मेरा हक, मेरा सपना, मेरा लोकतंत्र — अब और इंतजार नहीं
संसद में 33% जगह का हक, लेकिन इंतजार की कोई सीमा नहीं
आरक्षण का सूरज उदय हुआ, लेकिन महिलाओं के लिए अभी भी अंधेरा
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·कृति आरके जैन
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देर से मिला, बल्कि यह है कि कानून बनने के बाद भी उसका लाभ आज तक नहीं मिला। संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित और अप्रैल 2026 में अधिसूचित हो चुका है, फिर भी उसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन तक टला है। 20 जुलाई 2026 से जंतर-मंतर पर प्रस्तावित अनिश्चितकालीन धरना केवल आंदोलन नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से सीधा सवाल है जिसने अधिकार तो दिया, पर उसे लागू नहीं किया। आंदोलनकारी महिलाओं का स्पष्ट संदेश है—"हमें भविष्य की संसद का आश्वासन नहीं, वर्तमान की संसद में अपना संवैधानिक स्थान चाहिए।" यह केवल महिलाओं की पुकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अधूरे वादे की गूंज है।
संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का मार्ग खोला और इसे भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ माना गया। अप्रैल 2026 में अधिसूचना जारी होने के बावजूद इसका क्रियान्वयन अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया गया। यानी अधिकार संविधान में दर्ज है, लेकिन उसका लाभ अब भी टला हुआ है। यही कारण है कि महिला संगठनों का आक्रोश बढ़ रहा है। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी सहित अनेक महिला नेताओं का सवाल है—क्या आधी आबादी को आज भी लोकतंत्र में "दूसरी श्रेणी का नागरिक" मानकर इंतजार कराया जाएगा? यदि समान अधिकार संवैधानिक संकल्प है, तो उसका क्रियान्वयन भी बिना विलंब होना चाहिए।
इस देरी के पीछे केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित भी है। 2021 की जनगणना अब तक नहीं हुई, जबकि उसके बाद का परिसीमन देश का राजनीतिक संतुलन बदल सकता है। अनुमान है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर लगभग 850 हो सकती हैं। इससे उत्तर भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घटने की आशंका है। इसी कारण अप्रैल 2026 में लाए गए 131वें संविधान संशोधन और परिसीमन विधेयक पर विवाद गहरा गया। विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति मानता है, जबकि महिला संगठनों का आरोप है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर उसका क्रियान्वयन टाल दिया गया। प्रक्रियाएं आवश्यक हैं, लेकिन जब वे अधिकारों में बाधा बनें, तो उन पर पुनर्विचार भी आवश्यक हो जाता है।
इस देरी की सबसे बड़ी कीमत देश की महिलाएं चुका रही हैं। आज लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 14 प्रतिशत से कम और राज्य विधानसभाओं में औसतन 10 प्रतिशत है। आरक्षण लागू होते ही सैकड़ों महिलाएं राष्ट्रीय नीति-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। पंचायतों और नगरीय निकायों में 50 प्रतिशत तक आरक्षण सिद्ध कर चुका है कि महिलाओं की भागीदारी से शासन अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और जनहितकारी बनता है। जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को नई प्राथमिकता मिली है। जब गांव से नगर तक महिलाएं नेतृत्व क्षमता साबित कर चुकी हैं, तब संसद के द्वार उनके लिए प्रतीक्षा का प्रतीक बने रहना लोकतंत्र की बड़ी विडंबना है।
इस पृष्ठभूमि में महिला आरक्षण के लिए राष्ट्रीय गठबंधन सहित अनेक महिला संगठनों की मांग केवल राजनीतिक आग्रह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक न्याय की अपेक्षा है। उनका कहना है कि सरकार यदि महिला सशक्तीकरण के प्रति प्रतिबद्ध है, तो वर्तमान लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण लागू कर जनगणना व परिसीमन की शर्त हटाए। साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, आदिवासी व अन्य वंचित वर्गों की महिलाओं के लिए उप-आरक्षण सुनिश्चित हो। वे चुनावी व्यय में सरकारी सहायता और महिलाओं के नाम पर पुरुष रिश्तेदारों द्वारा संचालित 'प्रतिनिधि राजनीति' पर रोक की मांग कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर महिला संगठन मानसून सत्र में संवैधानिक संशोधन, जंतर-मंतर पर धरना और देशभर में जनजागरण अभियान की घोषणा कर चुके हैं।
वास्तव में यह संघर्ष कुछ सीटों का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है। लोकतंत्र की मजबूती केवल मतदान नहीं, निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी से तय होती है। शिक्षा, विज्ञान, न्यायपालिका, सेना, उद्योग, कृषि, प्रशासन और अंतरिक्ष में क्षमता सिद्ध कर चुकी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रशासनिक प्रक्रियाओं के नाम पर टालना लोकतांत्रिक न्याय के विपरीत है। अनेक लोकतंत्रों ने सिद्ध किया है कि नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी से शासन अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और जवाबदेह बनता है। इसलिए महिला आरक्षण केवल "महिला मुद्दा" नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समावेशी शासन, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक संतुलन का प्रश्न है। आधी आबादी की आवाज निर्णय प्रक्रिया में बराबरी से न सुनी जाए, तो विकास अधूरा रहेगा।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून बनाना नहीं, उस पर विश्वास बनाए रखना है। यदि संवैधानिक अधिकार वर्षों तक लागू न हों, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि वे अधिकार हैं या केवल राजनीतिक घोषणा। जनगणना और परिसीमन आवश्यक संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन उन्हें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की शर्त बना देना संविधान की समान अवसर की भावना के अनुरूप नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो ऐसा समाधान संभव है जिससे जनगणना और परिसीमन समय पर हों और महिलाओं का संवैधानिक अधिकार प्रतीक्षा का शिकार न बने। लोकतंत्र की विश्वसनीयता अधिकार टालने में नहीं, उन्हें समय पर लागू करने के साहस में निहित है।
अब समय केवल निर्णय का नहीं, लोकतांत्रिक संकल्प निभाने का है। 20 जुलाई से जंतर-मंतर पर शुरू होने वाला आंदोलन किसी सरकार के विरोध का नहीं, बल्कि समान अधिकारों की लोकतांत्रिक पुकार है। यदि भारत "विकसित भारत" का लक्ष्य हासिल करना चाहता है, तो आर्थिक प्रगति के साथ राजनीतिक समानता भी सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को प्रतीक्षा नहीं, नेतृत्व का अधिकार चाहिए। लोकतंत्र की सार्थकता कानून बनाने में नहीं, उसे समय पर लागू करने में है। आधी आबादी अब मौन दर्शक नहीं, समान अधिकार, सम्मान और प्रतिनिधित्व की दावेदार है। इतिहास गवाह है—अधिकार जितनी देर से मिलते हैं, लोकतंत्र उतना कमजोर होता है।
कृति आरके जैन
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
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