Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान के नियंत्रण से फिसल रहा है?

 

क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान के नियंत्रण से फिसल रहा है?

-महेन्द्र तिवारी 


पाकिस्तान का सबसे बड़ा और संसाधन संपन्न प्रांत बलूचिस्तान एक बार फिर गहरी अशांति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। पिछले कुछ समय में इस क्षेत्र से छनकर आ रही खबरें, विद्रोही गुटों के दावे और पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की प्रतिक्रियाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि यह विवाद अब एक नए और अधिक हिंसक चरण में प्रवेश कर चुका है। बलूच राष्ट्रवादियों द्वारा पाकिस्तानी सैन्य चौकियों पर हमलों के दावे और इसके जवाब में सेना के व्यापक अभियानों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को बेहद नाजुक बना दिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस आधुनिक युग में दोनों पक्षों की ओर से सूचना और दुष्प्रचार का जो युद्ध लड़ा जा रहा है, उसने जमीनी हकीकत को समझना और भी चुनौतीपूर्ण कर दिया है। हालांकि यह विवाद केवल हालिया सैन्य झड़पों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें दशकों पुराने राजनीतिक असंतोष, आर्थिक वंचना और पहचान के संकट में गहराई तक समाहित हैं जो अब एक नासूर का रूप ले चुकी हैं।


पाकिस्तान के निर्माण के समय से ही बलूचिस्तान का प्रश्न इस्लामाबाद के लिए गले की हड्डी बना रहा है। बलूच लोगों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि वर्ष उन्नीस सौ सैंतालीस में उनके तत्कालीन राज्य कलात का पाकिस्तान में विलय उनकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध किया गया था। इसी ऐतिहासिक असंतोष ने समय के साथ एक मजबूत राष्ट्रवादी आंदोलन को जन्म दिया, जो हर गुजरते दशक के साथ अधिक उग्र और हिंसक होता गया। बलूच राष्ट्रवादियों की सबसे मुख्य शिकायत यह है कि उनके क्षेत्र को पाकिस्तान द्वारा केवल एक आर्थिक उपनिवेश के रूप में देखा जाता है। बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, तांबे, सोने और अन्य बहुमूल्य खनिजों का अथाह भंडार है। इसके बावजूद इन विशाल संसाधनों से प्राप्त होने वाले राजस्व का एक बहुत ही नगण्य हिस्सा स्थानीय विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है। स्थानीय निवासियों को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से योजनाबद्ध तरीके से वंचित रखा गया है, जबकि इस्लामाबाद और पंजाब प्रांत के अभिजात्य वर्ग इन संसाधनों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। यह घोर आर्थिक असमानता उस गुस्से को और भड़काती है जो अंततः आम युवाओं को मुख्यधारा से काटकर विद्रोही गुटों की ओर धकेलता है।


हाल के वर्षों में बलूच लिबरेशन आर्मी जैसे कई विद्रोही संगठनों ने अपनी रणनीतिक क्षमता और मारक शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि की है। पहले जहां ये हमले केवल छिटपुट और प्रतीकात्मक होते थे, वहीं अब ये बेहद सुनियोजित और बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं। वर्तमान विद्रोह की एक और विशेष बात यह है कि इसकी कमान अब केवल पारंपरिक कबीलाई सरदारों के हाथों में नहीं रही है, बल्कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले शिक्षित मध्यवर्गीय युवा और यहां तक कि महिलाएं भी इसमें सक्रिय रूप से शामिल हो रही हैं। सैन्य ठिकानों, पुलिस चौकियों और संचार तथा यातायात के महत्वपूर्ण ढांचों पर होने वाले निरंतर हमले यह दर्शाते हैं कि विद्रोही अब सीधे तौर पर पाकिस्तानी राज्य की सत्ता और संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं। विद्रोही गुटों का दावा है कि उन्हें आम जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त है और वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना और सरकार का रुख हमेशा की तरह बेहद कड़ा है। वे इन विद्रोहियों को केवल राज्य के दुश्मन और विदेशी ताकतों के मोहरे के रूप में चित्रित करते हैं और सैन्य बल के निर्दयी प्रयोग को ही एकमात्र समाधान मानते हैं। लेकिन बार बार होने वाले व्यापक सैन्य अभियानों के बावजूद समस्या का कोई स्थायी हल न निकल पाना यह साबित करता है कि ताकत के बल पर किसी भी जन आंदोलन को हमेशा के लिए नहीं कुचला जा सकता।


