सूर्य, संस्कृति और स्त्री: मकर संक्रांति का भारतीय स्वरूप
सूर्य के उत्तरायण संग नारी चेतना का जागरण
मकर संक्रांति: परंपरा की वाहक और परिवर्तन की सूत्रधार स्त्री
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· कृति आर के जैन
जब शीत ऋतु की कठोरता के बीच सूर्य उत्तरायण होता है और अंधकार से प्रकाश की यात्रा आरंभ होती है, तब मकर संक्रांति केवल तिथि परिवर्तन का संकेत नहीं देती, बल्कि भारतीय चेतना के नवजागरण का उद्घोष करती है। यह पर्व ऋतु, कृषि, आस्था और सामाजिक एकता का संगम है। भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में मकर संक्रांति अनेक नामों और रूपों में मनाई जाती है, किंतु उसकी आत्मा एक ही रहती है। इन सभी रूपों को जीवंत बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय, सशक्त और प्रेरणादायक रही है। आधुनिक युग की व्यस्तता के बावजूद नारी शक्ति इस पर्व को परंपरा और परिवर्तन के संतुलन के साथ आगे बढ़ा रही है।
मकर संक्रांति सूर्य उपासना का पर्व है, जो जीवन में सकारात्मकता, ऊर्जा और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। यह वह समय है जब किसान नई फसल के आगमन का उत्सव मनाते हैं और समाज श्रम के सम्मान को स्वीकार करता है। महिलाओं के लिए यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने का माध्यम है। वे घर की रसोई से लेकर सामुदायिक आयोजनों तक, हर स्तर पर इस पर्व की आत्मा को साकार करती हैं। उनकी सहभागिता से यह उत्सव भावनात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनता है।
उत्तर भारत में मकर संक्रांति लोहड़ी और माघी के रूप में मनाई जाती है। पंजाब और हरियाणा में महिलाएँ अग्नि के चारों ओर घूमकर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करती हैं। लोकगीतों की मधुर ध्वनि और गिद्दा-भांगड़ा की लय से वातावरण उल्लासपूर्ण हो उठता है। नवविवाहित बहुओं को विशेष सम्मान दिया जाता है, जो उन्हें परिवार की परंपरा से जोड़ने का प्रतीक है। यहाँ महिलाएँ सामूहिक उत्सव की धुरी बनती हैं और नारी शक्ति तथा सामाजिक एकता का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
पश्चिम भारत में यह पर्व महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के नाम से हल्दी-कुंकू और तिलगुल की परंपरा से जुड़ा है। विवाहित महिलाएँ एक-दूसरे को तिल-गुड़ की मिठाइयाँ भेंट करती हैं और मधुर वाणी का संदेश देती हैं। घर-घर में सौहार्द और अपनत्व का वातावरण बनता है। नवविवाहित महिलाएँ विशेष पूजा करती हैं और पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं। यह पर्व महिलाओं के बीच आपसी सहयोग, सम्मान और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का सशक्त माध्यम बनता है।
मध्य भारत में मकर संक्रांति को सुकरात या सक्रात कहा जाता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में महिलाएँ हल्दी-कुंकू की रस्म निभाती हैं, एक-दूसरे को आमंत्रित करती हैं और तिल-गुड़, खिचड़ी, लाई तथा लड्डुओं का आदान-प्रदान करती हैं। नदियों में स्नान, पूजा-अर्चना और दान-पुण्य की परंपरा सौभाग्य और पारिवारिक सुख की कामना से जुड़ी होती है। हाल के वर्षों में सामाजिक और सरकारी प्रयासों से यह पर्व महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी बन रहा है।
गुजरात में मकर संक्रांति उत्तरायण के रूप में मनाई जाती है। रंग-बिरंगी पतंगों से भरा आकाश उल्लास, स्वतंत्रता और आशा का प्रतीक बन जाता है। महिलाएँ भी पूरे उत्साह से पतंगबाजी में भाग लेती हैं और परिवार के साथ इस आनंद को साझा करती हैं। राजस्थान में यह पर्व सुहाग और सौभाग्य से जुड़ा है। सुहागिन महिलाएँ सास को वायना देकर आशीर्वाद लेती हैं, अन्य विवाहित महिलाओं को वस्त्र और श्रृंगार सामग्री दान करती हैं तथा सामूहिक भोज का आयोजन करती हैं। ये परंपराएँ महिलाओं की सामाजिक भूमिका और पारिवारिक संतुलन को उजागर करती हैं।
दक्षिण भारत में यही पर्व पोंगल, मकर संक्रांति/सुग्गी हब्बा, पेड्डा पांडुगा के रूप में मनाया जाता है। तमिलनाडु में महिलाएँ घर के आँगन में रंगोली बनाती हैं, सूर्य और प्रकृति की पूजा करती हैं तथा पोंगल पकाकर समृद्धि की कामना करती हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी महिलाएँ पारंपरिक व्यंजन बनाकर पड़ोसियों के साथ साझा करती हैं। यहाँ यह पर्व प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व का उत्सव बन जाता है, जिसमें नारी की भूमिका सृजन और पोषण की प्रतीक के रूप में उभरती है।
आधुनिक युग में महिलाएँ इन परंपराओं को केवल निभा ही नहीं रहीं, बल्कि उन्हें नई चेतना से जोड़ रही हैं। वे स्वास्थ्यवर्धक व्यंजन तैयार कर रही हैं, पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैला रही हैं और सामाजिक सेवा को पर्व से जोड़ रही हैं। सामुदायिक दान, जरूरतमंदों की सहायता और सांस्कृतिक शिक्षण के माध्यम से वे मकर संक्रांति को व्यापक सामाजिक अर्थ प्रदान कर रही हैं। संचार माध्यमों के उपयोग से महिलाएँ युवा पीढ़ी को पर्व के महत्व से जोड़ने में भी सफल हो रही हैं।
परंपराओं को अगली पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुँचाने में माताओं की भूमिका निस्संदेह अमूल्य और आधारभूत है। वे बच्चों को केवल उत्सव की बाहरी चमक या औपचारिक रस्में निभाना ही नहीं सिखातीं, बल्कि सूर्य, कृषि, श्रम और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान तथा कृतज्ञता का संस्कार भी देती हैं। लोककथाओं की कथन-शैली, पारंपरिक गीतों की लय और पारिवारिक अनुष्ठानों की आत्मीयता बच्चों के मन में सांस्कृतिक स्मृति को स्थायी रूप से अंकित करती है। इसी निरंतर, स्नेहपूर्ण और अर्थपूर्ण शिक्षण के माध्यम से मकर संक्रांति मात्र वर्तमान का पर्व न रहकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सशक्त सांस्कृतिक पूँजी और पहचान बन जाती है।
मकर संक्रांति—चाहे वह लोहड़ी के उल्लास में प्रकट हो, माघी की आस्था में सिमटी हो, उत्तरायण की उमंग में उड़ती हो, पोंगल की समृद्धि में ढली हो या सक्रात की परंपरा में रची-बसी हो—हर नाम और हर रूप में भारतीय संस्कृति की एक ही आत्मा विद्यमान है। इस आत्मा को जीवंत और सशक्त बनाए रखने वाली सबसे मजबूत कड़ी महिलाएँ हैं। उनकी आस्था, श्रम और संवेदना से यह पर्व समय और पीढ़ियों की सीमाओं को पार करता है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ नारी शक्ति भी समाज को प्रकाश, एकता और आशा की सकारात्मक दिशा में आगे ले जाती है। यही मकर संक्रांति की अनुपम, अप्रतिम और शाश्वत महिमा है।
कृति आरके जैन
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: kratijainemail@gmail.com
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