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अक्षय तृतीया और परशुराम अवतार

 

अक्षय तृतीया और परशुराम अवतार का अद्भुत संगम

- महेन्द्र तिवारी 

भारतीय सनातन संस्कृति में अवतारवाद की परंपरा केवल ईश्वरीय उपस्थिति का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना और समाज को दिशा दिखाने का एक जीवंत माध्यम भी है। भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में प्रतिष्ठित भगवान परशुराम का प्राकट्य इसी श्रृंखला की एक अत्यंत तेजस्वी कड़ी है। प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को संपूर्ण भारतवर्ष में परशुराम जयंती अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। ज्योतिषीय गणना और पंचांग के विश्लेषण के अनुसार, तृतीया तिथि का आगमन 19 अप्रैल 2026 को प्रातः 10:49 बजे होगा और इसका समापन अगले दिन 20 अप्रैल 2026 को प्रातः 07:27 बजे होगा। शास्त्रों में भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में माना गया है, इसलिए उदयातिथि और सायंकालीन मुहूर्त की महत्ता को देखते हुए 19 अप्रैल को ही जयंती मनाना श्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत है। यह तिथि केवल एक जयंती मात्र नहीं है, बल्कि यह अक्षय तृतीया का भी महापर्व है, जिसका अर्थ है वह तिथि जिसका पुण्य कभी क्षय नहीं होता।


भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। वे भृगु कुल के रत्न थे, इसलिए उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है। उनका मूल नाम 'राम' था, किंतु उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपना अमोघ शस्त्र 'परशु' प्रदान किया, जिसके कारण वे लोक में परशुराम के नाम से विख्यात हुए। उनका व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण है क्योंकि वे एक ही समय में श्रेष्ठ ब्राह्मण भी हैं और अजेय योद्धा भी। सनातन धर्म में उन्हें 'ब्रह्म-क्षत्रिय' की उपाधि दी गई है, जो यह दर्शाता है कि जब शांति और शास्त्र विफल होने लगें, तब धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना अनिवार्य हो जाता है। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग हमें साहस और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देता है।


पौराणिक कथाओं के अनुसार, उस कालखंड में जब क्षत्रिय राजा अपनी शक्ति के मद में चूर होकर ऋषि-मुनियों और निर्दोष जनता पर अत्याचार करने लगे थे, तब भगवान परशुराम ने अन्याय के विरुद्ध युद्ध का शंखनाद किया। हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने जब अपने बल के अहंकार में महर्षि जमदग्नि की कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण किया और अंततः ऋषि की हत्या कर दी, तब परशुराम ने भीषण प्रतिज्ञा ली। उन्होंने न केवल कार्तवीर्य अर्जुन का वध किया, अपितु पृथ्वी को 21 बार आततायी क्षत्रियों से विहीन कर दिया। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि उनका संघर्ष किसी जाति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस अधर्म और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध था जो मानवता को पीड़ित कर रहा था। उन्होंने प्रत्येक बार विजित भूमि को ऋषियों और ब्राह्मणों को दान कर दिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि उनके भीतर भूमि का मोह नहीं, बल्कि धर्म का राज्य स्थापित करने की ललक थी।


भगवान परशुराम के चरित्र में क्रोध और करुणा का एक अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम ने जनकपुर में शिव का धनुष तोड़ा, तब परशुराम का आगमन और उनका क्रोध उनके शिव-भक्त होने का प्रमाण था, किंतु श्रीराम की विनम्रता और उनके ईश्वरत्व को पहचानते ही वे शांत होकर उन्हें आशीर्वाद देकर महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या हेतु चले गए। इसी प्रकार द्वापर युग में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और दानवीर कर्ण जैसे महारथियों को शस्त्र विद्या प्रदान की। महाभारत के युद्ध में उनके द्वारा दी गई शिक्षा और अस्त्रों ने निर्णायक भूमिका निभाई। वे चिरंजीवी हैं, अर्थात सात अमर विभूतियों में से एक हैं जो आज भी इस पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि वे कलयुग के अंत में भगवान कल्कि के गुरु बनेंगे और उन्हें धर्म स्थापना के लिए शस्त्र विद्या प्रदान करेंगे।


आध्यात्मिक दृष्टि से परशुराम जयंती का महत्व अक्षय तृतीया के साथ जुड़कर और भी बढ़ जाता है। इस दिन किए जाने वाले सत्कर्मों का फल अनंत काल तक बना रहता है। वर्ष 2026 की यह तिथि 19 अप्रैल को भक्तों के लिए आत्मशुद्धि और संकल्प का दिन होगी। इस दिन भक्त प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों में स्नान करते हैं या जल में गंगाजल मिलाकर स्नान की परंपरा निभाते हैं। पूजा के केंद्र में भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। पूजन सामग्री में चंदन, अक्षत, तुलसी दल, धूप, दीप और विशेष रूप से पंचामृत का उपयोग किया जाता है। चूंकि वे शस्त्र विद्या के आदि गुरु हैं, इसलिए इस दिन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा का भी विशेष विधान है। कई समुदायों में इस दिन शस्त्रों का प्रदर्शन और वीरतापूर्ण खेल आयोजित किए जाते हैं जो युवाओं में शौर्य की भावना का संचार करते हैं।


