आम आदमी की नजर से नौवां बजट
- महेन्द्र तिवारी
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को लगातार नौवां आम बजट पेश करने जा रही हैं। यह केवल एक औपचारिक आर्थिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि उस दौर का आईना होगा जिसमें आम आदमी महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य और भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच संतुलन खोज रहा है। यह अवसर ऐतिहासिक भी है, क्योंकि वह मोरारजी देसाई के दस बजटों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच रही हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अस्थिरता बनी हुई है, विकसित देशों की मौद्रिक नीतियों का दबाव है, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती दिख रही है और युद्धों के कारण आपूर्ति शृंखला प्रभावित है, भारत का यह बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि भरोसे का दस्तावेज होना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाकृत स्थिरता दिखाई है, लेकिन इसका सीधा लाभ हर घर तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है। मध्यम वर्ग, जो कर व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, आज सबसे अधिक अपेक्षाएं लगाए बैठा है। यह वर्ग केवल कर में छूट नहीं चाहता, बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरतों में राहत चाहता है। वेतनभोगी परिवारों के लिए बढ़ती किस्तें, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और मकान का सपना लगातार महंगा होता जा रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि कर कटौती की सीमा बढ़े, ताकि हाथ में बचने वाली आय से रोजमर्रा का जीवन थोड़ा आसान हो सके। केवल आयकर की दरों में बदलाव ही नहीं, बल्कि मकान ऋण पर मिलने वाली ब्याज छूट को बढ़ाने से लाखों परिवारों को सीधा लाभ मिल सकता है। आज शहरों में एक साधारण घर भी मध्यम वर्ग की पहुंच से दूर होता जा रहा है, ऐसे में सस्ते आवास को प्रोत्साहन देना सामाजिक स्थिरता के लिए भी जरूरी है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में आम आदमी की चिंता और भी गहरी है। बीमारी आज केवल शारीरिक संकट नहीं, बल्कि आर्थिक आपदा बन जाती है। निजी अस्पतालों की बढ़ती लागत और बीमा प्रीमियम ने मध्यम और निम्न आय वर्ग को डरा रखा है। यदि स्वास्थ्य बीमा पर कर में अधिक छूट मिले, वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान हों और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का दायरा बढ़े, तो यह बजट वास्तव में जीवन रक्षक साबित हो सकता है। आयुष आधारित उपचार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की मजबूती और दवाओं की सस्ती उपलब्धता जैसे कदम आम परिवार के लिए राहत की सांस होंगे।
ग्रामीण भारत और किसान इस देश की अर्थव्यवस्था की नींव हैं। आधी से अधिक आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है, लेकिन आय की अनिश्चितता और बढ़ती लागत ने किसान को असुरक्षित बना दिया है। किसानों को मिलने वाली प्रत्यक्ष सहायता राशि में वृद्धि, सस्ते ऋण की सीमा बढ़ाना और फसल बीमा को अधिक पारदर्शी तथा त्वरित बनाना समय की मांग है। सिंचाई परियोजनाओं में बड़े निवेश से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि गांवों में रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। जब गांव मजबूत होंगे, तभी शहरों पर जनसंख्या का दबाव कम होगा और सामाजिक संतुलन बना रहेगा।
लघु और मध्यम उद्योगों की भूमिका भी इस बजट में केंद्र में रहनी चाहिए। ये उद्योग लाखों लोगों को रोजगार देते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। आसान ऋण, सरल कर व्यवस्था और तकनीकी सहायता से ये इकाइयां आत्मनिर्भर बन सकती हैं। विशेष रूप से महिलाओं द्वारा संचालित उद्यमों को प्रोत्साहन देने से सामाजिक बदलाव भी आएगा। गांव और कस्बों में यदि छोटे उद्योग फलते-फूलते हैं, तो पलायन रुकेगा और स्थानीय विकास को नई दिशा मिलेगी।
महिलाएं और युवा किसी भी देश के भविष्य की असली पूंजी होते हैं। महिलाओं के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति की भी शर्त है। स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमियों और कौशल प्रशिक्षण योजनाओं को यदि मजबूत समर्थन मिले, तो महिलाएं केवल लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की सहभागी बनेंगी। युवाओं के लिए रोजगार सृजन सबसे बड़ी चुनौती है। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी नौकरी न मिलना आज लाखों युवाओं की हकीकत है। यदि बजट में प्रशिक्षु कार्यक्रम, नई नौकरियों के लिए प्रोत्साहन और नवाचार आधारित उद्यमों को सहायता मिले, तो यह निराशा उम्मीद में बदल सकती है।
शिक्षा पर निवेश लंबे समय का निवेश होता है। विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षा तक गुणवत्ता सुधारना आवश्यक है। व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को समाज की मुख्यधारा में लाने से युवाओं को रोजगार योग्य बनाया जा सकता है। डिजिटल माध्यमों से दूरदराज के क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाने से ग्रामीण और शहरी बच्चों के बीच की खाई कम होगी। जब शिक्षा सशक्त होगी, तभी जनसंख्या का लाभ वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलेगा।
स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे पर खर्च किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अस्पताल, डॉक्टर, जांच सुविधाएं और चिकित्सा उपकरण यदि सुलभ होंगे, तो जनता का भरोसा मजबूत होगा। इसी तरह सड़क, रेल, हवाई संपर्क और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश से न केवल रोजगार पैदा होते हैं, बल्कि पूरे देश की उत्पादकता बढ़ती है। स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण अनुकूल योजनाओं से आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य तैयार किया जा सकता है। जब घरों की छतों पर सौर ऊर्जा पहुंचेगी, तो बिजली का खर्च घटेगा और प्रदूषण भी कम होगा।
निर्मला सीतारमण के पिछले बजटों में नीति की निरंतरता दिखी है। बड़े सुधारों के साथ-साथ स्थिरता बनाए रखने की कोशिश रही है। इस बार भी उनसे यही अपेक्षा है कि वे विकास और जनकल्याण के बीच संतुलन साधें। आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब उसका असर आम आदमी की थाली, जेब और भविष्य की सुरक्षा पर दिखे। विदेशी निवेश, निर्यात और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि लाभ केवल चुनिंदा वर्गों तक सीमित न रह जाए।
आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना तभी पूरी होगी, जब गांव का किसान, शहर का मजदूर, मध्यम वर्ग का कर्मचारी, महिला उद्यमी और पढ़ा-लिखा युवा सभी खुद को इस विकास यात्रा का हिस्सा महसूस करें। यह बजट केवल सरकार की मंशा का नहीं, बल्कि देश की दिशा का संकेत देगा। यदि इसमें उम्मीदों और यथार्थ के बीच संतुलन बना, तो यह केवल नौवां बजट नहीं, बल्कि विश्वास का दस्तावेज बन सकता है। आम आदमी आज चमत्कार नहीं, बल्कि ईमानदार कोशिश चाहता है। अगर यह कोशिश दिखाई दी, तो 2047 के सपने की राह और भी स्पष्ट हो जाएगी।
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