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परिवर्तन से खिलता है मन का वसंत

 

रंगों से नहींपरिवर्तन से खिलता है मन का वसंत

रंग नहीं, संवेदनाओं का उत्सव है होली

होलिका दहन: पुराने अंत का नए जीवन से संगम

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·      कृति आरके जैन


अँधेरा जितना भी गहरा हो, जब आग की लपटें उठती हैं, वह हर छिपी कड़वाहट और पुरानी पीड़ा को राख बना देती हैं। होलिका दहन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि यह जीवन का सबसे बड़ा संदेश है कि बुराई कितनी भी प्रबल क्यों न हो, वह अंततः समाप्त हो जाती है। राख से उठता है नया वसंत, जिसमें हर पत्ता हरा, हर फूल खिलता और हर सांस नई ऊर्जा से भर जाती है। होली हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन कोई असंभव चमत्कार नहीं, बल्कि हर क्षण हमारी अपनी समझ और प्रयास से संभव है। जो आज दुख में डूबा है, वही कल प्रेम, आनंद और उमंग के रंग में सराबोर हो सकता है।

होलिका की कथा केवल पुरानी कहानी नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर छिपे द्वंद्व का प्रतीक है। हिरण्यकश्यप का अहंकार और प्रह्लाद की निश्छल भक्ति हमें बताते हैं कि अच्छाई और बुराई दोनों हमारे भीतर मौजूद हैं। जब अहंकार की आग अपने आप को भस्म कर देती है, तब प्रेम और सत्य की शक्ति और प्रबल हो जाती है। हमारी जिंदगी में भी कई “हिरण्यकश्यप” हैं — ईर्ष्या, क्रोध, भय, लालच — जो हमें मानसिक और भावनात्मक रूप से जलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब हम प्रह्लाद की तरह सत्य और प्रेम पर अडिग रहते हैं, तो वही आग नकारात्मकता को समाप्त कर देती है। यही होली का सबसे बड़ा संदेश है — परिवर्तन हमेशा हमारे भीतर से शुरू होता है।

रंग बरसाना केवल चेहरों तक सीमित नहीं होता; यह दिलों की दीवारों तक पहुँचता है। पुराने मतभेद, वर्षों की शिकायतें, टूटे रिश्ते और कड़वाहटें सब रंगों में घुलकर मिट जाती हैं। होली का वसंत तभी आता है, जब हम पहले अपने भीतर की होलिका जला चुके होते हैं। जैसे सर्दियों के बाद बसंत की ताजगी आती है, वैसे ही मन के अँधेरों और पुराने गिले-शिकवे समाप्त होने पर प्रेम और भाईचारा खिलता है। परिवर्तन का अर्थ है पुरानी आदतों और नकारात्मक सोच को जलाना, और नए विचार और सकारात्मक ऊर्जा अंकुरित करने देना। होली यही सिखाती है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं — न दुख, न क्रोध, न असफलता; सब बदल सकता है, यदि हम खुद को बदलने की हिम्मत करें।

होली का उत्सव कठिनाइयों को सरल बना देता है। रंग खेलते समय लोग जाति, संपत्ति या पद की सीमाओं को भूल जाते हैं। सभी एक हो जाते हैं। यही एकता परिवर्तन की पहली सीढ़ी है। जब हम दूसरों को रंग लगाते हैं, तो अनजाने में अपनी कड़वाहट भी धुल जाती है। क्षमा और समझौते की भावना जन्म लेती है। परिवर्तन अकेले नहीं होता, वह सामूहिक प्रयास से संभव होता है। एक व्यक्ति जब बदलता है, तो उसके आसपास का समाज भी बदलने लगता है। बुराई की होलिका अकेले नहीं जलती, अच्छाई का वसंत भी अकेले नहीं आता। सामूहिक प्रयास, प्रेम और समझदारी से ही यह संभव होता है।

होली का पर्व हमें यह भी सिखाता है कि परिवर्तन केवल बाहरी बदलाव नहीं है, बल्कि अंदर से उठने वाली क्रांति है। यह बदलाव धीरे-धीरे आता है, जब हम पुराने भ्रम, डर और संदेह को जलाते हैं। यह बदलाव व्यक्ति के दृष्टिकोण, सोच और व्यवहार में दिखाई देता है। जब हम दूसरों के लिए समझ, दया और सहयोग का रंग भरते हैं, तो वही रंग हमारे भीतर की बुराई और नकारात्मकता को भी मिटा देता है। होली केवल खुशियों का पर्व नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।

प्रकृति भी इस संदेश का प्रतीक है। जैसे सर्दियों के बाद बसंत में हर पेड़ और हर फूल नया जीवन लेकर आता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी पुराने दुख, पुराने भय और पुराने गिले-शिकवे खत्म होने पर नई ऊर्जा और नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। होली हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है, जो कभी रुकती नहीं। हर अंत में नया आरंभ है, और हर कठिनाई में सीख और अवसर छिपे होते हैं। जीवन के रंग तभी खिलते हैं जब हम पुराने अंधेरों को स्वीकार कर उनके ऊपर से विजय की आग लगाते हैं।

बुराई जल रही है, मतलब पुरानी कमजोरियाँ, दोष और भय समाप्त हो रहे हैं। अच्छाई का वसंत आ रहा है, मतलब नई संभावनाएँ, नया प्रेम और नयी ऊर्जा जन्म ले रही हैं। यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि केवल खुद को बदलना ही पर्याप्त नहीं; दूसरों के लिए मार्ग खोलना और उन्हें प्रेरित करना भी जरूरी है। जब हम अपनी छोटी-छोटी सकारात्मक क्रियाओं के माध्यम से दूसरों के जीवन में रंग भरते हैं, तो समाज सामूहिक परिवर्तन की ओर अग्रसर होता है। यही होली का असली अर्थ है।

होली हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन हमेशा संभव है, बुराई चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो। जीवन का प्रत्येक क्षण नया अवसर देता है। पुरानी आदतों, डर, और नकारात्मकताओं को जलाकर ही हम सच्चे वसंत का अनुभव कर सकते हैं। बस हमें अपने भीतर की आग को पहचानना है, अपनी कमजोरी स्वीकार करनी है, और प्रेम, क्षमा, समझ और सकारात्मकता के रंग भरने हैं। होली नहीं मनानी, होली जीनी है — हर दिन, हर पल। क्योंकि जब हम बदलाव को अपनाते हैं, तो जीवन न केवल रंगीन, बल्कि चमत्कारिक और प्रेरक बन जाता है। यही होली का असली संदेश है — बुराई जल रही है, अच्छाई का वसंत आ रहा है, और जीवन हमेशा नई शुरुआत का अवसर देता है।


कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: kratijainemail@gmail.com

संपर्क: 79992 40375

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