इस संघर्ष का एक बेहद चिंताजनक पहलू मानवाधिकारों का निरंतर और घोर उल्लंघन है। स्थानीय और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल बलूचिस्तान में व्यापक स्तर पर दमन चक्र चला रहे हैं। हजारों की संख्या में बलूच युवाओं, छात्रों, वकीलों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सुरक्षा एजेंसियों द्वारा कथित तौर पर जबरन गायब कर दिया गया है। इन लापता लोगों के परिवार वाले सालों से न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं और अदालतों से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन व्यवस्था उनकी पुकार सुनने को तैयार नहीं है। राज्य द्वारा की जा रही इस ज्यादती ने बलूच समाज में पाकिस्तान की केंद्र सरकार के प्रति अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि उसे पाटना अब लगभग असंभव प्रतीत होता है। हर नई गुमशुदगी और हर नई क्रूर सैन्य कार्रवाई विद्रोह की आग में घी डालने का काम करती है और राज्य के खिलाफ घृणा को और गहरा करती है।


बलूचिस्तान का यह गंभीर मुद्दा अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसके गहरे भू राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ भी हैं। चीन और पाकिस्तान के बीच बन रहे आर्थिक गलियारे ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है। ग्वादर बंदरगाह, जो अरब सागर के ठीक मुहाने पर स्थित है, चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल का एक प्रमुख और निर्णायक केंद्र है। चीन ने बलूचिस्तान में अरबों डॉलर का भारी निवेश किया है। लेकिन स्थानीय बलूच लोगों का दृढ़ता से यह मानना है कि इस तथाकथित विकास से उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है, बल्कि यह भविष्य में जनसांख्यिकीय बदलाव लाने और उनके प्राकृतिक संसाधनों को पूरी तरह से लूटने की एक नई साजिश है। यही कारण है कि विद्रोही गुट अक्सर चीनी इंजीनियरों, श्रमिकों और इस आर्थिक गलियारे से जुड़ी अहम परियोजनाओं को अपना निशाना बनाते हैं। इन हमलों के कारण पाकिस्तान सरकार पर चीन की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का भारी और निरंतर दबाव रहता है।


वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ लगने वाली डूरंड रेखा का पुराना विवाद इस पूरी क्षेत्रीय स्थिति को और भी अधिक जटिल बना देता है। अफगानिस्तान के साथ लगती यह लंबी और अस्थिर सीमा केवल एक लकीर नहीं है, बल्कि इसके दोनों ओर रहने वाले पश्तून और बलूच समुदायों के गहरे सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध हैं। इस खुली और दुर्गम सीमा के कारण हथियारों और विद्रोहियों की आवाजाही को पूरी तरह से रोकना पाकिस्तानी सेना के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। जब बलूच राष्ट्रवादी सीमांत क्षेत्रों में अपना नियंत्रण स्थापित करने का दावा करते हैं, तो यह सीधे तौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है और अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और अधिक गहरा कर देता है।


वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि बलूचिस्तान की गहरी और बहुआयामी समस्या का समाधान केवल बंदूकों, सैन्य बूटों की थाप या बल प्रयोग में बिल्कुल नहीं तलाशा जा सकता। विश्व का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन क्षेत्रों में पहचान, संसाधन और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न लंबे समय तक अनसुलझे रहते हैं, वहां राज्य को हमेशा अस्थिरता का सामना करना पड़ता है। जब तक वहां के लोगों की जायज राजनीतिक और आर्थिक शिकायतों का ईमानदारी से निवारण नहीं किया जाता, तब तक कोई भी शांति बाहर से थोपी नहीं जा सकती। पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि बलूच लोगों को उनके ही घर में बेगाना और हाशिए पर रखकर एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता।


इस संकट के समाधान के लिए राज्य को अपनी सदियों पुरानी सैन्य और दमनकारी मानसिकता से बाहर आना होगा और एक सार्थक तथा पारदर्शी राजनीतिक संवाद की तत्काल शुरुआत करनी होगी। प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के प्रथम अधिकार को संवैधानिक मान्यता देना, विकास परियोजनाओं में उनकी सीधी और सम्मानजनक भागीदारी सुनिश्चित करना और सबसे महत्वपूर्ण बात, मानवाधिकारों के व्यापक उल्लंघन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर सभी लापता लोगों को निष्पक्ष न्याय दिलाना ही वह एकमात्र लोकतांत्रिक रास्ता है जो बलूचिस्तान में वास्तविक और स्थायी शांति ला सकता है। यदि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने समय रहते अपनी नीतियां नहीं बदलीं और संवाद का मार्ग नहीं अपनाया, तो बलूचिस्तान का यह रिसता हुआ नासूर आने वाले समय में पाकिस्तान के पूरे अस्तित्व, उसकी अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सबसे घातक और विनाशकारी खतरा बन सकता है।

 3 Attachments  •  Scanned by Gmail

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