इबोला की चपेट में कांगो, खतरे में वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा
-महेन्द्र तिवारी
मध्य अफ्रीका में स्थित कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य इन दिनों एक ऐसे स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इबोला के बुंदीबुग्यो (Bundibugyo) स्वरूप से फैली महामारी ने देखते ही देखते भयावह रूप धारण कर लिया है। 11 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कांगो में इबोला के 4,381 पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं और 2,011 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। यह प्रकोप देश के पांच प्रांतों तक पहुंच चुका है और इसे अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला इबोला प्रकोप बताया जा रहा है।
इस संकट की गंभीरता इसलिए भी अधिक है क्योंकि वर्तमान महामारी इबोला के अपेक्षाकृत दुर्लभ बुंदीबुग्यो स्वरूप के कारण उत्पन्न हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस स्वरूप के कारण होने वाली बीमारी के लिए अभी कोई स्वीकृत विशिष्ट टीका अथवा प्रमाणित विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संस्थाएं संभावित टीकों तथा उपचारों के परीक्षण और विकास में जुटी हुई हैं।
कांगो में इस प्रकोप की आधिकारिक घोषणा मई 2026 में हुई थी। हालांकि महामारी विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण उससे पहले ही समुदायों में फैलना शुरू हो चुका था। आरंभिक चरण में कई रोगियों में बीमारी की पहचान समय पर नहीं हो सकी। कुछ मामलों को अन्य सामान्य बीमारियों के रूप में देखा गया, जिसके कारण संक्रमित लोगों को अलग करने और उनके संपर्क में आए लोगों की निगरानी करने में देरी हुई। किसी भी संक्रामक बीमारी के नियंत्रण में शुरुआती पहचान सबसे महत्वपूर्ण होती है। जितनी देर होती है, संक्रमण की श्रृंखला उतनी ही लंबी होती जाती है। कांगो में यही देरी बाद में बहुत बड़ी चुनौती बन गई।
इबोला कोई साधारण संक्रामक बीमारी नहीं है। इसके आरंभिक लक्षणों में तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। इसके बाद उल्टी, दस्त और शरीर में पानी तथा लवण की गंभीर कमी हो सकती है। गंभीर स्थिति में रक्तस्राव और अनेक महत्वपूर्ण अंगों के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। रोगी को समय पर उचित चिकित्सकीय सहायता न मिले तो मृत्यु का खतरा बहुत बढ़ जाता है। इसलिए इस बीमारी से मुकाबले में शीघ्र पहचान, संक्रमित व्यक्ति का पृथक्करण, सुरक्षित देखभाल और संपर्क में आए लोगों की निगरानी अत्यंत आवश्यक है।
कांगो की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी इस महामारी को रोकने में बड़ी बाधा बन रही हैं। देश का पूर्वी हिस्सा लंबे समय से सशस्त्र संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा से प्रभावित है। अनेक क्षेत्रों में सड़कें खराब हैं और स्वास्थ्यकर्मियों तथा राहत दलों के लिए पहुंच बनाना कठिन है। विद्रोही हिंसा और सुरक्षा संबंधी समस्याओं के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का सामान्य संचालन भी प्रभावित होता है। ऐसे वातावरण में संक्रमित लोगों की पहचान करना, उन्हें उपचार केंद्रों तक पहुंचाना और उनके संपर्कों की निगरानी करना बेहद कठिन कार्य बन जाता है।
किसी महामारी के विरुद्ध लड़ाई केवल औषधियों और चिकित्सालयों से नहीं जीती जाती। इसके लिए जनता का विश्वास भी उतना ही आवश्यक है। जब लोग बीमारी के बारे में गलत धारणाओं और अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं तो संक्रमित व्यक्ति चिकित्सा केंद्र तक पहुंचने से बच सकता है। इससे बीमारी परिवारों और समुदायों में फैलती रहती है। इबोला जैसी बीमारी में मृतकों के शवों से सुरक्षित दूरी और सुरक्षित अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि संक्रमण का खतरा मृत्यु के बाद भी बना रह सकता है। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों को स्थानीय समुदायों की भावनाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए लोगों को सुरक्षित व्यवहार के लिए समझाना पड़ता है।
इस संकट का एक चिंताजनक पक्ष यह भी है कि संक्रमण केवल कांगो की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। पड़ोसी युगांडा में भी मामले सामने आए हैं। इसके अतिरिक्त प्रभावित क्षेत्रों से बाहर जाने वाले लोगों के कारण दूसरे देशों में संक्रमण पहुंचने की आशंका बनी हुई है। यूरोप और अन्य क्षेत्रों में भी प्रभावित क्षेत्र से जुड़े कुछ मामले सामने आए हैं। यही कारण है कि इस महामारी को केवल कांगो की स्थानीय समस्या मानना उचित नहीं होगा।
