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जब तिरंगा बना भारत की पहचान

 

जब तिरंगा बना भारत की पहचान

-महेन्द्र तिवारी 


राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस भारतीय इतिहास का एक ऐसा गौरवपूर्ण अवसर है, जो हमें स्वतंत्रता संग्राम की महान विरासत, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाता है। प्रत्येक वर्ष 22 जुलाई को मनाया जाने वाला यह दिवस उस ऐतिहासिक निर्णय का स्मरण कराता है, जब 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के वर्तमान तिरंगे को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार किया। यह निर्णय केवल एक ध्वज के चयन तक सीमित नहीं था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की सामूहिक चेतना, आत्मसम्मान और भविष्य की दिशा का उद्घोष था, जो सदियों की दासता के बाद स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था। इस अवसर पर संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। इसके साथ ही भारत को ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक मिला, जो आज भी करोड़ों भारतीयों की आशाओं, आकांक्षाओं और राष्ट्रीय गौरव का प्रतिनिधित्व करता है।


किसी भी राष्ट्र का ध्वज केवल रंगों से बना हुआ वस्त्र नहीं होता। वह उस देश के इतिहास, संस्कृति, संघर्ष, मूल्यों और भविष्य की आकांक्षाओं का जीवंत प्रतीक होता है। जब कोई नागरिक अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानपूर्वक देखता है, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से अपने देश के प्रति प्रेम, सम्मान और समर्पण का भाव जागृत होता है। भारत का तिरंगा भी इसी भावना का प्रतीक है। यह हमें बताता है कि हमारी पहचान केवल किसी क्षेत्र, भाषा, जाति या धर्म से नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक होने से है।


भारत का राष्ट्रीय ध्वज तीन समान क्षैतिज पट्टियों से बना है। सबसे ऊपर गहरा केसरिया रंग है, जो साहस, त्याग और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक माना जाता है। मध्य में सफेद रंग है, जो सत्य, शांति और पारदर्शिता का संदेश देता है। सबसे नीचे हरा रंग है, जो समृद्धि, प्रकृति, कृषि, विकास और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र अंकित है, जिसमें चौबीस तीलियां हैं। यह चक्र सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के धर्मचक्र से प्रेरित है। अशोक चक्र निरंतर गति, न्याय, धर्म, कर्तव्य और प्रगतिशील जीवन का संदेश देता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राष्ट्र तभी आगे बढ़ सकता है, जब वह निरंतर कर्म, नैतिकता और विकास के मार्ग पर चलता रहे।


तिरंगे का वर्तमान स्वरूप एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक प्रकार के राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तावित किए गए। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में कई क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों ने ऐसे ध्वज तैयार किए, जो भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षा को व्यक्त करते थे। वर्ष 1921 में आंध्र प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के समक्ष एक ध्वज का प्रारूप प्रस्तुत किया। समय के साथ उसमें परिवर्तन हुए। वर्ष 1931 में कांग्रेस ने एक तिरंगे ध्वज को स्वीकार किया, जिसमें मध्य में चरखा था। यही ध्वज आगे चलकर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का आधार बना। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि चरखे के स्थान पर अशोक चक्र को स्थान दिया जाएगा, जिससे ध्वज राष्ट्रीय और सार्वभौमिक मूल्यों का अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व कर सके।


राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण का निर्णय ऐसे समय लिया गया, जब भारत स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ ही सप्ताह दूर था। देश विभाजन की पीड़ा, सांप्रदायिक तनाव और अनिश्चित भविष्य जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा था। ऐसे समय में एक ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक आवश्यक था, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सके। तिरंगा इसी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनकर सामने आया। इसने भारतवासियों को यह विश्वास दिलाया कि विविधताओं से भरे इस विशाल देश की आत्मा एक है और उसका भविष्य भी साझा है।


भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं, अनेक धर्मों का पालन किया जाता है, अलग-अलग परंपराएं, पहनावे, भोजन और जीवन शैली देखने को मिलती हैं। फिर भी जब राष्ट्रीय ध्वज लहराता है, तब यह सभी भेदभाव स्वतः गौण हो जाते हैं। तिरंगा हमें याद दिलाता है कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। यही भावना भारत की लोकतांत्रिक शक्ति और राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी आधारशिला है।


जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय खिलाड़ी पदक जीतते हैं और तिरंगा ऊंचा उठता है, तब करोड़ों भारतीयों की आंखें गर्व से भर जाती हैं। चाहे ओलंपिक हो, विश्व कप हो, अंतरिक्ष अभियान हो, वैज्ञानिक उपलब्धियां हों या वैश्विक मंचों पर भारत की सफलता, हर उपलब्धि के साथ तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की उपलब्धि का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय अपने राष्ट्रीय ध्वज के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है।


भारतीय सशस्त्र बलों के लिए तिरंगे का महत्व और भी अधिक है। देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक इसी ध्वज की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। अनेक वीर सैनिकों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन तिरंगे की शान को कभी झुकने नहीं दिया। जब किसी शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर अपने घर पहुंचता है, तब वह दृश्य पूरे राष्ट्र को भावुक कर देता है और प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।


राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक सम्मान तभी है, जब हम अपने दैनिक जीवन में संविधान के आदर्शों का पालन करें। ईमानदारी, अनुशासन, परिश्रम, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, कानून का सम्मान और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा जैसे व्यवहार ही तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धा के प्रतीक हैं। यदि कोई नागरिक राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखता है, तो वही राष्ट्रीय ध्वज का वास्तविक सम्मान करता है।


भारत में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसके उचित उपयोग के लिए ध्वज संहिता बनाई गई है। समय के साथ इसमें परिवर्तन भी किए गए हैं ताकि नागरिक अधिक सहजता से राष्ट्रीय ध्वज के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकें। हालांकि ध्वज का उपयोग करते समय उसकी गरिमा और सम्मान बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का नैतिक और कानूनी दायित्व है। राष्ट्रीय ध्वज कभी भी किसी प्रकार के अपमान, व्यावसायिक दुरुपयोग या अनुचित प्रदर्शन का माध्यम नहीं बनना चाहिए।


राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए अत्यंत प्रेरणादायक अवसर है। आज के युवाओं के सामने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, रक्षा, खेल और नवाचार जैसे अनेक क्षेत्र खुले हुए हैं। यदि युवा अपने ज्ञान, प्रतिभा और परिश्रम के माध्यम से भारत को विश्व में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं, तो यही तिरंगे के प्रति उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। केवल हाथ में तिरंगा लेकर उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह है कि उसके आदर्शों को अपने व्यक्तित्व और कार्यों में भी उतारा जाए।


विद्यालयों और महाविद्यालयों में राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस का आयोजन विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम और नागरिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का उत्कृष्ट माध्यम बन सकता है। इस अवसर पर ध्वज के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम, संविधान सभा की भूमिका, राष्ट्रीय प्रतीकों के महत्व और नागरिक कर्तव्यों पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इससे विद्यार्थियों में इतिहास के प्रति सम्मान और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है।


आज जब भारत विश्व मंच पर तेजी से अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब राष्ट्रीय ध्वज का महत्व और भी बढ़ जाता है। चंद्रयान, आदित्य मिशन, डिजिटल प्रगति, आर्थिक विकास, वैश्विक कूटनीति और खेलों में उपलब्धियां यह सिद्ध करती हैं कि भारत निरंतर आगे बढ़ रहा है। इन सभी सफलताओं के केंद्र में वही तिरंगा है, जो हमें निरंतर प्रगति, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा देता है।


राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प लेने का भी दिन है। यह हमें स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है। जिस तिरंगे को लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की विरासत प्राप्त है, उसकी गरिमा बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। जब तक भारत का प्रत्येक नागरिक सत्य, ईमानदारी, परिश्रम, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को अपने जीवन का आधार बनाए रखेगा, तब तक तिरंगा सदैव गर्व के साथ लहराता रहेगा। यही राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस का सबसे बड़ा संदेश है और यही स्वतंत्र भारत की अमर पहचान भी है। जय हिंद।

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