खरमास: शुभ-अशुभ से परे एक जीवन-दर्शन
- महेन्द्र तिवारी
हिंदू पंचांग में खरमास को लेकर समाज में जो धारणा व्याप्त है, वह केवल एक धार्मिक निषेध तक सीमित नहीं है, बल्कि समय, गति, आस्था और मानव जीवन की लय को समझने का एक सांस्कृतिक प्रयास भी है। आम तौर पर खरमास को वह अवधि माना जाता है जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करता है और इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस निषेध के पीछे जो कथाएँ और तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, वे पौराणिक, खगोलीय और सामाजिक चेतना के सम्मिलन से जन्मे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि खरमास को अंधविश्वास या केवल कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा की एक गहन प्रतीकात्मक सोच के रूप में देखा जाए।
खरमास की सबसे प्रचलित कथा सूर्यदेव के रथ से जुड़ी है। कहा जाता है कि सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की निरंतर परिक्रमा करते हैं। घोड़े थक जाते हैं, उन्हें विश्राम देना पड़ता है और सूर्यदेव रथ को रोक नहीं सकते, क्योंकि सूर्य का रुकना जीवन के रुकने का प्रतीक है। ऐसे में तालाब के किनारे दो गधे दिखाई देते हैं, जिन्हें रथ में जोड़ लिया जाता है। गधों की धीमी चाल से सूर्य की गति मंद हो जाती है और इसी मंद गति के कारण यह काल खरमास कहलाता है। यह कथा जितनी सरल प्रतीत होती है, उतनी ही गहरी है। यह स्पष्ट करती है कि भारतीय मनीषा में गति और ठहराव दोनों को स्वीकार किया गया है, पर उनके लिए समय और संदर्भ निर्धारित हैं।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मार्कण्डेय पुराण या अन्य प्रमुख पुराणों में इस कथा का कोई प्रत्यक्ष संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है। यह कथा शाब्दिक नहीं, बल्कि भावात्मक और प्रतीकात्मक रूप में पुराणीय परंपरा में विकसित हुई है। आधुनिक समय में कई लेखों और प्रवचनों में इसे श्लोक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति देखी जाती है, जो शास्त्रीय दृष्टि से सही नहीं है। फिर भी, इसका अर्थ यह नहीं कि कथा निराधार है। भारतीय परंपरा में अनेक मान्यताएँ श्लोकों से नहीं, बल्कि लोकबोध और सांस्कृतिक व्याख्याओं से जन्म लेती हैं। खरमास की कथा भी इसी श्रेणी में आती है।
वैदिक साहित्य में सूर्य के सात घोड़ों का उल्लेख अवश्य मिलता है। ऋग्वेद में सूर्य के रथ और उसके सात अश्वों को समय, ऋतु, दिन और ऊर्जा के प्रतीक के रूप में देखा गया है। सूर्य का रथ एक चक्र का है, जो काल का बोध कराता है। इसका तात्पर्य यह है कि समय निरंतर चलता रहता है, पर उसकी गति समान नहीं होती। कहीं वह तीव्र होती है, कहीं मंद। खरमास इसी मंदता का सांस्कृतिक रूपक है। यह वह समय है जब प्रकृति स्वयं विश्राम की ओर जाती है, दिन छोटे होते हैं, ठंड बढ़ती है और कृषि गतिविधियाँ सीमित हो जाती हैं। ऐसे में बड़े सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों से परहेज करना व्यावहारिक भी था।
खरमास को बृहस्पति के प्रभाव से भी जोड़ा जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह माना जाता है कि इस अवधि में सूर्य बृहस्पति की राशि में होता है और सूर्य की तीव्रता बृहस्पति के शुभ प्रभाव को दबा देती है। बृहस्पति ज्ञान, विवाह और संस्कारों के कारक माने जाते हैं। जब उनका प्रभाव कमजोर हो, तब मांगलिक कार्यों को टालना एक प्रकार की सावधानी है। इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संतुलन का प्रयास प्रतीत होता है, जहां हर समय विस्तार और उत्सव को अनिवार्य नहीं माना गया।
महाभारत में भी खरमास की धारणा अप्रत्यक्ष रूप से सामने आती है। भीष्म पितामह का उत्तरायण की प्रतीक्षा करना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि उस समय की व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता का प्रतिबिंब था। भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था, फिर भी उन्होंने पौष मास, जिसे खरमास कहा जाता है, में प्राण त्याग नहीं किए। गरुड़ पुराण और ब्रह्म पुराण में यह विश्वास व्यक्त किया गया है कि इस मास में मृत्यु होने पर सद्गति प्राप्त नहीं होती। चाहे आधुनिक दृष्टि से यह मान्यता स्वीकार्य न हो, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि समाज ने समय के विभिन्न चरणों को जीवन और मृत्यु के संदर्भ में भी अलग-अलग अर्थ दिए।
रामायण में खरमास का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी इस काल में रामायण पाठ को शुभ माना जाना अपने आप में एक संकेत है। जब बाहरी कर्मकांड सीमित हों, तब आंतरिक साधना और आत्मचिंतन को महत्व देना भारतीय परंपरा की विशेषता रही है। खरमास को यदि नकारात्मक काल कहा गया, तो केवल इसलिए कि यह बाह्य गतिविधियों के लिए अनुकूल नहीं है, न कि इसलिए कि यह पूर्णतः अशुभ है। दान, जप, तप, सूर्य अर्घ्य और विष्णु पूजा जैसे कर्म इस अवधि में विशेष रूप से फलदायी माने गए हैं।
आज के समय में जब विवाह और गृह प्रवेश तिथियों के लिए महीनों पहले बुकिंग होती है, खरमास जैसे कालखंड को लेकर असहजता स्वाभाविक है। कई लोग इसे अव्यावहारिक या अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं। परंतु यह भी सच है कि भारतीय परंपरा ने जीवन को केवल निरंतर दौड़ के रूप में नहीं देखा। उसने विश्राम, ठहराव और आत्मसंयम के लिए भी समय निर्धारित किया। खरमास उसी दर्शन की अभिव्यक्ति है। यह हमें याद दिलाता है कि हर समय सृजन का नहीं होता, कुछ समय संरक्षण और चिंतन के भी होते हैं।
खरमास की कथा में गधे का चयन भी प्रतीकात्मक है। गधा भारतीय लोकसंस्कृति में धैर्य, सहनशीलता और निरंतर श्रम का प्रतीक रहा है। उसकी धीमी चाल यह संकेत देती है कि गति कम होने का अर्थ ठहराव नहीं, बल्कि संतुलन है। सूर्य का रथ चलता रहता है, केवल उसकी गति बदल जाती है। यही संदेश मानव जीवन के लिए भी है। हर समय तेज दौड़ आवश्यक नहीं, कभी-कभी धीमी चाल ही जीवन को सुरक्षित और अर्थपूर्ण बनाती है।
अंततः खरमास को केवल शुभ-अशुभ के खांचे में बांधना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना है। यह काल हमें प्रकृति की लय, समय की गति और जीवन की विविध अवस्थाओं को स्वीकार करना सिखाता है। यह भारतीय परंपरा की उस गहन समझ का उदाहरण है, जहां खगोल, धर्म और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। खरमास कोई भय का नहीं, बल्कि विवेक का समय है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है समय पर धीमा होना भी।
मोबाइल: 9989703240,
ईमेल: mahendratone@gmail.com
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY