माटी कहे कुम्हार से
समीक्षक: लक्ष्मण प्रसाद डेहरिया ''ख़ामोश''
सुश्री देवी नागरानी जी वरिष्ठतम साहित्यकार है आप 85 वर्ष के इस उम्र के पड़ाव
में भी ऊर्जावान है आपने माटी कहे कुमार से शीर्षक की 100 से अधिक कविताएं
वाली काव्य संग्रह “माटी कहे कुमार से” का सृजन किया है. आपने 60 से अधिक
किताबें का सृजन किया है इस काव्य संग्रह में आपकी कविताओं में गहराई है वहीं
आपकी मानव मूल्य पर आधारित इंद्रधनुषी विचारधारा छलकती है इस काव्य
संग्रह में कविताएं कुरुक्षेत्र, यादों के कैनवास, राखी बंधन, वक्त का तकाजा, अंतिम
कविता रात के बाद नई प्रभात, सभी बेजोड़ है. आपने कविताओं के माध्यम से
रिश्तो का दायरा यादों के रंग बिरंगे चित्रण समय का आकलन और जीवन मूल्य
पर चिंतन दिखाई देता है. आपका जन्म कराची में हुआ था विभाजन के बाद मुंबई
में निवास रहा वर्तमान में आप न्यू जर्सी अमेरिका की निवासी है. आप हिंदी,
सिंधी, गुरुमुखी, उर्दू, तेलुगू, मराठी, और और अंग्रेजी भाषा में सिद्ध हस्त हैं. आप
माटी कहे कुमार से की भाषा सरल सहज है आपने इस संग्रह में ‘माटी कहे कुम्हार
से’ में माटी की महत्वता दर्शायी है. माटी विभिन्न स्वरूपों में किसान की माटी,
सैनिकों के लिए मातृभूमि, नागरिकों के लिए धरती माता के रूपों में जानी जाती
है. मनुष्य भी पांच तत्वों से मिलकर बना है उसका अस्तित्व माटी जैसा है. विदुषी
देवी नागरानी मानव को चीतेरे रूप में कहती है कि जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को
गला कर रोंदता है और उसे अपने हाथों से विभिन्न स्वरूपों में उसे जीवंत कर
देता है, परंतु एक दिन मृत्यु के बाद कुम्हार भी मिट्टी में मिल जाता है. यह
जीवन क्षणभंगुर है किताब का शीर्षक ‘माटी कहे कुमार से’ उच्च कोटि का है देवी
नागरानी जी ने कविताओं के माध्यम से मनुष्य जाति को जागृत किया है. वह
अपने उद्देश्य में सफल रही है ‘माटी कहे कुम्भार से’ किताब की अंतिम कविता
रात के बाद नई प्रभात में उत्तम संदेश दिया है कि आपके पास जीवन जीने के
लिए सुबह से शाम तक का ही वक्त है आप अपने जीवन के दिनों में अपनी
जिंदगी के बहुरंगी जीवन को सजा सकते हैं. ‘माटी कहे कुमार से’ की विदुषी
लेखिका की दीर्घायु की कामना करता हूँ, आप अपने साहित्यिक रचना धर्मिता से
मानव जाति को सजक करते रहें.
हाउस नंबर 23 ,24 सेक्टर 1
गीतांजलि कॉलोनी छिंदवाड़ा (एमपी)
पिन कोड 480 0 01
मो .न. 9407 07 8631
lpdeharia51@gmail.com
याक लिखी हुई पाती नहीं मेरे लिए एक प्रेम भरा आशीर्वाद है जो मैं जैसे आया है,
वैसे ही पेश कर रही हूँ, छिंदवाडा के दस्तावेजी लेखक श्री गोवर्धन यादव जी के
इस सन्देश के साथ...
देवी जी, सादर नमस्कार।
मेरे एक मित्र हैं श्री लक्ष्मण प्रसाद डेहरियाजी.
उन्होंने आपकी कृति पर सारगर्भित समीक्षा लिखी है।
वे जन्मांध नहीं थे। धीरे धीरे उन्हें दिखना बंद हुआ और अंतोगत्वा उन्हें
अब बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता।
बावजूद इसके उन्हें ललक है कि कहीं से कुछ लिखने का विषय मिल जाए। इसी
प्यास को बुझाने के लिए वे मुझे प्रतिदिन फोन कर नया विषय जानना चाहते
रहते हैं। इसी क्रम में मैने उन्हें आपका संग्रह भिजवाया। वे परिवार के किसी
सदस्य से विनती करते हैं कि मुझे क्या लिखा है, पढ़कर सुनाए। फिर वे मन ही
मन में अपनी भूमिका बनाते हैं और किसी को लिख देने की प्रार्थना करते हैं। इस
तरह उनकी जिज्ञासा शांत होती है।
आप उनके नंबर पर एक बार बात जरूर कर लें। उन्हें सुखकर लगेगा।
धन्यवाद
गोवेर्धन यादव
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