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क्या शिक्षा सुधार की नई आवाज बनेंगे सोनम वांगचुक?

 

क्या शिक्षा सुधार की नई आवाज बनेंगे सोनम वांगचुक?

-महेन्द्र तिवारी 


सोनम वांगचुक का नाम भारत में केवल एक इंजीनियर, नवोन्मेषक या पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में नहीं जाना जाता, बल्कि ऐसे नागरिक के रूप में भी जाना जाता है जिसने शिक्षा, समाज और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय भूमिका निभाई है। वर्ष 2018 में उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लद्दाख में शिक्षा सुधार के लिए उनके प्रयासों ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई और फिल्म 3 इडियट्स का लोकप्रिय पात्र फुंसुख वांगड़ू भी काफी हद तक उनके व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने लद्दाख के पर्यावरण, स्थानीय संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े कई शांतिपूर्ण आंदोलन किए। अब वे नई दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के माध्यम से देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना रहे हैं। 28 जून 2026 से आरंभ हुआ उनका अनशन अब 21वें दिन में पहुंच चुका है। लगातार केवल नमक और पानी के सहारे चल रहे इस अनशन के कारण उनका वजन लगभग 9 किलोग्राम कम हो चुका है और चिकित्सकों ने उनके स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इसके बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर गंभीर संवाद नहीं होता, तब तक वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।


सोनम वांगचुक का यह आंदोलन किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उन लाखों युवाओं की चिंता से जोड़कर देखा जा रहा है जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में देरी और भर्ती प्रक्रियाओं पर उठते प्रश्नों ने विद्यार्थियों के बीच असुरक्षा और निराशा का वातावरण बनाया है। वांगचुक का कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली पर युवाओं का भरोसा कमजोर होगा तो देश का भविष्य भी प्रभावित होगा। उनका आग्रह है कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो, जवाबदेही सुनिश्चित की जाए और ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनाई जाए जिससे भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। उनका आंदोलन इन्हीं मुद्दों पर व्यापक जनचर्चा की मांग करता है।


अनशन के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। डॉक्टरों की टीम नियमित रूप से उनकी जांच कर रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक भोजन न लेने से शरीर की ऊर्जा तेजी से घटती है और कई अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी चिंता के कारण दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें सरकार से उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया। अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा तथा नियमित चिकित्सकीय निगरानी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। न्यायालय की यह पहल इस तथ्य को रेखांकित करती है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण किसी नागरिक के जीवन की रक्षा करना भी है।


लोकतांत्रिक व्यवस्था में भूख हड़ताल का इतिहास नया नहीं है। महात्मा गांधी ने इसे नैतिक शक्ति और आत्मबल का माध्यम बनाया था। स्वतंत्र भारत में भी अनेक सामाजिक आंदोलनों ने इस पद्धति का उपयोग किया है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर विभिन्न क्षेत्रीय आंदोलनों तक भूख हड़ताल ने समय समय पर सरकारों का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि प्रत्येक आंदोलन की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि अतीत में ऐसे आंदोलनों के क्या परिणाम रहे। प्रत्येक दौर की चुनौतियां भिन्न होती हैं और लोकतंत्र में नए प्रश्नों के लिए नए समाधान खोजने पड़ते हैं।


सोनम वांगचुक के आंदोलन को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। विपक्ष के कई नेताओं ने सरकार से संवाद की अपील की है। कुछ नेताओं ने उनसे स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए अनशन समाप्त करने का आग्रह भी किया है। विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जंतर मंतर पहुंचकर उनसे मिले हैं। दूसरी ओर लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों और अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त करते हुए सरकार और वांगचुक दोनों से संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए यह उचित नहीं होगा कि एक सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता रहे और समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल न हो।


इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ लोगों का मानना है कि मुख्यधारा के मीडिया ने इस आंदोलन को अपेक्षित महत्व नहीं दिया, जबकि अन्य का कहना है कि समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और डिजिटल मंचों पर इसकी पर्याप्त चर्चा हुई है। वस्तुतः लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं बल्कि समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर संतुलित विमर्श प्रस्तुत करना भी है। शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और युवाओं के भविष्य जैसे विषय किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे विषयों पर तथ्यपरक और संतुलित चर्चा ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है।


भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। प्रत्येक वर्ष करोड़ों विद्यार्थी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। इनमें से अनेक विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। यदि परीक्षा प्रणाली पर लगातार प्रश्न उठते हैं तो इसका सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं युवाओं के मनोबल पर पड़ता है। परीक्षा रद्द होने, पेपर लीक होने या भर्ती में देरी जैसी घटनाएं केवल प्रशासनिक समस्याएं नहीं होतीं बल्कि वे युवाओं के विश्वास को भी प्रभावित करती हैं। इसीलिए अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीकी सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और संस्थागत जवाबदेही को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है।


वांगचुक के आंदोलन को लेकर मतभेद भी कम नहीं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यह आंदोलन सीमित दायरे में रहा और इसे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला। कुछ आलोचक इसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास भी करते हैं। वहीं समर्थकों का तर्क है कि किसी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं मापी जा सकती। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब छोटे समूहों द्वारा उठाए गए प्रश्नों ने आगे चलकर बड़े सामाजिक और नीतिगत परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह समर्थन और असहमति दोनों को सम्मानपूर्वक स्थान देता है।


इस संदर्भ में पर्यावरणविद जी डी अग्रवाल का उदाहरण भी कई बार सामने लाया जाता है। उन्होंने गंगा संरक्षण के लिए लंबा अनशन किया था और अंततः उनका निधन हो गया। उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी कई महत्वपूर्ण मांगों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए कुछ लोग आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि कहीं सोनम वांगचुक के मामले में भी ऐसी दुखद स्थिति उत्पन्न न हो। हालांकि प्रत्येक आंदोलन की परिस्थितियां अलग होती हैं और सरकार, न्यायपालिका तथा समाज की भूमिका भी समय के साथ बदलती रहती है। इसलिए ऐसी तुलना करते समय सावधानी आवश्यक है।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। जब किसी सामाजिक कार्यकर्ता की मांगें लाखों युवाओं की चिंताओं से जुड़ने लगें, तब सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत का मार्ग खुला रहना चाहिए। संवाद से ही समाधान निकलते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास मजबूत होता है। दूसरी ओर आंदोलनकारियों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अपने संघर्ष को शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में बनाए रखें। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सोनम वांगचुक लगातार अहिंसक आंदोलन, लोकतांत्रिक संवाद और संस्थागत सुधार की बात करते रहे हैं। उन्होंने आगामी दिनों में संसद मार्च की भी घोषणा की है ताकि शिक्षा सुधार और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूती से उठाया जा सके।


भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इसमें केवल परीक्षा प्रणाली ही नहीं बल्कि शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन प्रणाली, डिजिटल सुरक्षा, भर्ती प्रक्रियाएं, प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही जैसे अनेक आयाम शामिल हैं। किसी एक आंदोलन से इन सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है, लेकिन ऐसे आंदोलन समाज और सरकार का ध्यान उन प्रश्नों की ओर अवश्य आकर्षित करते हैं जिन्हें लंबे समय तक अनदेखा किया जाता रहा हो। यदि इस अवसर का उपयोग व्यापक सुधारों के लिए किया जाए तो इसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को मिल सकता है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे विषय को राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप तक सीमित न रखा जाए। छात्रों का भविष्य, शिक्षा की विश्वसनीयता और संस्थागत सुधार किसी एक दल या विचारधारा का विषय नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रश्न है। सरकार, विपक्ष, शिक्षाविद, विशेषज्ञ, छात्र संगठन और नागरिक समाज यदि मिलकर शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और उत्तरदायी बनाने की दिशा में काम करें तो यह आंदोलन सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह शांतिपूर्ण असहमति को सुनने की क्षमता रखे और जनभावनाओं को नीति निर्माण की प्रक्रिया से जोड़े।


सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य इस समय सबसे बड़ी चिंता है। किसी भी लोकतंत्र में किसी नागरिक का जीवन सर्वोपरि होता है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि जिन प्रश्नों को लेकर वे संघर्ष कर रहे हैं, उन पर गंभीरता से विचार किया जाए। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता बल्कि इस बात से भी मजबूत होता है कि वह अपने नागरिकों की आवाज, युवाओं की आकांक्षाओं और सुधार की मांगों का किस प्रकार उत्तर देता है। यदि इस आंदोलन के परिणामस्वरूप शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वास को मजबूत करने की दिशा में सार्थक संवाद प्रारंभ होता है, तो यह केवल एक भूख हड़ताल नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में याद किया जाएगा।

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