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ईरान, होर्मुज और बदलती विश्व व्यवस्था

 

ईरान, होर्मुज और बदलती विश्व व्यवस्था

-महेन्द्र तिवारी 


विश्व राजनीति में शक्ति का अर्थ समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में शक्ति के मानक बदलते रहे हैं। कभी विशाल और अजेय सेनाएँ किसी साम्राज्य या देश की ताकत का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती थीं, तो कभी औद्योगिक क्रांति के बाद औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक क्षमता को वैश्विक शक्ति का मुख्य आधार समझा गया। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, विशेषकर शीतयुद्ध के दौर में, परमाणु हथियारों को सर्वोच्च शक्ति और संप्रभुता का प्रतीक माना जाने लगा। ऐसा माना जाता था कि परमाणु क्षमता से संपन्न देश ही वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय कर सकते हैं। किंतु 21वीं शताब्दी के आगमन ने इन सभी पारंपरिक धारणाओं को पीछे छोड़ दिया है। आज के दौर में वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति, तकनीकी नेटवर्क और समुद्री मार्गों ने शक्ति की परिभाषा को एक बिल्कुल नया और बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया है। हाल के वर्षों में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़े तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर उभरी परिस्थितियों ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक दुनिया में केवल सैन्य सामर्थ्य ही निर्णायक नहीं है। किसी महत्वपूर्ण भौगोलिक मार्ग, संसाधन अथवा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण भी उतना ही प्रभावशाली और रणनीतिक साधन बन सकता है। यही वह महत्वपूर्ण संदेश है जो ईरान की वर्तमान रणनीति के माध्यम से पूरी दुनिया के सामने उभरकर आया है।


होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग है। भौगोलिक दृष्टि से यह फारस की खाड़ी को अरब सागर और हिंद महासागर से जोड़ता है। इस संकरे मार्ग का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे दुनिया के सबसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का समुद्री निर्यात इसी मार्ग से होकर गुजरता है। वैश्विक कच्चे तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा रोजाना इस संकरे जलमार्ग से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचता है। इसके अलावा, तरल प्राकृतिक गैस के वैश्विक समुद्री व्यापार का भी एक बहुत बड़ा भाग इसी रास्ते से तय होता है। इसलिए होर्मुज केवल एक साधारण जलमार्ग नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन है। यदि इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है या तनाव बढ़ता है, तो उसका सीधा और तात्कालिक प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की कीमतों, समुद्री परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और दुनिया भर के उपभोक्ता बाजारों पर दिखाई देने लगता है।


इस पूरे परिदृश्य में ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे इस क्षेत्र में एक विशिष्ट सामरिक महत्व प्रदान करती है। इस जलडमरूमध्य के उत्तरी तट पर ईरान का सीधा भौगोलिक प्रभाव है और इसी कारण वह लंबे समय से इस मार्ग को अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति के रूप में देखता रहा है। जब भी पश्चिमी देशों द्वारा ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए या उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं की अनदेखी की गई, तब उसने बार-बार यह संकेत दिया कि वह होर्मुज में जहाजों के आवागमन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। कई अवसरों पर ईरान ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह चेतावनी भी दी है कि यदि उसके राष्ट्रीय हितों को गंभीर नुकसान पहुँचाया गया, तो वह इस मार्ग को पूरी तरह बंद करने अथवा यहाँ अतिरिक्त नियंत्रण स्थापित करने पर विचार कर सकता है। यहीं से दुनिया के लिए एक नया भू-राजनीतिक संदेश निकलता है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भूगोल स्वयं एक बहुत बड़ी शक्ति है। यदि किसी देश के पास कोई ऐसा विशिष्ट स्थान है जो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति या सामरिक गतिविधियों के लिए अनिवार्य है, तो वह देश अपनी सीमित सैन्य या आर्थिक क्षमताओं के बावजूद वैश्विक मंच पर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव रख सकता है। ईरान दशकों से भारी आर्थिक प्रतिबंधों और राजनीतिक दबावों का सामना कर रहा है, लेकिन होर्मुज पर उसकी सामरिक स्थिति उसे विश्व राजनीति में लगातार प्रासंगिक और शक्तिशाली बनाए रखती है।


यह स्थिति पारंपरिक शक्ति संतुलन को भी गंभीर चुनौती देती है। लंबे समय तक वैश्विक राजनीति में यह माना जाता रहा कि बड़ी सैन्य और परमाणु शक्ति रखने वाले देश किसी भी क्षेत्रीय संकट का समाधान अपने पक्ष में करने में सक्षम होते हैं। लेकिन होर्मुज का उदाहरण दिखाता है कि कठोर भौगोलिक वास्तविकताएँ कई बार विशाल सैन्य शक्ति को भी सीमित कर देती हैं। यदि इस समुद्री मार्ग पर थोड़ा भी तनाव बढ़ता है तो उसका असर केवल एक क्षेत्र पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है। इसलिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों को भी यहाँ किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई करने से पहले कूटनीति, समझौतों और क्षेत्रीय संतुलन का सहारा लेना पड़ता है। इसके साथ ही, ईरान की इस रणनीति ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। ऊर्जा आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला है जिसके बिना उद्योग, परिवहन, कृषि और संचार जैसे लगभग सभी क्षेत्र ठप हो सकते हैं। जब किसी ऐसे महत्वपूर्ण मार्ग पर संकट की मामूली आशंका भी उत्पन्न होती है, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में तेजी से उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है। इससे दुनिया भर के निवेशकों में चिंता बढ़ती है और सरकारें वैकल्पिक व्यवस्थाओं की तलाश करने के लिए मजबूर हो जाती हैं। इस प्रकार एक सीमित क्षेत्रीय तनाव भी व्यापक वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।


