धुरंधर एक संकेत है हिंदी सिनेमा के बदलाव का
- महेन्द्र तिवारी
आदित्य धर के निर्देशन में बनी फिल्म “धुरंधर” सिर्फ एक सफल स्पाई-एक्शन फिल्म नहीं है, बल्कि यह समकालीन हिंदी सिनेमा की उस बदलती प्रवृत्ति का संकेत भी है, जहाँ शोरगुल भरी मार्केटिंग से अधिक भरोसा कंटेंट, प्रस्तुति और दर्शकों की समझ पर किया जा रहा है। बहुत कम प्रचार-प्रसार के बावजूद जिस तरह इस फिल्म ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा और बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया, वह इस बात का प्रमाण है कि अब दर्शक केवल नाम या प्रचार के सहारे नहीं, बल्कि दमदार कहानी और सशक्त अभिनय के आधार पर अपना फैसला लेते हैं।
फिल्म की कहानी एक भारतीय जासूस के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पाकिस्तान के ल्यारी क्षेत्र में सक्रिय आतंकी नेटवर्क में घुसपैठ करता है। यह विषय नया नहीं है, लेकिन “धुरंधर” इसे जिस गंभीरता, परिपक्वता और संतुलन के साथ प्रस्तुत करती है, वही इसे भीड़ से अलग खड़ा करता है। आदित्य धर ने राष्ट्रवाद को न तो अति-भावुक नारेबाज़ी में बदला है और न ही उसे सतही एक्शन तक सीमित रखा है। फिल्म में जासूसी को एक खतरनाक, मानसिक रूप से थका देने वाली और नैतिक दुविधाओं से भरी प्रक्रिया के रूप में दिखाया गया है, जो इसे अधिक विश्वसनीय बनाता है।
रणवीर सिंह का अभिनय इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। लंबे समय से एक बड़ी व्यावसायिक सफलता की तलाश में रहे रणवीर को “धुरंधर” ने वह मंच दिया है, जहाँ वे अपने अभिनय के साथ-साथ अपने स्टारडम को भी नए सिरे से स्थापित कर सके। उनका किरदार न तो पूरी तरह अजेय है और न ही भावनात्मक रूप से सपाट। उसमें डर है, क्रोध है, रणनीति है और सबसे अहम एक ऐसा आंतरिक संघर्ष है, जो दर्शक को उससे जोड़ता है। यह भूमिका रणवीर के करियर की उन चुनिंदा भूमिकाओं में शामिल होती है, जहाँ वे अभिनय और लोकप्रियता के बीच संतुलन साधते नज़र आते हैं।
सहायक कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को और गहराई देती है। संजय दत्त, आर. माधवन, अक्षय खन्ना और अर्जुन रामपाल जैसे कलाकारों का चयन केवल नामों के लिए नहीं, बल्कि उनके अभिनय कौशल के लिए किया गया प्रतीत होता है। ये किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक हैं, न कि केवल नायक की चमक बढ़ाने के लिए। खास बात यह है कि फिल्म में कोई भी चरित्र पूरी तरह काला या सफेद नहीं है; हर किसी के अपने तर्क, अपने डर और अपने स्वार्थ हैं, जो कहानी को अधिक यथार्थवादी बनाते हैं।
बॉक्स ऑफिस के आंकड़े अपने आप में “धुरंधर” की सफलता की कहानी कहते हैं। पहले दिन लगभग 28 करोड़ की कमाई, पहले तीन दिनों में 100 करोड़ का आंकड़ा पार करना और पहले हफ्ते में भारत में 200 करोड़ से अधिक का नेट कलेक्शन ये सब उस दौर में हुआ है, जब दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाना आसान नहीं माना जाता। वर्ल्डवाइड 300 करोड़ से अधिक की कमाई ने यह साफ कर दिया कि फिल्म की अपील केवल घरेलू दर्शकों तक सीमित नहीं है। इसने कई बड़ी और बहुप्रचारित फिल्मों के पहले दिन, शुरुआती दिनों और यहां तक कि लाइफटाइम कलेक्शन के रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिए।
यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस धारणा को चुनौती देती है कि बिना आक्रामक मार्केटिंग के कोई फिल्म बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सकती। “धुरंधर” की सफलता बताती है कि अगर फिल्म का कंटेंट मजबूत हो, तो दर्शक खुद उसका प्रचार करते हैं। सोशल मीडिया पर चर्चाएं, माउथ पब्लिसिटी और समीक्षकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने मिलकर इस फिल्म को एक आंदोलन जैसा बना दिया। यह हिंदी फिल्म उद्योग के लिए एक सीख है कि शायद अब बजट का बड़ा हिस्सा प्रचार पर खर्च करने की बजाय लेखन, निर्देशन और अभिनय पर लगाना अधिक सार्थक हो सकता है।
रणवीर सिंह के करियर के संदर्भ में “धुरंधर” एक निर्णायक मोड़ की तरह है। हाल के वर्षों में उनकी कुछ फिल्मों के औसत या कमजोर प्रदर्शन के बाद यह फिल्म उन्हें फिर से शीर्ष सितारों की पंक्ति में खड़ा करती है। यह साबित करती है कि स्टारडम केवल छवि या ऊर्जा से नहीं, बल्कि सही स्क्रिप्ट के चयन और खुद को कहानी के अनुरूप ढालने की क्षमता से टिकता है। “धुरंधर” ने रणवीर को न सिर्फ व्यावसायिक सफलता दी है, बल्कि उनके अभिनय पर लगे कुछ सवालों का भी ठोस जवाब दिया है।
फिल्म का व्यापक प्रभाव यह भी है कि इसने 2025 की फिल्मों की दौड़ में मानक ऊंचे कर दिए हैं। कम समय में इतने बड़े आंकड़े छूना और कई स्थापित फिल्मों के रिकॉर्ड तोड़ना इस बात का संकेत है कि दर्शक अब गुणवत्ता को प्राथमिकता दे रहे हैं। “धुरंधर” केवल एक हिट फिल्म नहीं, बल्कि यह उस बदलाव का प्रतीक है, जहाँ हिंदी सिनेमा धीरे-धीरे दिखावे से निकलकर सार की ओर लौटता दिखाई दे रहा है।
अंततः “धुरंधर” की सफलता इस विश्वास को मजबूत करती है कि सिनेमा अभी भी समाज से संवाद करने का एक सशक्त माध्यम है। जब कहानी ईमानदार हो, निर्देशन स्पष्ट हो और अभिनय विश्वसनीय हो, तब बिना शोर के भी फिल्म इतिहास रच सकती है। “धुरंधर” इसी विश्वास का जीवंत उदाहरण है एक ऐसी फिल्म जो न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर जीती है, बल्कि हिंदी सिनेमा की दिशा पर भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करती है।
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