वर्तमान संकट का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू हाल में सामने आया है। एक अध्ययन के अनुसार इस प्रकोप में बुंदीबुग्यो विषाणु का पहले दर्ज न किया गया एक नया स्वरूप पाया गया है। वैज्ञानिकों ने ऐसी संभावना जताई है कि संक्रमण की शुरुआत पशु से मनुष्य में हुए नए संक्रमण से हुई हो सकती है। यदि यह निष्कर्ष आगे के अनुसंधान से पुष्ट होता है तो यह घटना मानव स्वास्थ्य और वन्यजीवों के बीच संबंधों की लगातार निगरानी की आवश्यकता को और स्पष्ट करेगी। मनुष्य और पशुओं के बीच बढ़ता संपर्क कई नए संक्रामक रोगों के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
वर्तमान महामारी को इबोला के इतिहास के संदर्भ में देखा जाए तो इसकी गंभीरता और स्पष्ट हो जाती है। 2014 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में फैली इबोला महामारी अब तक सबसे बड़ी रही है, जिसमें 11,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। वर्तमान कांगो प्रकोप ने कुल आकार के मामले में उस महामारी को पीछे नहीं छोड़ा है, लेकिन जिस गति से यह संक्रमण और मृत्यु का कारण बना है, वह असाधारण है। इसने कांगो के 2018 से 2020 के किवु प्रकोप को भी पीछे छोड़ दिया है और कांगो के इतिहास का सबसे बड़ा इबोला संकट बन गया है।
फिर भी इस अंधकार के बीच वैज्ञानिक प्रयास आशा की किरण भी प्रस्तुत कर रहे हैं। बुंदीबुग्यो विषाणु के लिए अभी कोई स्वीकृत टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक एक मौजूदा इबोला टीके की संभावित उपयोगिता का अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही बुंदीबुग्यो विषाणु के लिए नए टीके के विकास की दिशा में भी काम आगे बढ़ रहा है और एक संभावित टीका मानव परीक्षण के प्रारंभिक चरण में पहुंच चुका है।
कांगो की त्रासदी दुनिया के सामने एक गंभीर प्रश्न रखती है। क्या मानवता अगली महामारी के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है? कोरोना महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि कोई भी संक्रमण किसी एक देश की सीमा में लंबे समय तक सीमित नहीं रहता। आज यातायात और आवागमन ने दुनिया को इतना निकट ला दिया है कि किसी दूरस्थ क्षेत्र में पैदा हुआ संक्रमण कुछ ही समय में दूसरे महाद्वीप तक पहुंच सकता है। इसलिए महामारी की रोकथाम को केवल प्रभावित देशों की जिम्मेदारी मानना खतरनाक भूल होगी।
इस संकट से निपटने के लिए कांगो को केवल चिकित्सा सहायता नहीं, बल्कि सुरक्षित परिवहन, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, पर्याप्त चिकित्सकीय सामग्री, विश्वसनीय जांच व्यवस्था और स्थानीय समुदायों का विश्वास भी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा और उन विषाणुओं के विरुद्ध पहले से तैयारी करनी होगी जिनके लिए अभी प्रभावी टीके उपलब्ध नहीं हैं।
कांगो में मरने वाले 2,011 लोग केवल किसी सरकारी आंकड़े का हिस्सा नहीं हैं। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, एक जीवन और अनेक अधूरे सपने हैं। किसी मां ने अपना बच्चा खोया होगा, किसी बच्चे ने अपने माता-पिता को खोया होगा और किसी परिवार का सहारा अचानक समाप्त हो गया होगा। इसलिए महामारी का मूल्यांकन केवल संक्रमित और मृत लोगों की संख्या से नहीं किया जा सकता। इसके पीछे छिपे मानवीय दुःख को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
कांगो का वर्तमान संकट मानवता को यह संदेश देता है कि बीमारी सीमाएं, जातियां, भाषाएं और राष्ट्रीयताएं नहीं देखती। यदि किसी एक क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर है तो उसका खतरा अंततः पूरी दुनिया के लिए बढ़ सकता है। शांति, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही ऐसी महामारियों के विरुद्ध सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच हैं। कांगो के लोगों को इस संकट से बाहर निकालना केवल एक देश की सहायता करना नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के सुरक्षित भविष्य की रक्षा करना है। आज कांगो में बज रही खतरे की घंटी को यदि दुनिया ने गंभीरता से सुना, तो आने वाली किसी बड़ी वैश्विक त्रासदी को समय रहते रोका जा सकता है।
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