कानून अराजकता के भय से नहीं चल सकता
-महेन्द्र तिवारी
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान तथा विधि का शासन है। लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि देश में कानून कितनी निष्पक्षता, समानता और दृढ़ता के साथ लागू होता है। यदि कानून भीड़ के दबाव, राजनीतिक लाभ, सामाजिक तनाव या संभावित अराजकता के भय से प्रभावित होने लगे तो लोकतंत्र का मूल आधार कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए यह कहना पूरी तरह उचित प्रतीत होता है कि कानून अराजकता के भय से नहीं चल सकता। कानून का उद्देश्य समाज में शांति, न्याय और व्यवस्था स्थापित करना है, न कि अव्यवस्था के भय से अपने सिद्धांतों से समझौता करना।
विधि के शासन का अर्थ है कि देश में कोई भी व्यक्ति, संस्था या सरकार कानून से ऊपर नहीं है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और सभी पर समान रूप से कानून लागू होने की अपेक्षा करता है। यदि किसी वर्ग, संगठन या भीड़ के हिंसक दबाव के कारण सरकार या प्रशासन अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से पीछे हटने लगे तो यह विधि के शासन की भावना के विपरीत होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र का आधार कानून का शासन है और न्यायालयों का दायित्व है कि वे बिना भय या पक्षपात के उसकी रक्षा करें।
आज के समय में यह प्रश्न अधिक प्रासंगिक इसलिए भी हो गया है क्योंकि समाज में विरोध प्रदर्शनों, सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक मतभेदों की संख्या बढ़ी है। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। लोग अपनी समस्याओं को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर सकते हैं, सरकार से प्रश्न पूछ सकते हैं और अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से रख सकते हैं। लेकिन जब यही विरोध हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, सरकारी कार्य में बाधा या कानून व्यवस्था को चुनौती देने का माध्यम बन जाए, तब राज्य का दायित्व केवल दर्शक बने रहने का नहीं बल्कि कानून के अनुसार कार्रवाई करने का होता है।
दूसरी ओर, यह भी उतना ही सत्य है कि कानून लागू करने के नाम पर राज्य मनमानी नहीं कर सकता। कानून की दृढ़ता और राज्य की कठोरता में अंतर होता है। हाल के दिनों में सर्वोच्च न्यायालय ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को दोहराते हुए यह भी कहा कि केवल प्रदर्शन होने के कारण पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार है और प्रशासन की प्रतिक्रिया भी कानून के दायरे में रहनी चाहिए।
यही लोकतंत्र का संतुलन है। कानून अराजकता के भय से नहीं चल सकता, लेकिन कानून के नाम पर नागरिक अधिकारों का दमन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। राज्य का कर्तव्य है कि वह दोनों पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करे। यदि कानून केवल शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाए तो नागरिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी और यदि कानून भीड़ के दबाव में झुक जाए तो न्याय व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।
भारतीय संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित किया है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिक व्याख्या करती है। यदि इन संस्थाओं में से कोई भी अपने दायित्व से विमुख हो जाए या बाहरी दबावों के कारण अपने निर्णय बदलने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के निर्णयों में भी यह दोहराया है कि नए अपराध बनाना या कानून का विस्तार करना न्यायपालिका का कार्य नहीं है, क्योंकि संविधान ने प्रत्येक संस्था की स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की हैं।
कानून का सबसे बड़ा गुण उसकी निष्पक्षता है। यदि एक ही प्रकार के अपराध के लिए अलग अलग लोगों के साथ अलग व्यवहार किया जाए तो समाज का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठने लगता है। यही कारण है कि न्यायालय बार-बार समानता के सिद्धांत पर बल देते हैं। कानून किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, राजनीतिक शक्ति, आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म या सामाजिक प्रभाव को देखकर नहीं बदल सकता। यदि ऐसा होने लगे तो लोकतंत्र की जगह व्यक्तियों का शासन स्थापित हो जाएगा।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राष्ट्र ने भीड़ को कानून से ऊपर स्थान दिया है, वहां अराजकता ने जन्म लिया है। भीड़ का निर्णय तत्काल भावनाओं पर आधारित होता है जबकि न्यायालय का निर्णय तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया पर आधारित होता है। भीड़ क्षणिक क्रोध में निर्दोष व्यक्ति को भी दोषी मान सकती है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर देती है। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया कभी कभी धीमी अवश्य प्रतीत होती है, लेकिन उसका उद्देश्य स्थायी और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना होता है।
