क्या गाय को 'राष्ट्रीय पशु' घोषित करने में कोई समस्या है ?
-महेन्द्र तिवारी
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है। भारतीय समाज में सदियों से गाय को माता का दर्जा दिया जाता रहा है। अनेक धार्मिक ग्रंथों, लोक परंपराओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय का विशेष महत्व रहा है। यही कारण है कि समय समय पर गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठती रही है। कई धार्मिक संगठनों, सामाजिक समूहों और कुछ राजनीतिक दलों ने यह मांग सार्वजनिक रूप से रखी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की आवश्यकता पर टिप्पणी की थी। इसके बावजूद भारत सरकार ने अब तक ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। इसके पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं बल्कि सामाजिक, संवैधानिक, आर्थिक और प्रशासनिक जटिलताएँ भी हैं।
भारत का वर्तमान राष्ट्रीय पशु बंगाल टाइगर है। इसे 1973 में शुरू किए गए प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत संरक्षण का प्रतीक बनाया गया था। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार देश में बाघ संरक्षण के लिए विशेष कानूनी और पर्यावरणीय ढांचा तैयार किया गया। आज भारत विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाघों का घर माना जाता है और देश में 50 से अधिक टाइगर रिजर्व स्थापित किए जा चुके हैं। राष्ट्रीय पशु के रूप में बाघ केवल शक्ति और साहस का प्रतीक नहीं है बल्कि वह भारत की जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण नीति का केंद्र भी है। ऐसे में गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने का प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नीतिगत बहस का विषय बन जाता है।
भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अनेक आदिवासी समुदाय रहते हैं। हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है, लेकिन सभी समुदायों की मान्यताएँ समान नहीं हैं। पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों, केरल और गोवा जैसे क्षेत्रों में गोमांस भोजन का हिस्सा रहा है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अपनी संस्कृति और भोजन की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है तो कई लोग इसे एक धर्म विशेष की मान्यताओं को सरकारी पहचान देने के रूप में देख सकते हैं। आलोचकों का तर्क है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी धार्मिक प्रतीक को राष्ट्रीय पहचान बनाना संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 48 के अंतर्गत राज्यों को गोवंश संरक्षण और नस्ल सुधार के लिए प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। देश के अधिकांश राज्यों में गोहत्या पर किसी न किसी रूप में प्रतिबंध पहले से मौजूद है। केंद्र सरकार का पशुपालन और डेयरी विभाग भी गोवंश संरक्षण और पशुधन विकास के लिए कई योजनाएँ चला रहा है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाओं का उद्देश्य देशी नस्लों का संरक्षण और दुग्ध उत्पादन बढ़ाना है। इससे स्पष्ट होता है कि गाय को पहले से ही विशेष सरकारी संरक्षण प्राप्त है। इसलिए समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय पशु का दर्जा केवल उस सम्मान को औपचारिक रूप देने जैसा होगा जो भारतीय समाज में गाय को पहले से प्राप्त है।
लेकिन वास्तविक समस्या केवल सम्मान तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक राज्यों में आवारा पशुओं की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में किसान खुले घूमते पशुओं से परेशान हैं। जब गाय दूध देना बंद कर देती है या बूढ़ी हो जाती है तो गरीब किसान उसका पालन जारी नहीं रख पाते। परिणामस्वरूप उन्हें सड़कों या खेतों में छोड़ दिया जाता है। ये पशु किसानों की फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं और सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। अनेक ग्रामीण इलाकों में रात भर खेतों की रखवाली करना किसानों की मजबूरी बन गया है। यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है और कानून और कठोर हो जाते हैं तो यह संकट और बढ़ सकता है, क्योंकि पशुओं के पुनर्वास के लिए पर्याप्त गौशालाएँ और संसाधन अभी उपलब्ध नहीं हैं।
भारत की कृषि व्यवस्था अभी भी छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है। अधिकांश किसान सीमित आय और बढ़ती लागत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। एक बूढ़ी या अनुत्पादक गाय का पालन करना उनके लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाता है। चारा, दवा और देखभाल पर लगातार खर्च होता है जबकि उससे कोई आय नहीं होती। यदि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है तो संभव है कि पशुधन प्रबंधन से जुड़े नियम और कड़े हो जाएँ। इससे किसानों की आर्थिक कठिनाइयाँ और बढ़ सकती हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े निर्णय से पहले पशु आश्रय, चारे की व्यवस्था और किसानों के लिए आर्थिक सहायता की मजबूत नीति आवश्यक है।
गाय से जुड़ा एक बड़ा आर्थिक पक्ष चमड़ा और मांस उद्योग भी है। भारत दुनिया के प्रमुख चमड़ा उत्पादक देशों में शामिल रहा है। इस उद्योग से लाखों लोगों का रोजगार जुड़ा है। इनमें बड़ी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समुदाय शामिल हैं। भारत में मांस निर्यात का बड़ा हिस्सा भैंस के मांस से जुड़ा होता है, लेकिन कठोर सामाजिक माहौल का प्रभाव पूरे उद्योग पर पड़ता है। यदि राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलने के बाद कानून और सामाजिक दबाव बढ़ते हैं तो रोजगार और व्यापार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए आर्थिक विशेषज्ञ इस विषय को केवल धार्मिक दृष्टि से देखने के बजाय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी देखते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में गाय के नाम पर हिंसा और भीड़ द्वारा हमले की घटनाएँ भी सामने आई हैं। कई मामलों में गौ रक्षा के नाम पर लोगों को पीटा गया, अपमानित किया गया या उनकी हत्या तक कर दी गई। ऐसे मामलों ने देश की कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यदि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाता है तो कुछ कट्टर समूह इसे अपने सामाजिक अधिकार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे प्रशासन और पुलिस के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं। कानून का शासन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है और किसी भी प्रतीकात्मक निर्णय का मूल्यांकन इसी आधार पर किया जाना चाहिए।
वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से भी यह बहस महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय पशु का दर्जा सामान्यतः उन जीवों को दिया जाता है जिनके संरक्षण की विशेष आवश्यकता होती है। बंगाल टाइगर संकटग्रस्त वन्यजीवों में शामिल रहा है और उसके संरक्षण के लिए विशेष अभियान चलाए गए। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत किया गया था। इसके विपरीत गाय एक पालतू पशु है जिसकी संख्या करोड़ों में है। इसलिए कुछ पर्यावरणविद मानते हैं कि राष्ट्रीय पशु का दर्जा वन्यजीव संरक्षण की भावना से जुड़ा होना चाहिए, न कि पालतू पशुओं से।
गाय भारतीय समाज में श्रद्धा, सेवा और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह भी सच है कि भारतीय कृषि और डेयरी व्यवस्था में उसका योगदान ऐतिहासिक रहा है। लेकिन किसी पशु को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना केवल भावनात्मक निर्णय नहीं होता। उसके पीछे संवैधानिक संतुलन, सामाजिक विविधता, आर्थिक प्रभाव, प्रशासनिक क्षमता और पर्यावरणीय दृष्टिकोण जैसे अनेक पहलुओं पर विचार करना पड़ता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में किसी भी राष्ट्रीय निर्णय का प्रभाव करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की बहस केवल आस्था की बहस नहीं बल्कि भारत की लोकतांत्रिक और सामाजिक संरचना की परीक्षा भी है।
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