किसान दिवस: स्मरण नहीं, आत्ममंथन का दिन
- महेन्द्र तिवारी
भारत की आत्मा गाँवों में बसती है—यह कथन वर्षों से दोहराया जाता रहा है, किंतु व्यवहार में गाँव और किसान अक्सर नीति-निर्माण की हाशिये पर रहे हैं। कृषि आज भी देश की बड़ी आबादी का जीवनाधार है, परंतु यह भी उतना ही सच है कि यही क्षेत्र सबसे अधिक असुरक्षा, अनिश्चितता और संकट से घिरा हुआ है। ऐसे परिदृश्य में किसान दिवस हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है, क्या हमने उस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को निभाया है, जो अन्नदाता के प्रति हमारी है?
23 दिसंबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय किसान दिवस केवल एक तिथि या औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के उस मूल प्रश्न की याद दिलाता है कि क्या देश का अन्नदाता आज भी वही सम्मान और सुरक्षा पा रहा है, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता के समय की गई थी। यह दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती से जुड़ा है, एक ऐसे नेता की स्मृति से, जिन्होंने राजनीति को सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग की आवाज़ बनाने का माध्यम समझा। किसान दिवस दरअसल उस विचारधारा का प्रतीक है, जिसमें खेत, किसान और गाँव को राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय धुरी माना गया।
चौधरी चरण सिंह का जीवन और राजनीति इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास थी। किसान परिवार में जन्मे चरण सिंह ने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को नीतिगत बहस का विषय बनाया। उनके लिए किसान कोई भावनात्मक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक इकाई था। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज़ादी के बाद के भारत तक, वे लगातार इस बात पर बल देते रहे कि यदि कृषि और ग्रामीण समाज को मजबूत नहीं किया गया, तो देश की प्रगति खोखली रह जाएगी। यही कारण है कि वे औद्योगीकरण के विरोधी नहीं थे, परंतु कृषि की कीमत पर होने वाले विकास के सख्त आलोचक थे।
उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कृषि-केंद्रित सोच तक, चौधरी चरण सिंह ने यह स्पष्ट किया कि जो खेत जोतता है, उसी का उस पर अधिकार होना चाहिए। यह विचार केवल भूमि स्वामित्व का नहीं, बल्कि किसान के आत्मसम्मान का प्रश्न था। उन्होंने राजनीति में रहते हुए बार-बार चेताया कि यदि किसान को केवल उत्पादन का साधन बनाकर देखा गया, तो सामाजिक असंतोष और आर्थिक असमानता गहराती जाएगी। दुर्भाग्य से, समय ने उनके इस भय को कई बार सच साबित किया है।
आज जब हम किसान दिवस मनाते हैं, तो सामने एक जटिल यथार्थ खड़ा है। जलवायु परिवर्तन ने खेती को अनिश्चित बना दिया है, लागत लगातार बढ़ रही है, ज़मीन का विखंडन हो रहा है और बाज़ार में किसान की सौदेबाज़ी की शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है। न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल बीमा, सिंचाई और कर्ज़ जैसे मुद्दे केवल तकनीकी या आर्थिक प्रश्न नहीं हैं, बल्कि किसान के जीवन और भविष्य से सीधे जुड़े हुए हैं। इन परिस्थितियों में किसान दिवस को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित रखना, उसके वास्तविक अर्थ को कमज़ोर कर देता है।
चौधरी चरण सिंह का आग्रह था कि किसान को नीति-निर्माण की प्रक्रिया का सहभागी बनाया जाए। यह सोच आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आधुनिक तकनीक, डिजिटल खेती, कृषि नवाचार और वैश्विक बाज़ार की बातें तभी सार्थक होंगी, जब किसान को इनके केंद्र में रखा जाएगा। यदि नीतियाँ कागज़ पर तो प्रगतिशील हों, पर ज़मीन पर किसान असुरक्षित रहे, तो वह विकास टिकाऊ नहीं हो सकता।
किसान दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि लोकतंत्र की मजबूती का आकलन सबसे कमजोर नागरिक की स्थिति से किया जाना चाहिए। किसान केवल अन्न पैदा नहीं करता, वह सामाजिक संतुलन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखता है। फिर भी, उसकी आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा आज भी गंभीर सवालों के घेरे में है। यह विडंबना ही है कि जो वर्ग देश को भूख से बचाता है, वही स्वयं सबसे अधिक आर्थिक चिंता में जीता है।
चौधरी चरण सिंह की विरासत सत्ता में बिताए गए दिनों से अधिक, उनके विचारों में जीवित है। सादगी, स्पष्टवादिता और नैतिक दृढ़ता उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने कभी लोकप्रियता के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। किसान के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए राजनीतिक रणनीति नहीं, नैतिक कर्तव्य था। आज जब राजनीति में तात्कालिक लाभ और आंकड़ों का बोलबाला है, तब चरण सिंह की विचारधारा एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह सामने आती है।
राष्ट्रीय किसान दिवस का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब यह दिन केवल कार्यक्रमों और भाषणों तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस नीतिगत प्रतिबद्धताओं का आधार बने। यह दिन सरकार और समाज दोनों को यह याद दिलाने के लिए है कि किसान को दया नहीं, न्याय चाहिए; सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए; और वादों से अधिक, भरोसेमंद क्रियान्वयन चाहिए।
अंततः किसान दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम उस भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जिसकी कल्पना चौधरी चरण सिंह ने की थी—जहाँ किसान आत्मनिर्भर हो, गाँव सशक्त हों और विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन भी हो। यदि इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोजा जाए, तो किसान दिवस एक स्मृति नहीं, बल्कि एक संकल्प बन सकता है। और शायद यही चौधरी चरण सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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