इस पर्व का एक प्रमुख पक्ष दान और सेवा है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है। अनाज, जल के पात्र, वस्त्र, स्वर्ण, और गौ-दान को इस दिन अत्यंत शुभ माना गया है। 19 अप्रैल 2026 को रविवार का संयोग होने के कारण सूर्य देव की आराधना के साथ परशुराम पूजन करना और भी शुभ फलदायी होगा। ब्राह्मणों को भोजन कराना और निर्धनों की सहायता करना इस उत्सव की पूर्णता मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि जो साधक इस दिन उपवास रखकर श्रद्धापूर्वक भगवान परशुराम का स्मरण करता है, उसके जीवन से भय और बाधाएं दूर हो जाती हैं। निःसंतान दंपत्तियों के लिए यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख प्रदान करने वाला माना गया है।


भगवान परशुराम का जीवन आधुनिक समाज के लिए एक महान संदेश है। आज जब विश्व भर में नैतिकता और मूल्यों का पतन हो रहा है, तब परशुराम का चरित्र हमें अनुशासन की महत्ता समझाता है। उनका जीवन सिखाता है कि शक्ति का अर्थ दूसरों को दबाना नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना करना है। उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन कर पितृभक्ति की पराकाष्ठा दिखाई और फिर अपनी तपस्या से माता को पुनर्जीवित कर मातृप्रेम का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका क्रोध 'सात्विक क्रोध' था, जो केवल विनाश के लिए नहीं बल्कि सृजन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए था। युवाओं को उनके जीवन से यह सीखना चाहिए कि ज्ञान (शास्त्र) और सामर्थ्य (शस्त्र) दोनों का होना अनिवार्य है, क्योंकि शस्त्रविहीन ज्ञान दुर्बल होता है और ज्ञानविहीन शस्त्र विनाशकारी।


परशुराम जयंती के अवसर पर भारत के विभिन्न हिस्सों में भव्य शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। विशेषकर उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कोंकण क्षेत्र में इसका भारी उत्साह देखने को मिलता है। कोंकण क्षेत्र को तो परशुराम की अपनी भूमि माना जाता है, क्योंकि उन्होंने समुद्र को पीछे धकेलकर उस भूमि का निर्माण किया था। मंदिरों में भजन, कीर्तन और धार्मिक प्रवचनों का दौर चलता है। वर्ष 2026 में 19 अप्रैल को होने वाले आयोजनों में तकनीक और परंपरा का संगम भी देखा जा सकेगा, जहाँ डिजिटल माध्यमों से भगवान के संदेशों को प्रसारित किया जाएगा। वर्तमान समय में इस पर्व को पर्यावरण और जल संरक्षण से जोड़ना भी एक सराहनीय पहल है। वृक्षारोपण और जलाशयों की स्वच्छता जैसे कार्य भगवान परशुराम के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकते हैं, जिन्होंने सदैव प्रकृति और ऋषि संस्कृति का संरक्षण किया।


भगवान परशुराम की कथा हमें यह भी याद दिलाती है कि समय परिवर्तनशील है। उन्होंने जिस प्रकार अहंकार का दमन किया, वह हर युग के मनुष्य के लिए चेतावनी है कि सत्ता और संपत्ति का दुरुपयोग अंततः विनाश का कारण बनता है। उनके शस्त्र 'परशु' की धार हमें अपने भीतर की बुराइयों और विकारों को काटने की प्रेरणा देती है। जब हम उनकी जयंती मनाएंगे, तो हमारा संकल्प केवल व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज के निर्माण का उत्तरदायित्व भी लेना चाहिए। भगवान परशुराम केवल एक जाति या समुदाय के आराध्य नहीं हैं, वे तो संपूर्ण मानवता के कल्याण और अधर्म के नाश के लिए अवतरित हुए थे।


अंततः यह कहना उचित होगा कि परशुराम जयंती एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। उनकी पूजा हमें शारीरिक रूप से सुदृढ़, मानसिक रूप से शांत और आध्यात्मिक रूप से जाग्रत बनाती है। यदि हम उनके बताए मार्ग पर चलते हुए न्याय का साथ दें और अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो यही उनके प्रति सच्ची भक्ति होगी। इस पावन अवसर पर किया गया जप, तप और दान हमारे जीवन में सुख-शांति का संचार करेगा और भगवान परशुराम की कृपा से समाज में धर्म की विजय होगी। यह पर्व हमें निरंतर याद दिलाता रहेगा कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ेगा, ईश्वरीय शक्ति किसी न किसी रूप में अन्याय का अंत करने अवश्य आएगी। भगवान परशुराम की यह जयंती हमें साहस और शांति के इसी सनातन सत्य की ओर पुनः अग्रसर करेगी।

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