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डेनमार्क के पीछे क्यों पड़े हैं ट्रम्प?

 

डेनमार्क के पीछे क्यों पड़े हैं ट्रम्प?

- महेन्द्र तिवारी

डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख केवल एक भूभाग को हासिल करने की सनक भर नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की बदलती वैश्विक राजनीति, संसाधनों की होड़ और महाशक्तियों के बीच उभरते नए शीतयुद्ध का संकेत है। ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से भले ही बर्फ से ढका, विरल आबादी वाला द्वीप हो, आज अमेरिका, चीन और रूस के रणनीतिक नक्शे में एक अहम मोहरा बन चुका है। ट्रंप इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “अनिवार्य” बताकर न केवल डेनमार्क की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि यूरोपीय संघ को भी खुली चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उसने अमेरिकी हितों के आड़े आने की कोशिश की, तो उसे भारी आर्थिक कीमत चुकानी होगी।

ग्रीनलैंड का महत्व उसके आकार या जनसंख्या में नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों में निहित है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह द्वीप उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच एक रणनीतिक सेतु की तरह है। शीत युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने यहां सैन्य ठिकाने बनाए थे और आज भी वहां अमेरिकी रडार प्रणाली मौजूद है। जलवायु परिवर्तन के कारण जब आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, तब नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जो वैश्विक व्यापार और सैन्य आवागमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। रूस पहले ही इन मार्गों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जबकि चीन स्वयं को “नियर-आर्कटिक स्टेट” घोषित कर इस क्षेत्र में निवेश और वैज्ञानिक गतिविधियों का विस्तार कर रहा है। ऐसे में अमेरिका को यह आशंका स्वाभाविक लगती है कि अगर उसने ग्रीनलैंड पर प्रभाव नहीं बढ़ाया, तो वह आर्कटिक की दौड़ में पिछड़ सकता है।

ट्रंप का तर्क है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर पा रहा और अमेरिका ही इसे प्रभावी ढंग से संरक्षित कर सकता है। लेकिन यह तर्क जितना सुरक्षा से जुड़ा दिखता है, उतना ही सत्ता और प्रभुत्व की भाषा से भरा हुआ है। किसी संप्रभु देश या स्वायत्त क्षेत्र को “खरीदने” की बात करना औपनिवेशिक मानसिकता की याद दिलाता है, जिसे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बहुत पहले खारिज कर चुकी है। ग्रीनलैंड के लोग स्वयं को कोई संपत्ति नहीं मानते, जिसे किसी सौदे के तहत एक हाथ से दूसरे हाथ में सौंप दिया जाए। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने ट्रंप के प्रस्ताव को सिरे से नकार कर यह स्पष्ट कर दिया है कि संप्रभुता कोई बिक्री योग्य वस्तु नहीं है।

असल चिंता केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। ग्रीनलैंड दुर्लभ मिट्टी खनिजों का एक संभावित भंडार है, जिनका उपयोग आधुनिक तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक्स में होता है। आज इन खनिजों पर चीन का प्रभुत्व है और अमेरिका इस निर्भरता को कम करना चाहता है। इसके अलावा, तेल और गैस के संभावित भंडार भी ग्रीनलैंड को ऊर्जा राजनीति के केंद्र में ला खड़ा करते हैं। ट्रंप जिस “गोल्डन डोम” मिसाइल शील्ड की बात करते हैं, उसके लिए ग्रीनलैंड में मौजूद रडार और भौगोलिक स्थिति बेहद उपयोगी मानी जाती है। इस तरह ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि सैन्य, आर्थिक और तकनीकी रणनीति का अहम हिस्सा बन जाता है।

यूरोपीय संघ ने इस पूरे घटनाक्रम में डेनमार्क के पक्ष में खड़े होकर अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया है। यूरोपीय संसद और सदस्य देशों का यह रुख इस बात का संकेत है कि यूरोप अब अमेरिकी दबाव के आगे बिना सवाल किए झुकने को तैयार नहीं है। लेकिन ट्रंप की राजनीति संवाद और कूटनीति से अधिक दबाव और धमकी पर आधारित रही है। उन्होंने टैरिफ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए पहले 10 प्रतिशत और फिर 25 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की धमकी दी है, यदि ग्रीनलैंड पर उनकी शर्तों के अनुसार कोई समझौता नहीं होता।

इस पूरे विवाद में फ्रांस को विशेष रूप से निशाना बनाना ट्रंप की राजनीतिक शैली को उजागर करता है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा डेनमार्क के सैन्य समर्थन की बात कहने पर ट्रंप ने न केवल उनका मजाक उड़ाया, बल्कि फ्रांसीसी वाइन और निर्यात पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की चेतावनी दे डाली। यह केवल आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि एक तरह का सार्वजनिक अपमान भी है, जिसका उद्देश्य यूरोप के भीतर फूट डालना और यह संदेश देना है कि अमेरिका के खिलाफ खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ेगी। डेनमार्क, फ्रांस, स्वीडन समेत आठ यूरोपीय देशों पर इस तरह का दबाव डालना यह दर्शाता है कि ट्रंप की नजर में सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी के बीच की रेखा बेहद धुंधली हो चुकी है।

यह विवाद वैश्विक राजनीति के एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। शीत युद्ध के बाद जिस उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात की जाती रही, उसमें नियमों, संस्थाओं और बहुपक्षीय सहमति को महत्व दिया गया। लेकिन ट्रंप की नीति शक्ति, सौदेबाजी और दबाव पर आधारित है। उनके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून तब तक मायने रखता है, जब तक वह अमेरिकी हितों के अनुकूल हो। ग्रीनलैंड प्रकरण इसी सोच का उदाहरण है, जहां एक रणनीतिक हित को पूरा करने के लिए संप्रभुता, आत्मनिर्णय और साझेदारी जैसे सिद्धांतों को हाशिए पर डाल दिया गया है।

इसका दीर्घकालिक प्रभाव केवल अमेरिका और यूरोप के रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगा। आर्कटिक क्षेत्र धीरे-धीरे एक नए भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बनता जा रहा है। यदि महाशक्तियां यहां सहयोग के बजाय प्रतिस्पर्धा और सैन्यीकरण का रास्ता अपनाती हैं, तो यह क्षेत्र संघर्ष का नया मैदान बन सकता है। ग्रीनलैंड के मूल निवासियों और वहां के पर्यावरण पर इसका क्या असर होगा, इस पर शायद ही कोई गंभीर चर्चा हो रही है। जलवायु परिवर्तन से जूझते इस क्षेत्र को सैन्य और औद्योगिक हितों के हवाले करना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।

अंततः ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का रुख यह सवाल खड़ा करता है कि क्या आज की दुनिया फिर से उस दौर की ओर लौट रही है, जहां ताकत ही कानून हुआ करती थी। यूरोप का विरोध और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि इस तरह की राजनीति को कितना स्वीकार किया जाएगा। अगर ग्रीनलैंड को एक सौदे की तरह देखने की प्रवृत्ति को चुनौती नहीं दी गई, तो कल कोई और क्षेत्र, कोई और देश इसी तरह की महाशक्ति राजनीति का शिकार बन सकता है। यह केवल ग्रीनलैंड का मामला नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसे नियमों और सहमति के आधार पर टिके रहने का दावा किया जाता है।

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