क्या भारत बूढ़ा होने की ओर बढ़ रहा है?
-महेन्द्र तिवारी
भारत को लंबे समय से वैश्विक पटल पर एक ऊर्जावान और सबसे युवा आबादी वाले देश के रूप में देखा जाता रहा है। यही वह मुख्य कारण है जिसके आधार पर पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और विचारकों ने भारत को भविष्य की एक अनिवार्य आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्वीकार किया। देश की इस विशाल युवा आबादी को उसकी सबसे बड़ी पूंजी और सामर्थ्य माना गया क्योंकि समाज का युवा वर्ग ही उत्पादन, नए विचारों, नवाचार, श्रम शक्ति और उपभोग का सबसे बड़ा केंद्र होता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तभी गति पकड़ती है जब उसमें उपभोग करने वाले और उत्पादन करने वाले दोनों ही स्तरों पर युवाओं की सक्रिय भागीदारी हो। लेकिन हाल के समय में इस उत्साह के बीच एक नई और अत्यंत गंभीर चिंता उभरकर सामने आने लगी है। यह चिंता जनसंख्या विस्फोट या आबादी बढ़ने की नहीं है, बल्कि जनसंख्या के भीतर बदलती आयु संरचना की है। यदि आने वाले वर्षों में देश की युवा आबादी का अनुपात लगातार घटता गया और बुजुर्गों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से तेजी से वृद्धि होती रही, तो भारत को भी निकट भविष्य में उन अभूतपूर्व समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है जिनसे आज जापान, दक्षिण कोरिया और कई विकसित यूरोपीय देश अत्यंत तीव्रता से जूझ रहे हैं।
वर्तमान में उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के सांख्यिकीय आंकड़े इसी ओर संकेत कर रहे हैं कि भारत के जनसांख्यिकीय ढांचे में एक मौन परंतु बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा है। देश की कुल प्रजनन दर अब 2.1 के उस प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे पहुंच चुकी है जिसे किसी भी समाज की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए अनिवार्य मानक माना जाता है। वर्ष 2025 के नवीनतम प्रतिवेदनों और आंकड़ों के अनुसार भारत की राष्ट्रीय प्रजनन दर लगभग 1.9 दर्ज की गई है, जबकि वर्ष 2014 में यही दर 2.3 के स्तर पर थी। इस सांख्यिकीय गिरावट का सीधा और स्पष्ट अर्थ यह है कि अब औसतन प्रत्येक महिला उतने बच्चों को जन्म नहीं दे रही है जितने अगली पीढ़ी में जनसंख्या के संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। यह स्थिति केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर और भी अधिक असमान और चिंताजनक है। देश की राजधानी दिल्ली जैसे अत्यधिक शहरीकृत और विकसित क्षेत्रों में यह प्रजनन दर गिरकर मात्र 1.2 के स्तर तक पहुंच चुकी है जो कि अत्यंत न्यून है। अब भारत में केवल कुछ ही राज्य ऐसे बचे हैं जहां प्रजनन दर अभी भी 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बनी हुई है, अन्यथा अधिकांश राज्यों में जन्मदर में भारी कमी देखी जा रही है।
वर्तमान समय में भारत की कुल आबादी लगभग 146 करोड़ के आसपास आंकी जा रही है और राहत की बात यह है कि देश के पास अभी भी एक बहुत बड़ी कार्यशील आयु वाली जनसंख्या मौजूद है। एक अनुमान के अनुसार भारत की लगभग 68 प्रतिशत आबादी 15 से 64 वर्ष के आयु वर्ग के भीतर आती है। जनसांख्यिकी विज्ञान के अनुसार यही वह मुख्य आयु वर्ग होता है जो देश की आर्थिक गतिविधियों को संचालित करता है, कर चुकाता है और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को तीव्र गति प्रदान करता है। लेकिन इस उत्साहजनक आंकड़े के समानांतर ही एक दूसरा सच यह भी है कि देश में 65 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग लोगों की संख्या भी लगातार और बहुत तेजी से बढ़ रही है। देश में बेहतर हुई स्वास्थ्य सुविधाओं, व्यापक टीकाकरण अभियानों, आधुनिक चिकित्सा तकनीक के प्रसार और आम लोगों के जीवन स्तर में हुए क्रमिक सुधार के कारण नागरिकों की औसत आयु पहले की तुलना में काफी अधिक हो गई है। अतीत में जहां एक बड़ी आबादी उचित इलाज न मिलने या संक्रामक बीमारियों के कारण कम उम्र में ही मृत्यु का ग्रास बन जाती थी, वहीं अब चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के कारण लोग अधिक समय तक और दीर्घायु जीवन जी रहे हैं।
