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अराजक मोड़ पर बांग्लादेश

 

अराजक मोड़ पर बांग्लादेश

- महेन्द्र तिवारी

बांग्लादेश आज जिस उथल-पुथल से गुजर रहा है, वह केवल एक देश की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद पैदा हुआ राजनीतिक शून्य अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ सत्ता, सड़कों और विचारधाराओं के बीच का टकराव हिंसक रूप ले चुका है। छात्र नेता और उभरते जनाक्रोश आंदोलन के प्रतीक चेहरे शरीफ़ उस्मान हादी की हत्या ने इस अस्थिरता को विस्फोटक दिशा दे दी है। यह घटना अपने-आप में जितनी दुखद और भयावह है, उससे कहीं अधिक गंभीर इसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ हैं।

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार मूलतः एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है, जिसके पास न तो जनादेश की नैतिक ताकत है और न ही प्रशासनिक मशीनरी पर वैसी पकड़, जो गहरे राजनीतिक संकट को संभाल सके। निष्पक्ष चुनाव, संस्थागत सुधार और कानून-व्यवस्था बहाल करने के वादों के बावजूद सरकार पर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि वह न तो समयबद्ध निर्णय ले पा रही है और न ही विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के बीच विश्वास कायम कर पा रही है। फरवरी 2026 के लिए घोषित आम चुनाव अभी दूर हैं, और उससे पहले ही अवामी लीग द्वारा पूरी चुनाव प्रक्रिया को “पक्षपाती” और “फासिस्ट” बताकर खारिज कर देना इस आशंका को बल देता है कि आने वाले महीनों में टकराव और तेज़ होगा।

ऐसे माहौल में शरीफ़ उस्मान हादी की हत्या एक ट्रिगर की तरह सामने आई। हादी केवल एक छात्र नेता नहीं था; वह 2024 के छात्र-आंदोलन और तथाकथित “जुलाई क्रांति” का प्रतीक बन चुका था। उसकी हत्या को अलग-अलग राजनीतिक खेमे अपने-अपने हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं—कोई इसे पुराने सत्ता तंत्र की साज़िश बता रहा है, तो कोई इसे उभरते जनतांत्रिक नेतृत्व को कुचलने की कोशिश कह रहा है। जांच में कुछ संदिग्धों के भारत की ओर भागने की आशंका ने इस पूरे घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया और गुस्से का रुख़ भारत की तरफ़ मोड़ दिया गया।

भारत-विरोधी नारे, भारतीय उच्चायोग और वीज़ा केंद्रों के बाहर हिंसक प्रदर्शन, और “भारतीय मिशन बंद करो” जैसी मांगें यह दिखाती हैं कि आंतरिक असंतोष को बाहरी दुश्मन की ओर मोड़ना कितना आसान और राजनीतिक रूप से उपयोगी होता है। बांग्लादेश की युवा राजनीति में पहले से मौजूद यह धारणा कि भारत शेख़ हसीना का संरक्षक रहा है, इस आग में घी का काम कर रही है। अंतरिम सरकार की प्रशासनिक कमजोरी और स्पष्ट संवाद की कमी ने अफ़वाहों और उग्र नैरेटिव को खुला मैदान दे दिया है।


यहाँ सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बांग्लादेश के इतिहास में राजनीतिक हिंसा अक्सर बहुत जल्दी साम्प्रदायिक रूप ले लेती है। 2021 और 2024 के बाद के अनुभव बताते हैं कि जब राज्य की पकड़ ढीली होती है, तो भीड़ का गुस्सा सबसे पहले अल्पसंख्यकों पर टूटता है। मौजूदा हालात में भी यह खतरा वास्तविक है। हालिया घटनाओं में हिन्दू समुदाय के खिलाफ़ हिंसा की खबरें और मयमन सिंह जैसे इलाकों में भीड़ द्वारा हत्या की घटनाएँ इस आशंका को पुष्ट करती हैं कि राजनीतिक अराजकता फिर से धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षा का माहौल बना सकती है।

भारत-बांग्लादेश संबंध इस समय स्पष्ट रूप से तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर ढाका भारत पर हमलावरों को शरण देने जैसे आरोपों के जरिए घरेलू दबाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर दिल्ली ने अपने राजनयिक मिशनों की सुरक्षा को लेकर कड़ी चिंता जताई है और कूटनीतिक स्तर पर विरोध दर्ज कराया है। वीज़ा सेवाओं में कटौती और सीमित आवाजाही जैसे कदम दोनों देशों के आम नागरिकों पर भी असर डाल रहे हैं। यह स्थिति न तो भारत के हित में है और न ही बांग्लादेश के, लेकिन राजनीति में तात्कालिक लाभ अक्सर दीर्घकालिक नुकसान को अनदेखा कर देता है।

इस पूरे संकट में अंतरिम सरकार की भूमिका निर्णायक होनी चाहिए थी, लेकिन वह अब तक प्रतिक्रियात्मक ही दिखी है। राष्ट्रीय शोक, आधा झुका ध्वज और कुछ गिरफ्तारियाँ प्रतीकात्मक कदम हैं; वे सड़कों पर फैले अविश्वास और गुस्से को शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत एक पारदर्शी, विश्वसनीय और तेज़ जांच की है, जो किसी भी राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर सच्चाई सामने ला सके। साथ ही, सभी प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के बीच संवाद का रास्ता खोलना भी अनिवार्य है, वरना चुनाव तक यह अस्थिरता और हिंसा बांग्लादेश को एक ऐसे दलदल में धकेल सकती है, जहाँ से निकलना मुश्किल होगा।

दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो बांग्लादेश की अस्थिरता केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगी। सीमा सुरक्षा, व्यापार, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय कट्टरता—ये सभी मुद्दे इससे प्रभावित होंगे। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह संयम और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए अपने नागरिकों, मिशनों और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बिना इस नैरेटिव को और मजबूत किए कि वह बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है।

अंततः, शरीफ़ उस्मान हादी की हत्या एक व्यक्ति की मौत से कहीं अधिक का संकेत है। यह बांग्लादेश के सत्ता-संक्रमण की विफलताओं, राजनीतिक ध्रुवीकरण, उग्र राष्ट्रवादी-इस्लामी विमर्श और अल्पसंख्यक असुरक्षा के संकट का प्रतीक बन चुकी है। अगर इस क्षण को केवल बदले और आरोप-प्रत्यारोप के जरिए जिया गया, तो नुकसान अपूरणीय होगा। बांग्लादेश के लिए यह आत्ममंथन का समय है—कि वह लोकतांत्रिक संक्रमण को हिंसा के रास्ते से गुजारेगा या संवाद, न्याय और संवैधानिक मर्यादा के सहारे। यही फैसला आने वाले वर्षों में न केवल उसके भविष्य, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता तय करेगा।


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