आज सोशल मीडिया के युग में यह चुनौती और बढ़ गई है। किसी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। अनेक बार अधूरी जानकारी या भ्रामक संदेशों के आधार पर जनमत तैयार होने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में सरकारों पर त्वरित कार्रवाई का दबाव बनता है। यदि प्रशासन केवल सोशल मीडिया की भावनाओं के आधार पर निर्णय लेने लगे तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक निर्णय तथ्यों, जांच और विधिक प्रक्रिया पर आधारित हो।
लोकतंत्र में जनभावना का सम्मान आवश्यक है, लेकिन जनभावना और न्याय हमेशा एक जैसे नहीं होते। कभी कभी लोकप्रिय मांग भी संविधान के अनुरूप नहीं होती। ऐसे समय में राज्य का दायित्व और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। संविधान की रक्षा करना सरकार, न्यायपालिका और सभी संवैधानिक संस्थाओं का साझा उत्तरदायित्व है। यदि वे अलोकप्रिय होने के भय से भी अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन न करें तो लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
कानून व्यवस्था केवल अपराधियों को दंड देने तक सीमित नहीं है। उसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक में यह विश्वास पैदा करना भी है कि उसके अधिकार सुरक्षित हैं और किसी भी विवाद का समाधान विधिक प्रक्रिया से होगा। यदि नागरिकों को यह भरोसा न रहे कि न्याय मिलेगा, तब वे स्वयं न्याय करने का प्रयास करने लगते हैं। यही स्थिति भीड़तंत्र और अराजकता को जन्म देती है। इसलिए न्याय व्यवस्था का मजबूत और निष्पक्ष होना किसी भी लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है।
भारत जैसे विविधताओं वाले देश में कानून की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान की अनेक परतें हैं। यदि प्रत्येक विवाद का समाधान केवल सामाजिक दबाव या राजनीतिक प्रभाव से होने लगे तो राष्ट्रीय एकता प्रभावित होगी। कानून ही वह समान आधार है जो सभी नागरिकों को एक समान अधिकार और समान सुरक्षा प्रदान करता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कानून का भय और कानून का सम्मान दो अलग बातें हैं। आदर्श स्थिति वह है जहां नागरिक दंड के भय से नहीं बल्कि कानून के प्रति सम्मान की भावना से उसका पालन करें। इसके लिए केवल कठोर दंड पर्याप्त नहीं हैं। पारदर्शी प्रशासन, त्वरित न्याय, प्रभावी पुलिस व्यवस्था, विधिक जागरूकता और नागरिक उत्तरदायित्व भी उतने ही आवश्यक हैं। जब लोगों को विश्वास होगा कि कानून निष्पक्ष है, तब उसका पालन स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।
आज न्याय व्यवस्था के सामने अनेक चुनौतियां हैं। लंबित मुकदमे, जांच एजेंसियों की सीमाएं, तकनीकी अपराध, साइबर अपराध और तेजी से बदलती सामाजिक परिस्थितियां कानून के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रही हैं। इन चुनौतियों का समाधान कानून से समझौता करके नहीं बल्कि संस्थाओं को अधिक सक्षम, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाकर किया जा सकता है।
लोकतंत्र की सफलता का वास्तविक मापदंड यही है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी अपने संवैधानिक मूल्यों से विचलित न हो। हिंसा का उत्तर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए और शांतिपूर्ण असहमति का उत्तर संवाद होना चाहिए। यदि दोनों के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा। हाल के न्यायिक अवलोकनों में भी यही भावना व्यक्त की गई है कि शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन ही संवैधानिक शासन की पहचान है।
अंततः यह स्पष्ट है कि कानून अराजकता के भय से नहीं चल सकता, क्योंकि ऐसा होने पर कानून की निष्पक्षता समाप्त हो जाएगी। साथ ही कानून शक्ति प्रदर्शन का उपकरण भी नहीं बन सकता, क्योंकि तब नागरिक स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी। सही मार्ग वही है जिसमें संविधान सर्वोच्च रहे, कानून सभी पर समान रूप से लागू हो, न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान हो और राज्य बिना भय, बिना पक्षपात तथा बिना दबाव के अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वहन करे। यही विधि के शासन की वास्तविक भावना है और यही किसी भी सशक्त, लोकतांत्रिक तथा सभ्य समाज की सबसे बड़ी पहचान है।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY