ईरान की तीन शर्तें और विश्व शांति का सवाल
- महेन्द्र तिवारी
मध्य-पूर्व में चल रहा ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच सैन्य संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह तेजी से वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक संकट का रूप लेता जा रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुई यह लड़ाई अब पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर चुकी है। इसके परिणामस्वरूप मिसाइल हमले, समुद्री मार्गों पर खतरा, तेल आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल देखने को मिल रही है।
इसी बीच ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए तीन प्रमुख शर्तें रखकर कूटनीतिक पहल की है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्पष्ट किया है कि यदि इन शर्तों को स्वीकार किया जाता है तो क्षेत्र में शांति बहाल हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका और इजरायल इन शर्तों को मानेंगे, और यदि नहीं तो इस संघर्ष का भविष्य क्या होगा?
पहली शर्त, जो ईरान के 'वैध और संप्रभु अधिकारों' को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने की बात करती है, वह वास्तव में ईरान की उस पुरानी मांग का विस्तार है जिसमें वह खुद को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्वीकार किए जाने की अपेक्षा करता है। ईरान का यह तर्क कि उसका परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा ढांचा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में है, अमेरिका और इजरायल के उस दृष्टिकोण को सीधी चुनौती देता है जो ईरान को एक 'अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व' के रूप में देखते हैं। संप्रभुता की यह मांग पश्चिम के लिए एक बड़ी दुविधा है; यदि वे इसे मानते हैं, तो यह उनकी दशकों पुरानी नीतियों की विफलता होगी, और यदि नहीं मानते, तो युद्ध की विभीषिका के समाप्त होने की कोई संभावना नजर नहीं आती।
दूसरी शर्त, जिसमें युद्ध के दौरान हुए आर्थिक और बुनियादी ढांचे के नुकसान की भरपाई की मांग की गई है, संघर्ष के आर्थिक आयाम को रेखांकित करती है। आधुनिक युद्ध केवल जान नहीं लेते, बल्कि वे देशों की आर्थिक रीढ़ भी तोड़ देते हैं। ईरान का आरोप है कि 'ऑपरेशन लायन’स रोअर' के तहत किए गए हमलों ने उसके उन असैन्य ढांचों को भी निशाना बनाया है जो आम नागरिकों की जीवनरेखा थे। क्षतिपूर्ति की यह मांग न केवल वित्तीय है, बल्कि नैतिक भी है। ईरान इसके माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि वह इस युद्ध का शिकार है और हमलावर देशों को अपनी 'आक्रामकता' की कीमत चुकानी होगी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में युद्ध के बाद मुआवजे की प्रक्रिया हमेशा जटिल और विवादित रही है, खासकर जब इसमें अमेरिका और इजरायल जैसी शक्तियां शामिल हों जो खुद को सुरक्षात्मक भूमिका में देखती हैं।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त भविष्य के हमलों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी सुरक्षा गारंटी की मांग है। यह मांग ईरान के उस गहरे अविश्वास को दर्शाती है जो उसे वैश्विक व्यवस्था और विशेष रूप से पश्चिमी प्रतिबद्धताओं पर है। ईरान का तर्क है कि बिना किसी ठोस गारंटी के, शांति केवल एक अल्पकालिक विराम होगी जिसका उपयोग उसके शत्रु फिर से संगठित होने के लिए करेंगे। यह सुरक्षा गारंटी एक ऐसा पेचीदा मुद्दा है जिसे सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्र या सुरक्षा परिषद को अपनी भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ सकता है। क्या दुनिया की कोई भी शक्ति यह गारंटी दे सकती है कि भविष्य में इजरायल या अमेरिका ईरान पर हमला नहीं करेंगे? यह सवाल न केवल मध्य-पूर्व की शांति से जुड़ा है, बल्कि यह वर्तमान वैश्विक सुरक्षा संरचना की सीमाओं को भी उजागर करता है।
जैसे-जैसे ये कूटनीतिक दांव-पेंच चल रहे हैं, दुनिया की नजरें 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर टिकी हुई हैं। यह जलडमरूमध्य आज एक वैश्विक युद्ध के मैदान में बदल चुका है। दुनिया का २० प्रतिशत तेल इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है, और इसका बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी 'हार्ट अटैक' से कम नहीं है। जहाजों पर बढ़ते हमले और सुरक्षा के अभाव में तेल टैंकरों की आवाजाही का रुकना एक ऐसा संकेत है जो आर्थिक मंदी की आहट दे रहा है। समुद्र की लहरों पर तैरते तेल के बैरल अब वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। जब तेल की कीमतें १०० डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर जाती हैं, तो उसका असर केवल अमीर देशों की विलासिता पर नहीं पड़ता, बल्कि विकासशील देशों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले करोड़ों लोगों की थाली पर भी पड़ता है। महंगाई की यह लहर आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान का सीधा परिणाम है, जिससे कोई भी महाद्वीप अछूता नहीं रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का यह डर कि हम १९७० के दशक जैसे तेल संकट की ओर बढ़ रहे हैं, बेबुनियाद नहीं है। ऊर्जा की कमी केवल परिवहन को प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह कृषि उत्पादन और उर्वरक निर्माण को भी बाधित करती है। खाद्य सुरक्षा का संकट, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण दबाव में था, अब इस युद्ध की आग में और सुलग उठा है। यदि यह गतिरोध बना रहा, तो वैश्विक बाजारों में होने वाली उथल-पुथल सामाजिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है, जिसका असर हम पहले भी कई देशों में देख चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से रूस और चीन जैसे देश, इस स्थिति को एक अलग चश्मे से देख रहे हैं। उनकी मध्यस्थता की कोशिशें और ईरान के साथ उनके रणनीतिक संबंध इस संघर्ष को एक बहुध्रुवीय युद्ध का रूप दे रहे हैं, जहाँ अमेरिका का वर्चस्व दांव पर लगा है।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठनों की लाचारी एक बार फिर सामने आई है। युद्धविराम की अपीलों और शांति वार्ताओं के प्रस्तावों के बावजूद, धरातल पर मिसाइलों और ड्रोनों की गूंज कम नहीं हो रही है। अमेरिका और इजरायल के लिए ईरान की शर्तों को स्वीकार करना राजनीतिक रूप से एक 'आत्मसमर्पण' जैसा लग सकता है, जो उनके घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय रणनीतियों के लिए घातक हो सकता है। दूसरी ओर, ईरान के लिए पीछे हटने का मतलब अपनी संप्रभुता के साथ समझौता करना होगा। यह 'डेडलॉक' यानी गतिरोध ही शांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। कूटनीतिक समाधान के लिए जिस लचीलेपन की आवश्यकता है, वह फिलहाल दोनों ही पक्षों के व्यवहार में नजर नहीं आ रही है। क्या संयुक्त राष्ट्र इस संकट को सुलझाने के लिए कोई नई 'शांति सेना' या मध्यस्थता का मॉडल पेश कर पाएगा? या फिर दुनिया को एक और लंबे और थकाऊ युद्ध के लिए तैयार रहना होगा?
निष्कर्षतः, ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ा यह संघर्ष केवल शक्ति प्रदर्शन की होड़ नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युग की जटिलताओं का एक काला अध्याय है। २८ फरवरी २०२६ के बाद शुरू हुए इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई भी युद्ध 'क्षेत्रीय' नहीं होता। एक देश की अशांति पूरी दुनिया के शेयर बाजारों, व्यापारिक मार्गों और आम आदमी की जेब को प्रभावित करती है। ईरान की तीन शर्तें शांति की दिशा में एक चुनौती भी हैं और एक अवसर भी। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय संवाद और कूटनीति के माध्यम से इन शर्तों पर कोई बीच का रास्ता निकालने में सफल होता है, तो शायद हम एक बड़े वैश्विक विनाश को टाल पाएंगे। अन्यथा, इतिहास गवाह है कि जब संवाद के दरवाजे बंद हो जाते हैं, तो केवल विनाश ही शेष रहता है। आज दुनिया को न्याय, जवाबदेही और सामूहिक सुरक्षा के नए सिद्धांतों की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस बात का गवाह न बनें कि कैसे कुछ देशों के अहंकार ने पूरी मानवता को एक गहरे संकट में धकेल दिया था। शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह उन कारणों का समाधान है जो युद्ध को जन्म देते हैं।
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