अंतरिक्ष से आई 'संगीत' जैसी लहरें
- महेन्द्र तिवारी
मानव सभ्यता ने सदियों तक आकाश को केवल चमकते तारों की दुनिया माना। कभी उसे देवताओं का निवास कहा गया, कभी भाग्य का दर्पण और कभी अनंत रहस्यों का महासागर। लेकिन विज्ञान ने जब दूरबीनों और रेडियो उपकरणों की सहायता से अंतरिक्ष को सुनना शुरू किया, तब पता चला कि ब्रह्मांड केवल दृश्य संसार नहीं है, बल्कि वह लगातार संकेतों, तरंगों और अदृश्य कंपन से भरा हुआ है। हाल के वर्षों में खगोलविदों ने ऐसी अनेक रेडियो तरंगें पकड़ी हैं, जिन्होंने वैज्ञानिकों को चौंका दिया। अब एक बार फिर अंतरिक्ष से आने वाली एक रहस्यमयी रेडियो लहर चर्चा में है। इस संकेत में एक निश्चित लय है, जो सुनने में किसी तबले की थाप जैसी प्रतीत होती है। वैज्ञानिक इसे किसी न्यूट्रॉन तारे की गतिविधि से जोड़ रहे हैं, जबकि सामान्य लोग इसे “ब्रह्मांड का संगीत” कहकर रोमांचित हो रहे हैं।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्यतः अंतरिक्ष को मौन माना जाता है। वास्तव में अंतरिक्ष में ध्वनि वैसे नहीं फैलती जैसे पृथ्वी के वातावरण में फैलती है, क्योंकि वहाँ हवा नहीं होती। लेकिन रेडियो तरंगें अंतरिक्ष में बहुत आसानी से यात्रा करती हैं। वैज्ञानिक इन रेडियो तरंगों को विशेष उपकरणों की सहायता से पकड़ते हैं और फिर उन्हें श्रव्य रूप में परिवर्तित करते हैं। जब यह परिवर्तन किया जाता है तो कई बार इन संकेतों में लय, ताल और दोहराव सुनाई देता है। यही कारण है कि लोग उन्हें संगीत जैसा अनुभव करने लगते हैं।
जिस संकेत की चर्चा हो रही है, उसमें कुछ मिनटों या घंटों के अंतराल पर नियमित धड़कन जैसी तरंगें दर्ज की गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह किसी अत्यंत घने मृत तारे से आ सकती हैं। ऐसे तारों को न्यूट्रॉन तारा कहा जाता है। जब कोई विशाल तारा अपने जीवन के अंतिम चरण में विस्फोट करता है, तब उसके केंद्र का भाग अत्यधिक संकुचित होकर न्यूट्रॉन तारे में बदल जाता है। इन तारों का आकार बहुत छोटा होता है, लेकिन उनका घनत्व इतना अधिक होता है कि एक चम्मच पदार्थ का भार करोड़ों टन तक हो सकता है।
न्यूट्रॉन तारे अत्यंत तीव्र गति से घूमते हैं। कई तारे प्रति सेकंड कई बार घूम सकते हैं। जब उनके चुंबकीय ध्रुवों से रेडियो तरंगें निकलती हैं और वे पृथ्वी की दिशा में आती हैं, तब हमें वे नियमित अंतराल पर दिखाई देती हैं। इस प्रक्रिया को समझाने के लिए वैज्ञानिक अक्सर प्रकाश स्तंभ का उदाहरण देते हैं। जैसे समुद्र में खड़ा प्रकाश स्तंभ घूमते हुए समय समय पर जहाजों की दिशा में प्रकाश भेजता है, उसी प्रकार न्यूट्रॉन तारा भी घूमते हुए पृथ्वी की ओर रेडियो संकेत भेजता है। इन्हें पल्सर कहा जाता है।
अब तक वैज्ञानिकों ने 3000 से अधिक पल्सर खोजे हैं, लेकिन हाल की खोजों ने पुराने सिद्धांतों को चुनौती दी है। कुछ संकेत ऐसे मिले हैं जिनकी धड़कनें बहुत धीमी हैं। एक संकेत हर 22 मिनट में दोहराता पाया गया, जबकि एक अन्य स्रोत लगभग 54 मिनट बाद सक्रिय होता था। इतना ही नहीं, 2025 में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे न्यूट्रॉन तारे का संकेत दर्ज किया जिसकी घूर्णन अवधि लगभग 6.45 घंटे थी। यह खोज वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत आश्चर्यजनक थी क्योंकि पुराने सिद्धांतों के अनुसार इतनी धीमी गति वाले न्यूट्रॉन तारों से रेडियो तरंगें नहीं निकलनी चाहिए थीं।
इन संकेतों को “लॉन्ग पीरियड ट्रांजिएंट” नाम दिया गया है। इसका अर्थ है ऐसे स्रोत जो लंबे अंतराल के बाद दोहराए जाने वाले रेडियो संकेत उत्पन्न करते हैं। वैज्ञानिक अभी तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि ये संकेत आखिर उत्पन्न कैसे होते हैं। कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि यह अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले मैग्नेटार नामक तारों से जुड़े हो सकते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि दो तारों की परिक्रमा के कारण भी ऐसी लय उत्पन्न हो सकती है। हाल ही में एक अध्ययन में यह संभावना व्यक्त की गई कि एक मृत तारा और एक लाल बौने तारे की संयुक्त गतिविधि भी ऐसी रेडियो धड़कनें पैदा कर सकती है।
वैज्ञानिकों के लिए सबसे रोचक बात यह है कि इन संकेतों में नियमितता दिखाई देती है। अंतरिक्ष में अधिकांश घटनाएँ अव्यवस्थित और अनियमित होती हैं, लेकिन जब कोई संकेत लगातार एक निश्चित समयांतराल पर प्राप्त होता है तो वह किसी व्यवस्थित भौतिक प्रक्रिया की ओर संकेत करता है। यही नियमितता लोगों को संगीत का अनुभव कराती है। जब कंप्यूटर इन संकेतों को ध्वनि में बदलते हैं तो वे कभी ढोलक, कभी तबले और कभी इलेक्ट्रॉनिक संगीत जैसी प्रतीत होती हैं।
सोशल मीडिया ने इस विषय को और भी लोकप्रिय बना दिया है। लाखों लोग इन संकेतों को सुनकर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। कई लोग इसे “ब्रह्मांड की धड़कन” कह रहे हैं, तो कुछ इसे किसी अनजानी सभ्यता का संदेश मानने लगे हैं। हालांकि वैज्ञानिक इस संभावना को बहुत कम मानते हैं। उनके अनुसार अब तक प्राप्त सभी प्रमाण प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रियाओं की ओर संकेत करते हैं। फिर भी यह सच है कि ब्रह्मांड का यह रहस्य आम लोगों की कल्पना को गहराई से प्रभावित कर रहा है।
मानव इतिहास में पहली बार 1967 में जब नियमित रेडियो संकेत खोजे गए थे, तब कुछ वैज्ञानिकों ने मजाक में उन्हें “छोटे हरे जीवों” का संकेत कहा था। बाद में स्पष्ट हुआ कि वे पल्सर थे। आज भी जब कोई नया और असामान्य संकेत मिलता है, तो लोगों की कल्पनाएँ सक्रिय हो जाती हैं। लेकिन विज्ञान का कार्य कल्पना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर सत्य तक पहुँचना है।
इन रेडियो संकेतों को पकड़ने के लिए अत्यंत विशाल रेडियो दूरबीनों का उपयोग किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका जैसे देशों में स्थापित रेडियो वेधशालाएँ लगातार आकाश का निरीक्षण करती रहती हैं। कनाडा का सीएचआईएमई उपकरण और ऑस्ट्रेलिया का एएसकेैप तंत्र हाल की कई महत्वपूर्ण खोजों में शामिल रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में और अधिक शक्तिशाली दूरबीनें स्थापित की जाएँगी, जिनसे ऐसे संकेतों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।
इन खोजों का महत्व केवल रोमांच तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से वैज्ञानिक ब्रह्मांड की संरचना, तारों के जीवनचक्र और अत्यधिक चुंबकीय क्षेत्रों के व्यवहार को समझने का प्रयास कर रहे हैं। न्यूट्रॉन तारे पदार्थ की ऐसी अवस्था प्रस्तुत करते हैं जिसे पृथ्वी पर प्रयोगशाला में बनाना लगभग असंभव है। इसलिए इनके अध्ययन से भौतिकी के कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि तेज रेडियो विस्फोट, जिन्हें “फास्ट रेडियो बर्स्ट” कहा जाता है, भी न्यूट्रॉन तारों से जुड़े हो सकते हैं। ये संकेत केवल कुछ मिलीसेकंड तक रहते हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि वे पूरी आकाशगंगा से अधिक चमकदार हो सकते हैं। 2025 में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे फास्ट रेडियो बर्स्ट की पुष्टि की जो संभवतः न्यूट्रॉन तारे के अत्यंत निकट क्षेत्र से उत्पन्न हुआ था।
इन घटनाओं ने वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शायद ब्रह्मांड में अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम नहीं समझते। कभी जो तारे केवल चमकते बिंदु लगते थे, आज वे रहस्यमयी संकेतों और अद्भुत ऊर्जा स्रोतों के रूप में सामने आ रहे हैं। हर नई खोज यह बताती है कि मानव ज्ञान अभी शुरुआती अवस्था में है।
“ब्रह्मांड का संगीत” वास्तव में वैज्ञानिक भाषा में रेडियो तरंगों का नियमित पैटर्न है, लेकिन यह नाम लोगों के मन में एक गहरा भाव पैदा करता है। जब कोई व्यक्ति यह सोचता है कि अरबों प्रकाशवर्ष दूर स्थित कोई मृत तारा अपनी धड़कन जैसी तरंगें भेज रहा है और पृथ्वी पर बैठा मानव उन्हें सुन पा रहा है, तो यह अनुभव किसी कविता से कम नहीं लगता।
शायद यही विज्ञान की सबसे सुंदर विशेषता है। वह तथ्यों और गणनाओं के बीच भी आश्चर्य को जीवित रखता है। अंतरिक्ष से आने वाली ये लहरें हमें केवल तारों की कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि यह भी याद दिलाती हैं कि ब्रह्मांड जीवंत है, गतिशील है और रहस्यों से भरा हुआ है। हर नई रेडियो तरंग मानो अनंत अंतरिक्ष की ओर से भेजा गया एक संदेश है, जो मानवता को लगातार पुकार रहा है कि वह खोज जारी रखे।
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