ जुड़ जाने के कारण ये शव पर्वतीय सतह का ही एक हिस्सा बन जाते हैं, जिन्हें वहां से अलग करने के लिए कुल्हाड़ियों से बर्फ को काटना पड़ता है।


एक मृत शरीर को इतनी ऊंचाई और विकट परिस्थितियों से नीचे सुरक्षित लाने के लिए कम से कम 6 से लेकर 10 अत्यंत कुशल, शारीरिक रूप से सुदृढ़ और स्थानीय पहाड़ी गाइडों की आवश्यकता होती है, जिन्हें शेरपा कहा जाता है। जब ये शेरपा मृत्यु क्षेत्र में इतने भारी वजन को उठाने या खींचने का प्रयास करते हैं, तो उनके अपने शरीर की ऊर्जा और कृत्रिम ऑक्सीजन बहुत तेजी से समाप्त होने लगती है। भारी वजन के साथ खड़ी बर्फ पर संतुलन बनाना बेहद कठिन होता है और पैर फिसलने की एक छोटी सी चूक पूरे बचाव दल को हजारों फीट गहरी खाई में गिरा सकती है। पर्वतारोहण के इतिहास में ऐसे कई दुखद उदाहरण दर्ज हैं जहाँ दूसरों के शवों को बचाने या नीचे लाने के प्रयास में रेस्क्यू टीम के सदस्यों ने खुद अपनी अमूल्य जान गंवा दी। इसी वजह से पर्वतारोहण समुदायों में यह कठोर नियम सर्वमान्य माना जाता है कि जीवित लोगों की सुरक्षा हमेशा सर्वोपरि रहेगी और किसी मृत शरीर को वापस लाने के लिए जीवित इंसानों की जान को खतरे में नहीं डाला जा सकता है।


भौगोलिक और शारीरिक चुनौतियों के अलावा, एवरेस्ट से किसी शव को नीचे लाने का अभियान आर्थिक रूप से भी एक बहुत बड़ा वित्तीय बोझ होता है। इस तरह के विशेष और अत्यधिक खतरनाक बचाव कार्यों को आयोजित करने का खर्च 30000 अमेरिकी डॉलर से लेकर 100000 अमेरिकी डॉलर तक हो सकता है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 25 लाख से लेकर 85 लाख रुपये या उससे भी अधिक बैठता है। इतनी भारी धनराशि खर्च करने के बाद भी इस बात की कोई न्यूनतम गारंटी नहीं होती कि शव को सुरक्षित नीचे लाया जा सकेगा। कई बार मौसम अचानक खराब हो जाता है, जिससे पूरा मिशन बीच में ही छोड़ना पड़ता है। इसके साथ ही, एवरेस्ट पर चढ़ने और उतरने के लिए पूरे वर्ष में केवल कुछ ही दिनों का समय मिलता है जिसे मौसम की अनुकूल खिड़की कहा जाता है। यह समय आमतौर पर मई के महीने में केवल कुछ दिनों के लिए आता है। इस बेहद संक्षिप्त समय सीमा में सैकड़ों पर्वतारोही शिखर पर पहुंचने की कतार में होते हैं, और ऐसे में किसी शव को खोजने और लाने के लिए मार्ग को अवरुद्ध करना या समय नष्ट करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता है।


इस बेहद दुखद स्थिति का एक और दार्शनिक और कड़वा पहलू यह है कि समय के साथ ये शव एवरेस्ट के रास्तों के स्थायी निशान या संकेतक बन गए हैं। पर्वत पर चढ़ने वाले नए पर्वतारोही इन शवों को देखकर अपने मार्ग, ऊंचाई और दूरी का अंदाजा लगाते हैं। उदाहरण के लिए, एक प्रसिद्ध शव जिसे हरे जूते वाले पर्वतारोही के नाम से जाना जाता है, वह एक भारतीय पर्वतारोही का माना जाता है, जो 1996 के एक भयानक बर्फीले तूफान में मारे गए थे। इसी तरह एक और शव है, जिसे लोग सोती हुई सुंदरी के नाम से याद करते हैं। ये शव वहाँ आने वाले हर इंसान को प्रकृति की सर्वोच्चता और मानव जीवन की क्षणभंगुरता की लगातार याद दिलाते रहते हैं। कई परिवारों ने भी अंततः इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लिया है और वे चाहते हैं कि उनके प्रियजनों का शव उसी पर्वत की गोद में हमेशा के लिए विश्राम करे। एवरेस्ट का यह डरावना सच हमें यह सिखाता है कि मानव विज्ञान और तकनीक चाहे कितनी भी प्रगति कर ले, लेकिन इस ब्रह्मांड में कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ केवल प्रकृति के क्रूर नियम चलते हैं और वहां इंसान की जिद की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। मौत के बाद भी नीचे न लाए जा सकने वाले ये शव एवरेस्ट के गौरव के साथ जुड़े उस अनंत सन्नाटे को बयां करते हैं जो इंसानी अहंकार को अपनी सीमाओं में रहने की चेतावनी देता रहता है।


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