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Dr. Srimati Tara Singh
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प्यार में टकरार

 

प्यार में टकरार ...  

                                                         

तुमने ऐसा खेल –

मेरे साथ ही क्यों खेला ?

मेरे रूह को क्यों रुलाया,

मेरी जज़्बात से खिलवाड़ क्यों किया,

क्या मैं ही थी अकेली तुम्हारी गुनहगार.. ??

मुझसे ही मेरा प्यार क्यों छीना,

क्यों मैं ही थी एक बेबस-लाचार,

क्या मैं ही थी इस वेदना की हकदार..??

मैंने ऐसा भी क्या पाप किया था,

जिसकी इतनी बड़ी सजा मुझे मिली..??

क्यों मेरा ही रिश्ता जुड़ने से पहले

तोड़ने की कसम खाई थी,

मन में नफरत की आग लगाई थी..??

थी जेहन में इतनी  नफरत-

तो छोड़ क्यों नहीं दिया,

किया था प्यार मुझसे तो,

निभा क्यों नहीं पाया ?

चाहत थी मन में तो, बताया क्यों नहीं,

कभी बोल के तो देखा होता,

मैं कभी उससे दिल लगाती ही नहीं ।

आज मैं जो कुछ लिख रही हूं,

बस यहीं तक थी मेरी कहानी,

जहां हुई थी शुरू, 

वहीं खत्म हुई मेरी कहानी ।

आज तक मैंने उसे ही मांगा था 

भोले बाबा ! तुम्हें भी यही मंजूर था 

आज सावन का आखिरी सोमवार 

अंत होता है यहीं मेरे सच्चे प्यार का....। 


लता नायक

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