पहली दृष्टि में देखने पर जीवन प्रत्याशा में यह सुधार और बुजुर्गों की बढ़ती आयु अत्यंत सकारात्मक और स्वागत योग्य स्थिति प्रतीत होती है क्योंकि लंबा और स्वस्थ जीवन किसी भी सभ्य समाज और कल्याणकारी राज्य की प्रगति का सबसे बड़ा सूचकांक माना जाता है। परंतु जब देश में जन्मदर में लगातार और तीव्र गिरावट होने लगे और उसके साथ ही बुजुर्ग आबादी का अनुपात निरंतर बढ़ता जाए, तब राज्य और समाज पर अप्रत्याशित आर्थिक एवं सामाजिक दबाव बढ़ने लगते हैं। आने वाले भविष्य में देश के भीतर वास्तविक रूप से कार्य करने वाले और श्रम बल में योगदान देने वाले लोगों की संख्या आनुपातिक रूप से कम होती जाएगी, जबकि दूसरी ओर सेवानिवृत्ति वेतन, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर पूरी तरह आश्रित रहने वाले बुजुर्ग लोगों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। इस जनसांख्यिकीय असंतुलन का सीधा और सबसे गहरा प्रभाव सरकार के राजकोषीय खर्च, राजस्व संग्रह और संपूर्ण देश की आर्थिक विकास दर पर पड़ेगा।
भारत वर्तमान समय में वैश्विक मंचों पर जिस जनसांख्यिकीय लाभांश की बात अत्यंत गर्व के साथ करता है, वह कोई स्थायी वरदान नहीं है और न ही यह हमेशा के लिए रहने वाला है। यदि देश की इस वर्तमान युवा आबादी को समय रहते गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल प्रशिक्षण और उनकी योग्यता के अनुसार पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कराए गए, तो यही लाभांश भविष्य में देश के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और सामाजिक बोझ बन सकता है। देश में बेरोजगारी की समस्या पहले से ही एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में विद्यमान है। यदि आने वाले दशकों में देश का कम संख्या वाला युवा कार्यबल अपने से कई गुना अधिक बुजुर्ग आबादी का आर्थिक भार उठाने के लिए मजबूर होगा, तो इससे न केवल युवाओं पर करों का बोझ बढ़ेगा बल्कि देश के आर्थिक विकास की गति भी अत्यंत धीमी पड़ जाएगी। कार्यशील लोगों की कमी के कारण उद्योगों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है और नए विचारों के क्रियान्वयन की गति मंद हो सकती है।
आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ देश की संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी बुजुर्ग आबादी के इस बढ़ते बोझ का बेहद गंभीर और दूरगामी असर पड़ेगा। जैसे-जैसे समाज में वृद्ध लोगों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे आयु से संबंधित बीमारियां जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कर्क रोग, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार और विस्मृति जैसी समस्याएं अत्यंत तीव्र गति से बढ़ेंगी। इन बीमारियों के प्रबंधन और उपचार के लिए देश को बहुत बड़े स्तर पर विशेषीकृत चिकित्सालयों, वृद्धावस्था देखभाल केंद्रों, इस कार्य के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और एक मजबूत सामाजिक सहायता तंत्र की आवश्यकता होगी। भारत की वर्तमान स्वास्थ्य अवसंरचना को यदि देखा जाए, तो वह अभी भी विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में उतनी मजबूत और पर्याप्त नहीं है जितनी होनी चाहिए। यदि हमने आज से ही इस जनसांख्यिकीय बदलाव को भांपकर अपनी चिकित्सा प्रणालियों में सुधार और व्यापक तैयारियां शुरू नहीं कीं, तो भविष्य में देश के सामने एक अत्यंत गहरा स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो सकता है।
सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन के बहुत गहरे और संवेदनशील प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले हैं। सदियों पुरानी पारंपरिक भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था समकालीन समय में बहुत तेजी से बदल रही है और उसका स्थान अब एकल या छोटे परिवारों ने ले लिया है। आजीविका और बेहतर जीवन की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों की ओर होने वाला पलायन भी निरंतर बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में महानगरों और शहरों में बुजुर्गों के अकेले पड़ जाने की पारिवारिक समस्या अत्यंत विकराल रूप धारण कर सकती है। आने वाले समय में देश के भीतर ऐसे लाखों बुजुर्ग हो सकते हैं जिनकी दैनिक देखभाल करने वाला या भावनात्मक संबल देने वाला परिवार में कोई सदस्य उपलब्ध न हो। इस पारिवारिक अलगाव के कारण बुजुर्गों में मानसिक तनाव, अकेलापन, अवсад और सामाजिक अलगाव जैसी गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्याएं बहुत बड़े पैमाने पर पैदा होंगी, जो किसी भी संवेदनशील समाज के लिए एक अत्यंत चिंताजनक पहलू है।
इन परिस्थितियों में भारत के नीति निर्माताओं के समक्ष सबसे बड़ी और तात्कालिक चुनौती यही होगी कि वे अपनी वर्तमान युवा आबादी को सही समय पर एक कुशल आर्थिक शक्ति में परिवर्तित कर सकें। इसके लिए केवल जनसंख्या का आकार बड़ा होना या आंकड़ों में युवाओं की संख्या अधिक होना मात्र पर्याप्त नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य आवश्यकता यह है कि देश का प्रत्येक युवा उच्च शिक्षित, तकनीकी रूप से कुशल और शारीरिक व मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हो। इसके अतिरिक्त देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी को बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक और निर्णायक कदम होगा क्योंकि दुनिया के जिन देशों में जन्मदर कम हुई है, वहां महिलाओं की सक्रिय आर्थिक भागीदारी ने ही अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस रणनीति के समानांतर भारत को आज से ही अपने बुजुर्ग नागरिकों के सम्मानजनक जीवन के लिए दीर्घकालिक और ठोस राष्ट्रीय नीतियां तैयार करनी होंगी। देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली, सेवानिवृत्ति भत्ता व्यवस्था, सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा और वृद्ध कल्याण सेवाओं को कानूनी और व्यावहारिक रूप से अत्यंत मजबूत करना होगा। यदि हमारा देश समय रहते और दूरदर्शिता के साथ अभी से इन सभी मोर्चों पर तैयारी शुरू करता है, तो भविष्य में बढ़ती हुई बुजुर्ग आबादी को देश के लिए संकट मानने के बजाय उनके विशाल अनुभव, कार्यकुशलता और ज्ञान की सकारात्मक सामाजिक शक्ति के रूप में बदला जा सकता है। इसके विपरीत यदि इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन और आसन्न संकट को नजरअंदाज किया गया या इसके प्रति उदासीनता बरती गई, तो आने वाले कुछ ही दशकों में भारत के भीतर तीव्र आर्थिक दबाव, गहरा स्वास्थ्य संकट और गंभीर सामाजिक असंतुलन अत्यंत भयावह रूप ले सकते हैं। भारत आज भले ही दुनिया की सबसे युवा शक्तियों में अग्रगण्य है, परंतु यह स्थिति स्थायी नहीं है। आने वाले 20 से 30 वर्ष की यह अवधि ही यह पूरी तरह तय करेगी कि भारत अपनी इस विशाल जनसंख्या को एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में बदलता है या चुनौती में। जनसंख्या केवल आंकड़ों का खेल नहीं होती, बल्कि वह किसी भी राष्ट्र के भविष्य की वास्तविक दिशा और दशा को निर्धारित करती है। इसलिए आज के सही नीतिगत निर्णय और दूरदर्शी संकल्प ही भारत के आने वाले कल को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं।
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