इस परिस्थिति का प्रभाव केवल तेल उत्पादक या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहता है। जापान, दक्षिण कोरिया, भारत और यूरोप के अनेक प्रमुख देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से पश्चिम एशिया के इसी मार्ग पर निर्भर हैं। यदि होर्मुज में कोई बाधा आती है तो इन विकासशील और विकसित देशों की ऊर्जा सुरक्षा सीधे प्रभावित होती है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम राष्ट्र इस मार्ग को हमेशा खुला और सुरक्षित बनाए रखने के पक्षधर हैं। वे अच्छी तरह समझते हैं कि यहाँ उत्पन्न होने वाला कोई भी संकट उनके घरेलू आर्थिक हितों को सीधे चोट पहुँचाएगा। ईरान के इस व्यवहार से यह भी स्पष्ट होता है कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल हथियारों के संचय की नहीं होगी। बीते दशकों में परमाणु हथियारों के प्रसार को लेकर व्यापक चिंताएँ व्यक्त की जाती रही हैं, लेकिन आज एक नई प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है जिसमें देश उन स्थानों, संसाधनों और मार्गों पर नियंत्रण की तलाश कर रहे हैं जिनके माध्यम से वे संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर सकें। इन्हें भू-राजनीति की भाषा में चोक प्वाइंट कहा जाता है, जहाँ से होकर व्यापार, ऊर्जा या संचार का बड़ा भाग गुजरता है।


दुनिया में होर्मुज अकेला ऐसा मार्ग नहीं है। मलक्का जलडमरूमध्य पूर्वी एशिया और हिंद महासागर के बीच व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है, जहाँ से वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा गुजरता है। इसी तरह बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अरब सागर से जोड़ता है जो यूरोप तथा एशिया के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, और स्वेज नहर को वैश्विक परिवहन की जीवनरेखा माना ही जाता है। यदि इन सभी मार्गों में कहीं भी रुकावट आती है तो उसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। विश्लेषकों को चिंता है कि ईरान का यह सफल उदाहरण अन्य क्षेत्रीय देशों को भी इसी प्रकार की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार अधिक अनिश्चित और अस्थिर हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा और दबाव की राजनीति बढ़ सकती है। इस संदर्भ में चीन जैसी महाशक्ति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसने तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं, दुर्लभ खनिजों और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के क्षेत्र में अपना प्रभाव अत्यधिक बढ़ा लिया है। यदि ऊर्जा मार्गों की असुरक्षा बढ़ती है, तो कई देश जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करके नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों की ओर बढ़ेंगे, जिससे उन तकनीकों पर नियंत्रण रखने वाले देशों का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। इस प्रकार एक प्रकार की निर्भरता समाप्त होते ही दूसरी निर्भरता जन्म ले लेगी।


यह पूरी स्थिति वैश्वीकरण की उस पारंपरिक अवधारणा को भी चुनौती देती है जिसके अनुसार वस्तुओं, सेवाओं और पूँजी का प्रवाह स्वतंत्र और निर्बाध होना चाहिए। लेकिन जब इन महत्वपूर्ण मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का उपयोग राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में होने लगता है, तब वैश्वीकरण की नींव कमजोर पड़ने लगती है। कंपनियों और सरकारों को वैकल्पिक मार्गों, अतिरिक्त भंडारण और विविध स्रोतों की महँगी व्यवस्था करनी पड़ती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। हालांकि ईरान का तर्क है कि वह केवल अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए अपनी भौगोलिक स्थिति का उपयोग एक रणनीतिक साधन के रूप में करता है, जबकि आलोचक इसे वैश्विक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा मानते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाने के लिए अब कूटनीति की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक प्रतिबंध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सकते। यदि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को अक्षुण्ण रखना है, तो क्षेत्रीय देशों तथा बड़ी शक्तियों के बीच निरंतर संवाद और सहयोग आवश्यक होगा। अंततः, ईरान के व्यवहार से यही निष्कर्ष निकलता है कि 21वीं शताब्दी में शक्ति का स्वरूप बहुआयामी हो गया है, जहाँ भौगोलिक स्थिति, समुद्री मार्ग, संसाधन और ऊर्जा नेटवर्क ही भविष्य की विश्व राजनीति की दिशा तय करेंगे।


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